परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 38

अंतिम दिनों के लोग परमेश्वर के क्रोध को केवल उसके वचनों में देखते हैं, और परमेश्वर के क्रोध को सचमुच में महसूस नहीं करते हैं

कि उत्पत्ति के समय से लेकर आज तक, किसी भी समूह ने परमेश्वर के अनुग्रह या दया एवं करूणा का उतना आनन्द नहीं लिया है जितना इस अंतिम समूह ने लिया है। हालाँकि, परमेश्वर ने अंतिम चरण में न्याय एवं ताड़ना का कार्य किया है, और उसने अपना कार्य प्रताप एवं क्रोध के साथ किया है, अधिकतर बार परमेश्वर अपने कार्य को पूरा करने के लिए केवल वचनों का ही उपयोग करता है; वह सिखाने, सींचने, प्रदान करने, और पोषण करने के लिए वचनों का ही उपयोग करता है। इसी बीच, परमेश्वर के क्रोध को हमेशा छिपाकर रखा गया है, और उसके वचनों में परमेश्वर के क्रोधपूर्ण स्वभाव का अनुभव करने के अलावा, बहुत ही कम लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर उसके क्रोध का अनुभव किया है। कहने का तात्पर्य है, न्याय एवं ताड़ना के विषय में परमेश्वर के कार्य के दौरान, हालाँकि परमेश्वर के वचनों में प्रकट क्रोध लोगों को परमेश्वर की महिमा और अपराध के प्रति उसकी असहिष्णुता का अनुभव करने देता है, फिर भी यह क्रोध उसके वचनों से परे नहीं जाता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर मनुष्य को झिड़कने, मनुष्य का खुलासा करने, मनुष्य का न्याय करने, मनुष्य को ताड़ना देने, और यहाँ तक कि मनुष्य की निंदा करने के लिए वचनों का उपयोग करता है—परन्तु परमेश्वर अभी तक मनुष्य के प्रति अत्यंत क्रोधित नहीं हुआ है, और अपने वचनों के बाहर बमुश्किल ही मनुष्य पर अपने क्रोध को तीव्रता से प्रवाहित किया है। इस प्रकार, परमेश्वर की दया एवं करूणा जिनका अनुभव मनुष्य के द्वारा इस युग में किया जाता है वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन हैं, जबकि परमेश्वर का क्रोध जिसका अनुभव मनुष्य के द्वारा किया जाता है वह महज उसके कथनों के अन्दाज़ एवं एहसास का प्रभाव है। बहुत से लोग इस प्रभाव को ग़लत रीति से लेते हैं कि ये परमेश्वर के क्रोध का सच्चा अनुभव एवं सच्चा ज्ञान है। परिणामस्वरूप, अधिकतर लोग मानते हैं कि उन्होंने उसके वचनों में परमेश्वर की दया एवं करूणा को देखा है, यह कि उन्होंने मनुष्य के अपराध के विषय में परमेश्वर की असहिष्णुता को भी देखा है, और उन में से अधिकांश लोग मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया एवं सहिष्णुता की सराहना भी करने लगे हैं। परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य का व्यवहार कितना बुरा है, या उसका स्वभाव कितना भ्रष्ट है, परमेश्वर ने हमेशा सहन किया है। सहते रहने में, उसका उद्देश्य है कि वे वचन जो उसने कहे हैं, वे कोशिशें जो उसने की है और वह कीमत जो उसने चुकाई है इनके प्रभाव हासिल करने का इंतज़ार उन लोगों में करना जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार के परिणाम का इंतज़ार करने में समय लगता है, और इस में मनुष्य के लिए विभिन्न वातावरण की सृष्टि करने की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे लोग जन्म लेते ही व्यस्क नहीं हो जाते हैं; इस में अट्ठारह या उन्नीस साल लग जाते हैं, और कुछ लोगों को तो बीस या तीस साल लग जाते हैं इससे पहले कि वे परिपक्व होकर व्यस्क हों। परमेश्वर इस प्रक्रिया के पूर्ण होने का इंतज़ार करता है, वह ऐसे समय के आने का इंतज़ार करता है, और वह इस परिणाम के आगमन का इंतज़ार करता है। और उस पूरे समय जब वह इंतज़ार करता है, परमेश्वर अत्यंत दयालु होता है। फिर भी परमेश्वर के कार्य की समयावधि के दौरान बहुत कम संख्या में लोगों को मार गिराया जाता है, और कुछ ही लोगों को परमेश्वर का गम्भीर विरोध करने के कारण दण्ड दिया जाता है। ऐसे उदाहरण परमेश्वर के उस स्वभाव के और भी अधिक बड़े प्रमाण हैं जो मनुष्य के अपराध को बर्दाश्त नहीं करता है, और वे चुने हुए लोगों के प्रति परमेश्वर की सहिष्णुता एवं सहनशक्ति के सच्चे अस्तित्व को पूरी तरह से पुष्ट करते हैं। हाँ वास्तव में, इन प्रतीकात्मक उदाहरणों में, इन लोगों में परमेश्वर के स्वभाव के एक हिस्से का प्रकटीकरण परमेश्वर की समूची प्रबन्धकीय योजना को प्रभावित नहीं करता है। वास्तव में, परमेश्वर के कार्य के इस अंतिम चरण में, परमेश्वर ने उस समयावधि के दौरान चुपचाप सहन किया है जिस में वह इंतज़ार करता रहा है, और उसने अपनी सहनशक्ति एवं अपने जीवन को उन लोगों के उद्धार से बदल लिया है जो उसका अनुसरण करते हैं। क्या तू इसे देखता है? परमेश्वर बिना कारण अपनी योजना में उलट-फेर नहीं करता है। वह अपने क्रोध को तीव्रता से प्रवाहित कर सकता है, और वह दयालु भी हो सकता है; यह परमेश्वर के स्वभाव के दो मुख्य भागों का प्रकटीकरण है। क्या यह बिल्कुल स्पष्ट है, या नहीं है? दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर की बात आती है, तो सही एवं ग़लत, धर्मी एवं अधर्मी, सकारात्मक एवं नकारात्मक—यह सब कुछ मनुष्य को साफ साफ दिखाया जाता है। जो वह करेगा, जो वह पसंद करता है, जिससे वह घृणा करता है—यह सब सीधे तौर पर उसके स्वभाव में प्रतिबिम्बित हो सकता है। ऐसी बातों को परमेश्वर के कार्य में भी स्पष्ट तौर पर और साफ साफ देखा जा सकता है, और वे अस्पष्ट या सामान्य नहीं हैं; इसके बजाए, वे सभी लोगों को परमेश्वर के स्वभाव, और स्वरूप को ख़ास तौर पर ठोस, सही एवं व्यावहारिक रीति से देखने देता है। यही स्वयं सच्चा परमेश्वर है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

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