परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 8

परमेश्वर के मार्ग पर चलो : परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो

एक कहावत है जिस पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनेक बार आती है। ऐसा क्यों है? इसलिए क्योंकि जब भी किसी से मेरा सामना होता है, जब भी किसी की कहानी सुनता हूँ, मैं जब भी किसी के अनुभव या परमेश्वर में विश्वास करने की उसकी गवाही सुनता हूँ, तो मैं अपने मन में इस बात का निर्णय करने के लिए कि यह व्यक्ति उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, या जिसे परमेश्वर पसंद करता है, मैं इस कहावत का उपयोग करता हूँ। तो, वह कहावत क्या है? तुम सभी लोग पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हो। जब मैं वो कहावत तुम्हें बताऊँगा, तो शायद तुम्हें निराशा हो, क्योंकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इससे वर्षों से दिखावटी प्रेम दिखाते आ रहे हैं। किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैंने इससे कभी भी दिखावटी प्रेम नहीं किया। यह कहावत मेरे दिल में बसी हुई है। तो वह कहावत क्या है? वो है: "परमेश्वर के मार्ग में चलो : परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो।" क्या यह बहुत ही सरल वाक्यांश नहीं है? हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, तब भी कोई व्यक्ति जिसमें असल में इसकी गहरी समझ है, वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा महत्व है, अभ्यास में इसका बड़ा मूल्य है; यह जीवन की भाषा से एक पंक्ति है जिसमें सत्य-वास्तविकता निहित है, जो लोग परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहते हैं, यह उनके लिए जीवन भर का लक्ष्य है, यह ऐसे व्यक्ति के लिए अनुसरण करने योग्य जीवन भर का मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है। तो तुम लोग क्या सोचते हो : क्या यह कहावत सत्य नहीं है? इसकी ऐसी महत्ता है या नहीं? शायद कुछ लोग इस कहावत पर विचार करके, इसे समझने का प्रयास भी कर रहे हों, और शायद कुछ ऐसे हों जो इसके बारे में शंका रखते हों : क्या यह कहावत बहुत महत्वपूर्ण है? क्या यह बहुत महत्वपूर्ण है? क्या इस पर इतना ज़ोर देना ज़रूरी है? शायद कुछ ऐसे लोग भी हों जो इस कहावत को अधिक पसंद न करते हों, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर के मार्ग पर चलना और उसे एक कहावत में सारभूत करना इसका अत्यधिक सरलीकरण है। जो कुछ परमेश्वर ने कहा, उसे लेकर एक छोटी-सी कहावत में पिरो देना—क्या ऐसा करना परमेश्वर को एकदम महत्वहीन बना देना नहीं है? क्या यह ऐसा ही है? ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से अधिकांश इन वचनों के पीछे के गहन अर्थ को पूरी तरह से न समझते हों। यद्यपि तुम लोगों ने इसे लिख लिया है, फिर भी तुम सब इस कहावत को अपने हृदय में स्थान देने का कोई इरादा नहीं रखते; तुमने इसे बस अपनी पुस्तिका में लिख लिया है ताकि अपने खाली समय में इसे फिर से पढ़कर इस पर विचार कर सको। कुछ तो इस कहावत को याद रखने की भी परवाह नहीं करेंगे, इसे अच्छे उपयोग में लाने का प्रयास करने की तो बात छोड़ ही दो। परन्तु मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करना चाहता हूँ? तुम लोगों का दृष्टिकोण या तुम लोग क्या सोचोगे, इसकी परवाह किए बिना, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी ही थी क्योंकि यह इस बात को लेकर अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इस कहावत के बारे में तुम लोगों की वर्तमान समझ चाहे कुछ भी क्यों न हो, या तुम इससे कैसे भी पेश क्यों न आओ, मैं तब भी तुम लोगों को यह बताऊँगा : यदि लोग इस कहावत के शब्दों को अभ्यास में ला सकें, उनका अनुभव कर सकें, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मानक को प्राप्त कर सकें, तो वे लोग जीवित बचे रहेंगे और यकीनन उनके परिणाम अच्छे होंगे। यदि तुम इस कहावत के द्वारा तय मानक को पूरा न कर पाओ, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तुम्हारा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम्हारी मानसिक तैयारी के लिए तुम्हें कहावत बता रहा हूँ, ताकि तुम लोग जान लो कि तुम्हें मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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