परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 14

मनुष्य के परिणाम कौन निर्धारित करता है?

चर्चा करने के लिए एक और बेहद महत्वपूर्ण मामला है, और वह है परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति। यह प्रवृत्ति बेहद अहम है! इससे यह निर्धारित होगा कि तुम लोग विनाश की ओर जाओगे, या उस सुन्दर मंज़िल की ओर जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए तैयार किया है। राज्य के युग में, परमेश्वर पहले ही बीस से अधिक वर्षों तक कार्य कर चुका है, और इन बीस वर्षों के दौरान शायद तुम लोगों का हृदय तुम्हारे प्रदर्शन को लेकर थोड़ा बहुत अनिश्चित रहा है। लेकिन, परमेश्वर ने मन ही मन तुममें से हर एक व्यक्ति का एक वास्तविक और सच्चा अभिलेख बना लिया है। जबसे इंसान ने परमेश्वर का अनुसरण करना, उसके उपदेश सुनना, और धीरे-धीरे अधिक सत्य समझना शुरू किया है, तब से लेकर इंसान के अपना कर्तव्य निभाने तक, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति के हर एक कार्यकलापों का लेखा-जोखा है। कर्तव्य निभाने, परिस्थितियों, परीक्षणों का सामना करते समय लोगों की प्रवृत्ति क्या होती है? उनका प्रदर्शन कैसा रहता है? मन ही मन वे परमेश्वर के प्रति कैसा महसूस करते हैं?...परमेश्वर के पास इन सभी चीज़ों का लेखा-जोखा रहता है; उसके पास सभी चीजों का लेखा-जोखा है। शायद तुम्हारे नज़रिए से, ये मामले भ्रमित करने वाले हों। लेकिन परमेश्वर के नज़रिए से, वे मामले एकदम स्पष्ट हैं, उसमें ज़रा-सी भी लापरवाही नहीं होती। इस मामले में हर एक व्यक्ति का परिणाम शामिल है, इसमें, उनके भाग्य और भविष्य की संभावनाएँ सम्मिलित हैं। इससे भी बढ़कर, इसी स्थान पर परमेश्वर अपने सभी श्रमसाध्य प्रयास लगाता है। इसलिए परमेश्वर कभी इसकी उपेक्षा नहीं करता, न ही वह कोई लापरवाही बर्दाश्त करता है। परमेश्वर शुरु से लेकर अंत तक मनुष्य के परमेश्वर का अनुसरण करने के सारे क्रम का हिसाब-किताब रख रहा है। इस समय के दौरान परमेश्वर के प्रति तुम्हारी जो प्रवृत्ति रही है, उसी ने तुम्हारी नियति तय की है। क्या यह सच नहीं है? क्या अब तुम्हें भरोसा है कि परमेश्वर धार्मिक है? क्या उसके कार्य उचित हैं? क्या तुम्हारे दिमाग में अभी भी परमेश्वर के बारे में दूसरी कल्पनाएँ हैं? (नहीं।) तो क्या तुम लोग कहोगे कि मनुष्य का परिणाम निर्धारित करना परमेश्वर का कार्य है, या स्वयं मनुष्य को निर्धारित करना चाहिए? (इसे परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए।) उसे कौन तय करता है? (परमेश्वर।) तुम निश्चित नहीं हो न? हांग कांग के भाई-बहनो, बोलो—इसे कौन निर्धारित करता है? (मनुष्य स्वयं निर्धारित करता है।) क्या मनुष्य स्वयं इसे निर्धारित करता है? तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है? दक्षिण कोरिया के भाई-बहनो, बोलो। (परमेश्वर लोगों के कार्यकलापों, कर्मों और उस मार्ग के आधार पर उनका परिणाम निर्धारित करता है जिस पर वे चलते हैं।) यह बिलकुल वस्तुनिष्ठ उत्तर है। मैं यहाँ तुम्हें एक तथ्य बता दूँ : परमेश्वर ने उद्धार के कार्य के दौरान, मनुष्य के लिए एक मानक निर्धारित किया है। और वो मानक यह है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का पालन करे और परमेश्वर के मार्ग में चले। लोगों का परिणाम इसी मानक की कसौटी पर कसा जाता है। यदि तुम परमेश्वर के इस मानक के अनुसार अभ्यास करते हो, तो तुम एक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकते हो; यदि नहीं करते, तो तुम अच्छा परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते। अब तुम क्या कहोगे, यह परिणाम कौन निर्धारित करता है? इसे अकेला परमेश्वर निर्धारित नहीं करता, बल्कि परमेश्वर और मनुष्य मिलकर निर्धारित करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ।) ऐसा क्यों है? क्योंकि परमेश्वर ही सक्रिय रूप से मनुष्य के उद्धार के कार्य में शामिल होकर मनुष्य के लिए एक खूबसूरत मंज़िल तैयार करना चाहता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य है, यही वो परिणाम, मंज़िल है जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए तैयार करता है। यदि उसके कार्य का कोई लक्ष्य न होता, तो परमेश्वर को यह कार्य करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती; यदि परमेश्वर यह कार्य न कर रहा होता, तो मनुष्य के पास उद्धार पाने का कोई अवसर ही न होता। मनुष्यों को बचाना है, और यद्यपि बचाया जाना इस प्रक्रिया का निष्क्रिय पक्ष है, फिर भी इस पक्ष की भूमिका निभाने वाले की प्रवृत्ति ही निर्धारित करती है कि मनुष्य को बचाने के अपने कार्य में परमेश्वर सफल होगा या नहीं। यदि परमेश्वर तुम्हें मार्गदर्शन न देता, तो तुम उसके मानक को न जान पाते, और न ही तुम्हारा कोई उद्देश्य होता। यदि इस मानक और उद्देश्य के होते हुए भी, तुम सहयोग न करो, इसे अभ्यास में न लाओ, कीमत न चुकाओ, तो तुम्हें यह परिणाम प्राप्त न होगा। इसीलिए, मैं कहता हूँ कि किसी के परिणाम को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता, और इसे उस व्यक्ति से भी अलग नहीं किया जा सकता। अब तुम लोग जान गए हो कि मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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