परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 21

मानवजाति की सृष्टि करने के समय से ही परमेश्वर अपना कार्य करता रहा है। शुरूआत में, कार्य बहुत साधारण था, लेकिन फिर भी, इसमें अभी भी परमेश्वर के सार एवं स्वभाव की अभिव्यक्ति शामिल है। अब जबकि परमेश्वर के कार्य को, उसके प्रत्येक व्यक्ति जो उसका अनुसरण करते हैं उनके भीतर बड़ी मात्रा में ठोस कार्य करने के द्वारा ऊँचा किया गया है, और जो आदि से लेकर अब तक उचित मात्रा में अपने वचनों को अभिव्यक्त कर रहा है, फिर भी परमेश्वर के स्वरूप को मानवजाति से छिपाया गया है। हालाँकि वह दो बार देहधारण कर चुका है, फिर भी बाइबल के लेखों के समय से लेकर हाल के दिनों तक, किसने कभी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? तुम लोगों की समझ के आधार पर, क्या कभी किसी ने परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को देखा है? नहीं। किसी ने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व को नहीं देखा है, अर्थात् किसी ने भी परमेश्वर के असल रूप को कभी नहीं देखा है। यह कुछ ऐसा है जिसके साथ हर कोई सहमत है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर का वास्तविक व्यक्तित्व, या परमेश्वर का आत्मा सारी मानवता से छिपा हुआ है, जिसमें आदम और हव्वा शामिल हैं, जिन्हें उसने बनाया था, और जिसमें धर्मी अय्यूब शामिल है, जिसे उसने स्वीकार किया था। यहाँ तक कि उन्होंने भी परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व (स्वरूप) को नहीं देखा था। लेकिन क्यों परमेश्वर जान-बूझकर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को ढंकता है? कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर लोगों को भयभीत करने से डरता है।" दूसरे कहते हैं: "परमेश्वर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छुपाता है क्योंकि मनुष्य बहुत छोटा है और परमेश्वर बहुत बड़ा है; मनुष्यों को उसे देखने की अनुमति नहीं दी गई है, अन्यथा वे मर जाएँगे।" कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं: "परमेश्वर हर दिन अपने कार्य का प्रबंधन करने में व्यस्त रहता है, शायद उसके पास प्रकट होने के लिए समय नहीं है कि लोगों को उसे देखने की अनुमति मिले।" इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, यहाँ मेरे पास एक निष्कर्ष है। वह निष्कर्ष क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर भी नहीं चाहता है कि लोग उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देखें। मानवता से छिपा रहना कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर जान-बूझकर करता है। दूसरे शब्दों में, लोगों के लिए परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वे उसके वास्तविक व्यक्तित्व को न देखें। अब तक यह सब को स्पष्ट हो जाना चाहिए। यदि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी किसी को नहीं दिखाया है, तो क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर का व्यक्तित्व अस्तित्व में है? (वह अस्तित्व में है।) हाँ वास्तव में वह अस्तित्व में है। परमेश्वर के व्यक्तित्व का अस्तित्व निर्विवादित है। किन्तु जहाँ तक यह बात है कि परमेश्वर का व्यक्तित्व कितना बड़ा है या वह कैसा दिखता है, क्या ये वे प्रश्न हैं जिनकी मानवजाति को छानबीन करनी चाहिए? नहीं। उत्तर नकारात्मक है। यदि परमेश्वर का स्वरूप ऐसा विषय नहीं है जिसकी छानबीन की जाना चाहिए, तो फिर वह कौन सा प्रश्न है जिस पर हमें विचार करना चाहिए? (परमेश्वर का स्वभाव।) (परमेश्वर का कार्य।) इससे पहले कि हम आधिकारिक विषय पर बातचीत करना शुरू करें, फिर भी, आइए हम उसी विषय पर वापस लौटें जिस पर हम उस समय चर्चा कर रहे थे: क्यों परमेश्वर ने मानवजाति को कभी अपना व्यक्तित्व नहीं दिखाया है? परमेश्वर क्यों जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को मानवजाति से छिपाता है? सिर्फ एक ही कारण है, और वह है: यद्यपि सृजा गया मनुष्य परमेश्वर के कार्य के हज़ारों वर्षों के दौरान रहा है, फिर भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के सार को जानता है। परमेश्वर की नज़रों में ऐसे लोग उसके विरुद्ध हैं, और परमेश्वर अपने आप को ऐसे लोगों को नहीं दिखाएगा जो उसके प्रति अत्यंत उग्र हैं। यही वह एकमात्र कारण है कि परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व को कभी मानवजाति को नहीं दिखाया है और क्यों वह जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को उनसे बचा कर रखता है। क्या अब तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को जानने के महत्व के बारे में स्पष्ट हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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