परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 4

यदि किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसने कई वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है और कई सालों तक उसके वचनों के पोषण का आनंद लिया है, परमेश्वर संबंधी परिभाषा अनिवार्यत: वैसी ही है, जैसी मूर्तियों के सामने भक्ति-भाव से दंडवत करने वाले व्यक्ति की होती है, तो यह इस बात का सूचक है कि इस व्यक्ति ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता प्राप्त नहीं की है। इसका कारण यह है कि उसने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में बिलकुल भी प्रवेश नहीं किया है और इस कारण से, परमेश्वर के वचनों में निहित वास्तविकता, सत्य, इरादों और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं का उस व्यक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के सतही अर्थ पर चाहे कितनी भी मेहनत से कार्य करे, वह सब व्यर्थ है : क्योंकि वह मात्र शब्दों का अनुसरण करता है, इसलिए उसे अनिवार्य रूप से मात्र शब्द ही प्राप्त होंगे। परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; मार्ग, लक्ष्‍य और दिशा, जिससे होकर गुज़रना उद्धार पाने के लिए आवश्‍यक है; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिसे सृजित मनुष्य जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों में ही मनुष्य को सत्य और जीवन की आपूर्ति की जा सकती है; केवल इनसे ही मनुष्य की समझ में आ सकता है कि सामान्य मानवता क्‍या है, सार्थक जीवन क्या है, वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि उसे परमेश्वर की परवाह किस तरह करनी चाहिए, सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए, और एक वास्तविक मनुष्य की समानता कैसे प्राप्त करनी चाहिए; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का शासक कौन है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ सकता है कि वह जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों से सृष्टि पर शासन करता है, उसकी अगुआई करता है और उसका पोषण करता है; और केवल इनसे ही मनुष्य समझ-बूझ सकता है कि वह, जो समस्त सृष्टि का स्वामी है, किन साधनों के ज़रिये मौजूद रहता है, स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करता है और कार्य करता है। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग, मनुष्य के पास परमेश्‍वर के वचनों और सत्‍य का कोई वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक ज़िंदा लाश, पूरा घोंघा होता है, और स्रष्टा से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्‍ता नहीं होता। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे व्यक्ति ने कभी उस पर विश्वास नहीं किया है, न कभी उसका अनुसरण किया है, और इसलिए परमेश्वर न तो उसे अपना विश्वासी मानता है और न ही अपना अनुयायी, एक सच्‍चा सृजित प्राणी मानना तो दूर की बात रही।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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