परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 17

मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति से निर्धारित होता है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और जैसे लोग भिन्न-भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न तरीकों से बर्ताव करते हैं, वैसे ही इन बर्तावों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति भी भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि वह न तो कोई कठपुतली है, और न ही वह शून्य है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानना मनुष्य के लिए एक नेक खोज है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानकर लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा-थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगोगे, तो तुम्हें नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना कोई कठिन कार्य है। जब तुम परमेश्वर को समझ जाओगे, तो उसके बारे में निष्कर्ष नहीं निकालोगे। जब तुम परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष निकालना बन्द कर दोगे, तो उसे अपमानित करने की संभावना नहीं रहेगी और अनजाने में ही परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करो; इससे तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा पैदा होगी। तुम उन मतों, शब्दों एवं सिद्धांतों का उपयोग करके परमेश्वर को परिभाषित करना बंद कर दोगे जिनमें तुम महारत हासिल कर चुके हो। बल्कि, सभी चीज़ों में सदा परमेश्वर के इरादों को खोजकर, तुम अनजाने में ही परमेश्वर के हृदय के अनुरूप बन जाओगे।

इंसान परमेश्वर के कार्य को न तो देख सकता है, न ही छू सकता है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, वह हर एक व्यक्ति के कार्यकलापों को, परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति को, न केवल समझ सकता है, बल्कि देख भी सकता है। इसे हर किसी को पहचानना और इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। हो सकता है कि तुम स्वयं से पूछते हो, "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं इस समय क्या सोच रहा हूँ? हो सकता है वह जानता हो, हो सकता है न भी जानता हो"। यदि तुम इस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसमें विश्वास करते हो, मगर उसके कार्य और अस्तित्व पर सन्देह भी करते हो, तो देर-सवेर ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करोगे, क्योंकि तुम पहले ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान के कगार पर खड़े डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, परंतु उन्होंने अभी तक सत्य-वास्तविकता प्राप्त नहीं की है, और वे परमेश्वर की इच्छा को तो और भी नहीं समझते। केवल अत्यंत छिछले मतों के मुताबिक चलते हुए, उनके जीवन और आध्यात्मिक कद में कोई प्रगति नहीं होती। क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को जीवन नहीं माना, और न ही कभी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार किया है। तुम्हें लगता है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को देखकर आनंद से भर जाता है? क्या वे उसे आराम पहुँचाते हैं? यह है लोगों का परमेश्वर में विश्वास करने का तरीका जो उनका भाग्य तय करता है। जहाँ तक सवाल यह है कि लोग परमेश्वर की खोज कैसे करते हैं, कैसे परमेश्वर के समीप आते हैं, तो यहाँ लोगों की प्रवृत्ति प्राथमिक महत्व की हो जाती है। अपने सिर के पीछे तैरती खाली हवा समझ कर परमेश्वर की उपेक्षा मत करो; जिस परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है उसे हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एक वास्तविक परमेश्वर मानो। वह तीसरे स्वर्ग में हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा है। बल्कि, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करते हो, वह हर छोटे वचन और हर छोटे कर्म को देख रहा है, वो यह देख रहा है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। तुम स्वयं को परमेश्वर को अर्पित करने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा संपूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे अंदर की सोच एवं विचार परमेश्वर के सामने खुले हैं, और परमेश्वर उन्हें देख रहा है। तुम्हारे व्यवहार, तुम्हारे कर्मों, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार ही तुम्हारे बारे में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं कुछ लोगों को कुछ सलाह देना चाहूँगा : अपने आपको परमेश्वर के हाथों में छोटे शिशु के समान मत रखो, जैसे कि उसे तुमसे लाड़-प्यार करना चाहिए, जैसे कि वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता, और जैसे कि तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थायी हो जो कभी नहीं बदल सकती, और मैं तुम्हें सपने देखना छोड़ने की सलाह देता हूँ! परमेश्वर हर एक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धार्मिक है, और वह मनुष्य को जीतने और उसके उद्धार के कार्य के प्रति अपने दृष्टिकोण में ईमानदार है। यह उसका प्रबंधन है। वह हर एक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़-प्यार या बिगाड़ने वाला प्रेम नहीं है, न ही मनुष्य के प्रति उसकी करुणा और सहिष्णुता आसक्तिपूर्ण या बेपरवाह है। इसके विपरीत, मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम सँजोने, दया करने और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी करुणा और सहिष्णुता बताती हैं कि मनुष्य से उसकी अपेक्षाएँ क्या हैं, और यही वे चीज़ें हैं जो मनुष्य के जीने के लिए ज़रूरी हैं। परमेश्वर जीवित है, वास्तव में उसका अस्तित्व है; मनुष्य के प्रति उसकी प्रवृत्ति सैद्धांतिक है, कट्टर नियमों का समूह नहीं है, और यह बदल सकती है। मनुष्य के लिए उसके इरादे, परिस्थितियों और प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित एवं रूपांतरित हो रहे हैं। इसलिए तुम्हें पूरी स्पष्टता के साथ जान लेना चाहिए कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है, उसका स्वभाव अलग-अलग समय और संदर्भों के अनुसार प्रकट होता है। शायद तुम्हें यह कोई गंभीर मुद्दा न लगे, और तुम्हारी व्यक्तिगत अवधारणा हो कि परमेश्वर को कैसे कार्य करना चाहिए। परंतु कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे दृष्टिकोण से बिल्कुल विपरीत नज़रिया सही हो, और अपनी अवधारणाओं से परमेश्वर को आंकने के पहले ही तुमने उसे क्रोधित कर दिया हो। क्योंकि परमेश्वर उस तरह कार्य नहीं करता जैसा तुम सोचते हो, और न ही वह उस मसले को उस नज़र से देखेगा जैसा तुम सोचते हो कि वो देखेगा। इसलिए मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपने नज़रिए में सावधान एवं विवेकशील रहो, और सीखो कि किस प्रकार सभी चीज़ों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धांत का अनुसरण करना चाहिए, जो कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और उसकी प्रवृत्ति के मामलों पर एक दृढ़ समझ विकसित करनी चाहिए; तुम्हें ईमानदारी से प्रबुद्ध लोगों को खोजना चाहिए जो इस पर तुम्हारे साथ संवाद करें। अपने विश्वास में परमेश्वर को एक कठपुतली मत समझो—उसे मनमाने ढंग से मत परखो, उसके बारे में मनमाने निष्कर्षों पर मत पहुँचो, परमेश्वर के साथ सम्मान-योग्य व्यवहार करो। एक तरफ जहाँ परमेश्वर तुम्हारा उद्धार कर रहा है, तुम्हारा परिणाम निर्धारित कर रहा है, वहीं वह तुम्हें करुणा, सहिष्णुता, या न्याय और ताड़ना भी प्रदान कर सकता है, लेकिन किसी भी स्थिति में, तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर नहीं होती। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति पर, और परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर करता है। परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलू के ज़रिए परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित मत करो। किसी मृत परमेश्वर में विश्वास मत करो; जीवित परमेश्वर में विश्वास करो। यह बात याद रखो! यद्यपि मैंने यहाँ पर कुछ सत्यों पर चर्चा की है, ऐसे सत्य जिन्हें तुम लोगों को सुनना चाहिए, फिर भी तुम्हारी वर्तमान दशा और आध्यात्मिक कद के मद्देनज़र, मैं तुम्हारे उत्साह को ख़त्म करने के लिए कोई बड़ी माँग नहीं करूँगा। ऐसा करने से तुम लोगों का हृदय अत्यधिक उदासी से भर सकता है, और तुम्हें परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक निराशा हो सकती है। इसके बजाय मुझे आशा है कि तुम लोग, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे हृदय में जो प्रेम है, उसका उपयोग कर सकते हो, और मार्ग पर चलते समय परमेश्वर के प्रति सम्मानजनक प्रवृत्ति का उपयोग कर सकते हो। परमेश्वर में विश्वास करने को लेकर इस मामले में भ्रमित मत हो; इसे एक बड़ा मसला समझो। इसे अपने हृदय में रखो, अभ्यास में लाओ, और वास्तविक जीवन से जोड़ो; इसका केवल दिखावटी आदर मत करो। क्योंकि यह जीवन और मृत्यु का मामला है, जो तुम्हारी नियति को निर्धारित करेगा। इसके साथ कोई मजाक मत करो या इसे बच्चों का खेल मत समझो! आज तुम लोगों के साथ इन वचनों को साझा करने के बाद, मुझे नहीं पता कि तुम लोगों ने इन बातों को कितना आत्मसात किया है। आज जो कुछ मैंने यहाँ पर कहा है क्या उसके बारे में तुम्हारे मन में कोई प्रश्न है जो तुम पूछना चाहते हो?

हालाँकि ये विषय थोड़े नए हैं, और तुम लोगों के दृष्टिकोण से, तुम्हारी सामान्य खोज से, और जिस पर ध्यान देने की तुम्हारी प्रवृत्ति है, उससे थोड़ा हट कर हैं, फिर भी मेरा ख्याल है कि कुछ समय तक उन पर संवाद करके, जो कुछ मैंने यहाँ कहा है, उसके बारे में तुम लोग एक सामान्य समझ विकसित कर लोगे। ये सारे विषय नए हैं, और ऐसे विषय हैं जिन पर तुमने पहले कभी विचार नहीं किया, इसलिए मुझे आशा है कि ये तुम लोगों के बोझ को और नहीं बढ़ाएँगे। मैं आज ये बातें तुम्हें भयभीत करने के लिए नहीं बोल रहा, न ही मैं इनका उपयोग तुमसे निपटने के लिए कर रहा हूँ; बल्कि, मेरा लक्ष्य तथ्य की सच्चाई को समझने में तुम लोगों की सहायता करना है। चूँकि इंसान और परमेश्वर के बीच एक दूरी है : यद्यपि इंसान परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसने परमेश्वर को कभी समझा नहीं है, उसकी प्रवृत्ति को कभी नहीं जाना है। मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर की प्रवृत्ति के लिए कोई उत्साह नहीं दिखाया है। बल्कि उसने आँख मूँदकर विश्वास किया है, वह आँख मूँदकर आगे बढ़ा है, और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान और समझ में लापरवाह रहा है। अतः मैं इन मामलों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट करने, और यह समझने में तुम लोगों की सहायता करने को मजबूर हूँ कि वह परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो; वह क्या सोच रहा है; विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ उसके व्यवहार में उसकी प्रवृत्ति क्या है; तुम लोग उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने से कितनी दूर हो; और तुम्हारे कार्यकलापों और उस मानक के बीच कितनी असमानता है जिसकी वह तुमसे अपेक्षा करता है। तुम लोगों को ये बातें बताने का मकसद तुम्हें वह पैमाना देना है जिससे तुम खुद को माप सको, ताकि तुम जान सको कि जिस मार्ग पर तुम हो, उसमें तुम्हें कितनी प्राप्ति हुई है, तुम लोगों ने इस मार्ग पर क्या प्राप्त नहीं किया है, और तुम किन क्षेत्रों में शामिल नहीं हुए हो। तुम लोग आपस में संवाद करते समय, आमतौर पर कुछ सामान्य रूप से चर्चित विषयों पर ही बोलते हो जिनका दायरा संकरा होता है, और विषयवस्तु बहुत सतही होती है। तुम लोगों की चर्चा के विषय और परमेश्वर के इरादों में, तुम्हारी चर्चाओं और परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे एवं मानक में एक दूरी, एक अंतर होता है। इस प्रकार चलते हुए कुछ समय बाद तुम लोग परमेश्वर के मार्ग से बहुत दूर होते चले जाओगे। तुम लोग बस परमेश्वर के मौजूदा कथनों को लेकर उन्हें आराधना की वस्तुओं में बदल रहे हो, और उन्हें रीति-रिवाजों और नियमों के तौर पर देख रहे हो। बस यही कर रहे हो! वास्तव में, तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं है, दरअसल परमेश्वर ने तुम लोगों के हृदय को कभी प्राप्त ही नहीं किया। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को जानना बहुत कठिन है—यही सत्य है। यह कठिन है! यदि लोगों से अपने कर्तव्य निभाने के लिए कहा जाए और कार्यों को बाहरी तौर पर करने को कहा जाए, उनसे कठिन परिश्रम करने के लिए कहा जाए, तो लोग सोचेंगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत आसान है, क्योंकि यह सब मनुष्य की योग्यताओं के दायरे में आता है। मगर जैसे ही यह विषय परमेश्वर के इरादों और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति की ओर जाता है, तो सभी के नज़रिए से चीज़ें निश्चित रूप से थोड़ी कठिन हो जाती हैं। क्योंकि इसमें सत्य के बारे में लोगों की समझ और वास्तविकता में उनका प्रवेश शामिल है, तो निश्चित ही इसमें थोड़ी कठिनाई तो है! किन्तु जैसे ही तुम लोग पहले द्वार को पार कर जाते हो और प्रवेश करना शुरू कर देते हो तो धीरे-धीरे चीज़ें आसान होने लगती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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