परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 13

परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझो और परमेश्वर के बारे में सभी गलत धारणाओं को छोड़ दो

आज जिस परमेश्वर पर तुम लोग विश्वास करते हो, वह किस तरह का परमेश्वर है? क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है कि यह किस प्रकार का परमेश्वर है? जब वह किसी दुष्ट व्यक्ति को दुष्ट कार्य करते हुए देखता है, तो क्या वह उससे घृणा करता है? (हाँ, घृणा करता है।) जब वह अज्ञानी लोगों को गलतियाँ करते देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (दु:ख।) जब वह लोगों को अपनी भेंटें चुराते हुए देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (वह उनसे घृणा करता है।) यह सब बिलकुल साफ है, है न? जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने प्रति विश्वास में भ्रमित होते हुए, और किसी भी तरह से सत्य की खोज न करते हुए देखता है, तो परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है? तुम लोग इस पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो, है न? प्रवृत्ति के तौर पर "भ्रमित होना" कोई पाप नहीं है, न ही यह परमेश्वर का अपमान करता है। लोगों को लगता है कि यह कोई बड़ी भूल नहीं है। तो बताओ, इस मामले में, परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? (वह उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।) "स्वीकार करने के लिए तैयार न होना"—यह कैसी प्रवृत्ति है? इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर उन लोगों को तुच्छ मानकर उनका तिरस्कार करता है! परमेश्वर ऐसे लोगों से निपटने के लिए उनके प्रति उदासीन हो जाता है। उसका तरीका है उन्हें दरकिनार करना, उन पर कोई कार्य न करना जिसमें प्रबुद्धता, रोशनी, ताड़ना या अनुशासन के कार्य शामिल हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के कार्य की गिनती में नहीं आते। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं, और उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हैं? भयंकर घृणा! परमेश्वर ऐसे लोगों से अत्यंत क्रोधित हो जाता है जो उसके स्वभाव को भड़काने को लेकर पश्चाताप नहीं करते! "अत्यंत क्रोधित होना" मात्र एक अनुभूति, एक मनोदशा है; यह एक स्पष्ट प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं होती। परन्तु यह अनुभूति, यह मनोदशा, ऐसे लोगों के लिए परिणाम उत्पन्न करती है : यह परमेश्वर को भयंकर घृणा से भर देगी! इस भयंकर घृणा का परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम यह होता है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को दरकिनार कर देता है और कुछ समय तक उन्हें कोई उत्तर नहीं देता। फिर वह "शरद ऋतु के बाद" उन्हें छाँटकर अलग करने की प्रतीक्षा करता है। इसका क्या तात्पर्य है? क्या ऐसे लोगों का तब भी कोई परिणाम होगा? परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को कभी भी कोई परिणाम देने का इरादा नहीं किया था! तो क्या यह एकदम सामान्य बात नहीं है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को कोई उत्तर नहीं देता? (हाँ, सामान्य बात है।) ऐसे लोगों को किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए? उन्हें अपने व्यवहार एवं दुष्ट कृत्यों से पैदा हुए नकारात्मक परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए यह परमेश्वर का उत्तर है। इसलिए अब मैं ऐसे लोगों से साफ-साफ कहता हूँ : अब भ्रांतियों को पकड़े न रहो, और ख्याली पुलाव पकाने में न लगे रहो। परमेश्वर अनिश्चित काल तक लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं रहेगा; वह अनिश्चित काल तक उनके अपराधों और अवज्ञा को सहन नहीं करेगा। कुछ लोग कहेंगे, "मैंने भी इस प्रकार के कुछ लोगों को देखा है। जब वे प्रार्थना करते हैं तो उन्हें विशेष रूप से लगता है कि परमेश्वर उन्हें स्पर्श कर रहा है, और वे फूट-फूट कर रोते हैं। सामान्यतया वे भी बहुत खुश होते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर की उपस्थिति, और परमेश्वर का मार्गदर्शन है।" ऐसी बेतुकी बातें मत करो! फूट-फूटकर रोने का मतलब अनिवार्यत: यह नहीं कि इंसान को परमेश्वर स्पर्श कर रहा है या वह परमेश्वर कि उपस्थिति का आनंद ले रहा है, परमेश्वर के मार्गदर्शन की तो बात ही छोड़ दो। यदि लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उनका मार्गदर्शन करेगा? संक्षेप में, जब परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने, उसका परित्याग करने का निश्चय कर लिया है, तो उस व्यक्ति का परिणाम समाप्त हो जाता है। प्रार्थना करते समय किसी की भावनाएँ कितनी ही अनुकूल हों, उसके हृदय में परमेश्वर के प्रति कितना ही विश्वास हो; उसका कोई परिणाम नहीं होता। महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर को इस प्रकार के विश्वास की आवश्यकता नहीं है; परमेश्वर ने पहले ही ऐसे लोगों को ठुकरा दिया है। उनके साथ आगे कैसे निपटा जाए यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि जैसे ही ऐसा इंसान परमेश्वर को क्रोधित करता है, उसका परिणाम निर्धारित हो जाता है। यदि परमेश्वर ने तय कर लिया कि ऐसे इंसान को नहीं बचाना, तो उसे दण्डित होने के लिए छोड़ दिया जाएगा। यह परमेश्वर की प्रवृत्ति है।

यद्यपि परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी कर भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। उसके प्रेममय होने का अर्थ यह नहीं है कि लोग खुलकर उसका अपमान कर सकते हैं, ऐसा नहीं है कि उसकी भावनाएँ नहीं भड़केंगी या कोई प्रतिक्रियाएँ नहीं होंगी। उसमें करुणा होने का अर्थ यह नहीं है कि लोगों से व्यवहार करने का उसका कोई सिद्धांत नहीं है। परमेश्वर सजीव है; सचमुच उसका अस्तित्व है। वह न तो कोई कठपुतली है, न ही कोई वस्तु है। चूँकि उसका अस्तित्व है, इसलिए हमें हर समय सावधानीपूर्वक उसके हृदय की आवाज़ सुननी चाहिए, उसकी प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें अपनी कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, न ही हमें अपने विचार और इच्छाएँ परमेश्वर पर थोपनी चाहिए, जिससे कि परमेश्वर इंसान के साथ इंसानी कल्पनाओं के आधार पर मानवीय व्यवहार करे। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को क्रोधित कर रहे हो, तुम उसके कोप को बुलावा देते हो, उसकी महिमा को चुनौती देते हो! एक बार जब तुम लोग इस मसले की गंभीरता को समझ लोगे, मैं तुम लोगों से आग्रह करूँगा कि तुम अपने कार्यकलापों में सावधानी और विवेक का उपयोग करो। अपनी बातचीत में सावधान और विवेकशील रहो। साथ ही, तुम लोग परमेश्वर के प्रति व्यवहार में जितना अधिक सावधान और विवेकशील रहोगे, उतना ही बेहतर होगा! अगर तुम्हें परमेश्वर की प्रवृत्ति समझ में न आ रही हो, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और यूँ ही कोई लेबल न लगा दो। और सबसे महत्वपूर्ण बात, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। बल्कि, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; ये कृत्य भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की अभिव्यक्ति है। सबसे बड़ी बात, यदि तुम ऐसा कर सको, और ऐसी प्रवृत्ति अपना सको, तो परमेश्वर तुम्हारी मूर्खता, अज्ञानता, और चीज़ों के पीछे तर्कों की समझ की कमी के लिए तुम्हें दोष नहीं देगा। बल्कि, परमेश्वर को अपमानित करने के तुम्हारे भय मानने, उसके इरादों के प्रति तुम्हारे सम्मान, और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की तुम्हारी तत्परता के कारण, परमेश्वर तुम्हें याद रखेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हें प्रबुद्धता देगा, या तुम्हारी अपरिपक्वता और अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, यदि उसके प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति श्रद्धाविहीन होती है—तुम मनमाने ढंग से परमेश्वर की आलोचना करते हो, मनमाने ढंग से परमेश्वर के विचारों का अनुमान लगाकर उन्हें परिभाषित करते हो—तो परमेश्वर तुम्हें अपराधी ठहराएगा, अनुशासित करेगा, बल्कि दण्ड भी देगा; या वह तुम पर टिप्पणी करेगा। हो सकता है कि इस टिप्पणी में ही तुम्हारा परिणाम शामिल हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस बात पर जोर देना चाहता हूँ : परमेश्वर से आने वाली हर चीज़ के प्रति तुम्हें सावधान और विवेकशील रहना चाहिए। लापरवाही से मत बोलो, और अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत हो। कुछ भी कहने से पहले रुककर सोचो : क्या मेरा ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर के प्रति श्रद्धा दिखाना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों में भी, तुम्हें इन प्रश्नों को समझकर उन पर विचार करना चाहिए। यदि तुम हर चीज़ में, हर समय, इन सिद्धांतों के अनुसार सही मायने में अभ्यास करो, विशेष रूप से इस तरह की प्रवृत्ति तब अपना सको, जब कोई चीज़ तुम्हारी समझ में न आए, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें अनुसरण योग्य मार्ग देगा। लोग चाहे जो दिखावा करें, लेकिन परमेश्वर सबकुछ स्पष्ट रूप में देख लेता है, और वह तुम्हारे दिखावे का सटीक और उपयुक्त मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तुम अंतिम परीक्षण का अनुभव कर लोगे, तो परमेश्वर तुम्हारे समस्त व्यवहार को लेकर उससे तुम्हारा परिणाम निर्धारित करेगा। यह परिणाम निस्सन्देह हर एक को आश्वस्त करेगा। मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ कि तुम लोगों का हर कर्म, हर कार्यकलाप, हर विचार तुम्हारे भाग्य को निर्धारित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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