परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 29

परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किये बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या नहीं या वे उसका अनुसरण करते है या नहीं करते, परमेश्वर मनुष्य से अपने प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव प्राणी कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं-और उसके खिलौने नहीं हैं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो ऐसा सुनाई दे सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अन्तर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिन्ता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति की आपूर्ति करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता है कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या कुछ ऐसा है जो ढेर सारे श्रेय के लायक है। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनकी आपूर्ति करना, और उन्हें सबकुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान देना है। अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सार और जो वह है उसके माध्यम से, वह बस खामोशी से एवं चुपचाप मानवजाति के लिए प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति उससे कितने प्रयोजन एवं कितनी सहायता प्राप्त करती है, क्योंकि परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता है या न ही श्रेय लेने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित होता है, और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है। इसी लिए, इसकी परवाह किए बगैर कि यह बाइबल में है या किसी अन्य पुस्तकों में है, हम परमेश्वर को कभी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए नहीं पाते हैं, और हम कभी परमेश्वर को मनुष्यों को इसका वर्णन करते या घोषणा करते हुए नहीं पाते हैं कि वह इन कार्यों को क्यों करता है, या वह मानवजाति की इतनी देखरेख क्यों करता है, जिससे मानवजाति को उसके प्रति आभारी बनाया जाए या उससे उसकी स्तुति कराई जाए। यहाँ तक कि जब उसे कष्ट भी होता है, जब उसका हृदय अत्यंत पीड़ा में होता है, वह मानवजाति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी या मानवजाति के लिए अपनी चिन्ता को कभी नहीं भूलता है, वह पूरे समय इस कष्ट एवं दर्द को चुपचाप अकेला सहता रहता है। इसके विपरीत, परमेश्वर निरन्तर मानवजाति को प्रदान करता है जैसा वह हमेशा से करता आया है। हालाँकि मानवजाति अकसर परमेश्वर की स्तुति करती है या उसकी गवाही देती है, फिर भी इसमें से किसी भी व्यवहार की माँग परमेश्वर के द्वारा नहीं की जाती है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर किसी भी अच्छे कार्य के लिए जिसे वह मानवजाति के लिए करता है कभी ऐसा इरादा नहीं करता है कि उसे धन्यवाद से बदल दिया जाए या उसे वापस किया जाए। दूसरी ओर, ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उसको ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रति वफादार हैं, और ऐसे लोग जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं—ये ऐसे लोग हैं जो प्रायः परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसी आशिषों को प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, ऐसी आशीषें जिन्हें लोग परमेश्वर से प्राप्त करते हैं वे अकसर उनकी कल्पना से परे होती हैं, और साथ ही किसी भी ऐसी चीज़ से परे होती हैं जिसे मानव प्राणी उससे बदल सकते हैं जो उन्होंने किया है या उस कीमत से बदल सकते हैं जिसे उन्होंने चुकाया है। जब मानवजाति परमेश्वर की आशीषों का आनन्द ले रही है, तब क्या कोई परवाह करता है कि परमेश्वर क्या कर रहा है? क्या कोई किसी प्रकार की चिन्ता को दर्शाता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा है? क्या कोई परमेश्वर की पीड़ा की सराहना करने की कोशिश करता है? इन प्रश्नों का बिलकुल सही उत्तर है: नहीं! क्या कोई मनुष्य, नूह को मिलाकर, उस दर्द की सराहना कर सकता है जिसे परमेश्वर उस समय महसूस कर रहा था? क्या कोई समझ सकता है कि क्यों परमेश्वर एक ऐसी वाचा ठहराएगा? वे नहीं समझ सकते हैं! मानवजाति परमेश्वर की पीड़ा की सराहना नहीं करती है इसलिए नहीं कि वे परमेश्वर की पीड़ा को नहीं समझते हैं, और परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच अन्तर या उनकी हैसियत के बीच अन्तर के कारण नहीं; इसके बजाए, यह इसलिए है क्योंकि मानवजाति परमेश्वर की किसी भावना की परवाह भी नहीं करती है। मानवजाति सोचती है कि परमेश्वर तो आत्मनिर्भर है—परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है कि लोग उसकी देखरेख करें, उसे समझें या उस पर विचार करें। परमेश्वर तो परमेश्वर है, अतः उसके पास कोई दर्द नहीं है, कोई भावनाएँ नहीं हैं; वह दुःखी नहीं होगा, वह शोक महसूस नहीं करता है, यहाँ तक कि वह रोता भी नहीं है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, इसलिए उसे किसी भावनात्मक अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और उसे किसी भावनात्मक सुकून की आवश्यकता नहीं है। यदि उसे कुछ निश्चित परिस्थितियों के अंतर्गत इनकी आवश्यकता होती है, तो वह स्वयं ही इसे सुलझा लेगा और उसे मानवजाति से किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके विपरीत, यह तो कमज़ोर, एवं अपरिपक्व मनुष्य है जिन्हें परमेश्वर की सांत्वना, प्रयोजन एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है, और यहाँ तक कि परमेश्वर की भी आवश्यकता होती है कि वह उनकी भावनाओं को किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर सांत्वना दे। एक ऐसा विचार मानवजाति के हृदय के भीतर गहराई में छुपा होता है: मनुष्य कमज़ोर प्राणी है; उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है कि वह हर तरीके से उनकी देखरेख करे, वे सब प्रकार की देखभाल के हकदार हैं जिन्हें वे परमेश्वर से प्राप्त करते हैं, और उन्हें परमेश्वर से किसी भी चीज़ की माँग करनी चाहिए जिसे वे महसूस करते हैं कि वह उनका होना चाहिए। परमेश्वर बलवान है; उसके पास सबकुछ है, और उसे मानवजाति का अभिभावक और आशीषें प्रदान करने वाला अवश्य होना चाहिए। जबकि वह पहले से ही परमेश्वर है, वह सर्वशक्तिमान है और उसे मानवजाति से कभी किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

चूँकि मनुष्य परमेश्वर के किसी भी प्रकाशन पर ध्यान नहीं देता है, इसलिए उसने कभी परमेश्वर के शोक, पीड़ा, या आनन्द को महसूस नहीं किया है। परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर मनुष्य की सभी अभिव्यक्तियों को अपनी हथेली के समान जानता है। परमेश्वर सभी समयों एवं सभी स्थानों में प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, प्रत्येक मनुष्य के बदलते विचारों का अवलोकन करता है और इस प्रकार उनको सांत्वना एवं प्रोत्साहन देता है, और उन्हें मार्गदर्शन देता है और ज्योतिर्मय करता है। उन सभी चीजों के सम्बन्ध में जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति पर किया है और पूरी कीमत जो उसने उनके कारण चुकाई है, क्या लोग बाइबल में से या किसी ऐसी चीज़ से एक अंश ढूँढ़ सकते हैं जिसे अब तक परमेश्वर ने कहा है जो साफ साफ कहता हो कि परमेश्वर मनुष्य से किसी चीज़ की माँग करेगा? नहीं! इसके विपरीत, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस प्रकार लोग परमेश्वर की सोच को अनदेखा करते हैं, क्योंकि वह अभी भी लगातार मानवजाति की अगुवाई करता है, लगातार मानवजाति की आपूर्ति करता है और उनकी सहायता करता है, कि उन्हें परमेश्वर के मार्गों पर चलने की अनुमति मिले ताकि वे उस खूबसूरत मंज़िल को प्राप्त कर सकें जो उसने उनके लिए तैयार की है। जब परमेश्वर की बात आती है, तो जो वह है, उसके अनुग्रह, उसकी दया और उसके सभी प्रतिफलों को बिना किसी हिचकिचाहट के उन लोगों को प्रदान किया जाएगा जो उससे प्रेम एवं उसका अनुसरण करते हैं। किन्तु वह उस पीड़ा को जो उसने सहा है या अपनी मनोदशा को कभी किसी व्यक्ति पर प्रकट नहीं करता है, और वह किसी के विषय में कभी शिकायत नहीं करता कि वह उसके प्रति ध्यान नहीं देता है या उसकी इच्छा नहीं जानता है। वह खामोशी से यह सब सह लेता है, उस दिन का इंतज़ार करता है जब मानवजाति समझने के योग्य हो जाएगी।

मैं यहाँ ये बातें क्यों कहता हूँ? तुम लोग उन बातों से क्या देखते हो जिन्हें मैंने कहा है? परमेश्वर के सार एवं स्वभाव में कुछ ऐसा है जिसे बड़ी आसानी से अनदेखा किया जाता है, ऐसी चीज़ जो केवल परमेश्वर के द्वारा ही धारण की जाती है और किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं, उन लोगों को मिलाकर जिनके विषय में अन्य लोग सोचते हैं कि वे महान लोग, एवं अच्छे लोग हैं, या उनकी कल्पना का परमेश्वर है। यह चीज़ क्या है? यह परमेश्वर की निःस्वार्थता है। निःस्वार्थता के बारे में बोलते समय, शायद तुम सोचते हो कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो, क्योंकि जब तुम्हारे बच्चों की बात आती है, तो तुम उनके साथ कभी मोलभाव नहीं करते हो और तुम उनके प्रति उदार होते हो, या तुम सोचते हो कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो जब तुम्हारे माता पिता की बात आती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या सोचते हो, कम से कम तुम्हारे पास "निःस्वार्थ" शब्द की एक अवधारणा तो है और तुम इसे एक सकारात्मक शब्द के रूप में सोचते हो, और ऐसा निःस्वार्थ व्यक्ति होना बहुत ही परोपकारी है। जब तुम निःस्वार्थ होते हो, तो तुम सोचते हो कि तुम महान हो। परन्तु ऐसा कोई नहीं है जो सभी चीज़ों के मध्य, सभी लोगों, घटनाओं, एवं वस्तुओं के मध्य, और परमेश्वर के कार्य के जरिए परमेश्वर की निःस्वार्थता को देख सके। ऐसी स्थिति क्यों है? क्योंकि मनुष्य बहुत स्वार्थी है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। शायद तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किन्तु तुम कभी देखते नहीं या तारीफ नहीं करते हो कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारी आपूर्ति करता है, तुम्हें प्रेम करता है, और तुम्हारे लिए चिन्ता दिखाता है। अतः तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों के विषय में परवाह करते हो जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। फिर भी ऐसे "निःस्वार्थ" लोग कभी भी उस परमेश्वर के विषय में परवाह नहीं करते हैं जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निन्दनीय हो जाती है। वह निःस्वार्थता जिसमें मनुष्य विश्वास करता है वह खाली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत, एवं परमेश्वर से असम्बद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ उसके के लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का एक सच्चा प्रकाशन है। यह बिलकुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे आपूर्ति की एक सतत धारा प्राप्त करता है। तुम लोग शायद इस विषय के द्वारा अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हों, परन्तु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय की सराहना करने की कोशिश करते हो, तो तुम अनजाने में ही जान जाओगे: सभी लोगों, मुद्दों एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति की तथाकथित निःस्वार्थता पूरी तरह से झूठी, ऊपरी एवं कपटपूर्ण है; इसके पास एक उद्देश्य, एवं निश्चित इरादे हैं, यह एक समझौते को लिए हुए है, और परीक्षा लिए जाने पर स्थिर नहीं रह सकता है। तुम लोग यह भी कह सकते हो कि यह गन्दा, एवं घिनौना है। क्या तुम लोग सहमत हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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