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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

तुम लोगों से परमेश्वर के वचनों से सुसज्जित होने के लिए कहा गया है, यह कहा गया है कि इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोगों के लिए क्या व्यवस्थित किया जाता है, सब कुछ गुप्त रूप से परमेश्वर के स्वयं के हाथ से आयोजित किया जाता है, और यह कि तुम लोगों की गंभीर प्रार्थनाओं या अनुनय-विनय की कोई आवश्यकता नहीं है—वे सब व्यर्थ हैं। परंतु वर्तमान स्थिति के संदर्भ में जो व्यवहारिक समस्याएँ तुम लोगों के सामने आ रही हैं, वे तुम लोगों के लिये अकल्पनीय हैं। यदि तुम लोग केवल परमेश्वर की व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करते हो, तो तुम लोगों की प्रगति बहुत धीमी होगी, और उनके लिए जो नहीं जानते हैं कि अनुभव कैसे करें, अत्यधिक निष्क्रियता होगी। इस प्रकार यदि तुम इन बातों की सच्ची प्रकृति का पता लगाने में असमर्थ हो, तो तुम अपने अनुभव करने में संभ्रमित और अनाड़ी हो। यदि तुममें कोई वास्तविकता नहीं किंतु केवल वचन हैं, तो क्या यह ग़लती का संकेत नहीं है? तुम लोगों में, इस समूह में बहुत सी गलतियाँ दिखाई देती हैं। आज "सेवा करने वालों" के रूप में तुम लोग इस तरह की परीक्षाओं को प्राप्त करने में अक्षम हो, या अन्यथा परमेश्वर के वचनों से संबंधित अन्य शुद्धिकरणों की कल्पना करने या प्राप्त करने में अक्षम हो। तुम लोगों को उन बहुत सी बातों का पालन अवश्य करना चाहिए जिन्हें अभ्यास में लाने की तुम लोगों से अपेक्षा की जाती है। कहने का अर्थ है, कि लोगों को कई कर्तव्यों का अवश्य पालन करना चाहिए जो उन्हें करने चाहिए। इसी का लोगों को पालन करना चाहिए और इसे ही अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। पवित्रात्मा को वह करने दो जो पवित्रात्मा के द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए; मनुष्य उसमें कोई भूमिका नहीं निभा सकता है। मनुष्य को उस पर दृढ़ रहना चाहिए जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, जिसका पवित्रात्मा से कोई संबंध नहीं है। यह कुछ नहीं बल्कि वह है जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, और आज्ञा के रूप में उसका पालन किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे कि पुराने विधान की व्यवस्था का अनुपालन किया जाता है। यद्यपि अब व्यवस्था का युग नहीं है, किंतु फिर भी बहुत से वचन, व्यवस्था के युग के प्रकार के हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए, और उन्हें केवल पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने पर भरोसा करके पूरा नहीं किया जाता है, बल्कि वे हैं जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना चाहिए उदाहरण के लिए: तुम लोग व्यवहारिक परमेश्वर के कार्य की आलोचना नहीं करोगे। तुम लोग उस मनुष्य का विरोध नहीं करोगे जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। परमेश्वर के सामने, तुम लोग अपना स्थान बनाए रखोगे और स्वच्छंद नहीं होगे। तुम लोगों को वाणी से संयमित होना चाहिए, और तुम लोगों के वचनों और कार्यों को परमेश्वर द्वारा गवाही के लिए व्यक्ति की व्यवस्थाओं का पालन अवश्य करना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही का आदर करना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के काम और उसके मुँह से निकले वचनों की उपेक्षा नहीं करोगे। तुम लोग परमेश्वर के स्वर और कथनों के लक्ष्य की नकल नहीं करोगे। बाह्य रूप से तुम लोग ऐसा कुछ नहीं करोगे जो परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति का स्पष्ट रूप से विरोध करता हो। प्रत्येक व्यक्ति को इसका और इससे अधिक का पालन करना चाहिए। प्रत्येक युग में, परमेश्वर कई नियम निर्दिष्ट करता है जो व्यवस्था के अनुसार होते हैं, और मनुष्य के द्वारा पालन किए जाते हैं। इसके माध्यम से, वह मनुष्य के स्वभाव को विवश करता है और उसकी ईमानदारी का पता लगाता है। उदाहरण के लिए, पुराने विधान के युग के वचनों "अपने पिता और अपनी माँ का आदर करो" को लें। ये वचन आज लागू नहीं होते हैं; उस समय, वे मात्र मनुष्य के बाहरी स्वभाव को कुछ विवश करते थे, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास की ईमानदारी को प्रदर्शित करने के लिए उनका उपयोग किया जाता था और ये परमेश्वर पर विश्वास करने वालों के चिन्ह थे। यद्यपि अब राज्य का युग है, किंतु अब भी बहुत से ऐसे नियम है जिनका मनुष्य को अवश्य पालन करना चाहिए। अतीत के नियम लागू नहीं होते हैं; आज, मनुष्य के करने के लिए बहुत से, अधिक अनुकूल अभ्यास हैं, और जो कि आवश्यक हैं। वे पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल नहीं करते हैं और मनुष्य द्वारा ही अवश्य किए जाने चाहिए।

अनुग्रह के युग में व्यवस्था के युग के बहुत से अभ्यास हटा दिए गए हैं क्योंकि ये व्यवस्थाएँ उस समय के कार्य के लिए विशेष रूप से प्रभावी नहीं थीं। उन्हें हटाने के बाद, बहुत से अभ्यास निर्दिष्ट किए गए थे जो उस युग के लिए उपयुक्त थे। और जो आज बहुत से नियम बन गए हैं। जब आज का परमेश्वर आया, तो इन नियमों को छोड़ दिया गया, और इनके अनुपालन की अब और आवश्यकता नहीं थी, और आज के कार्य के लिए कई अनुकूल अभ्यास निर्दिष्ट कर दिए गए थे। आज ये अभ्यास नियम नहीं हैं, बल्कि एक प्रभाव प्राप्त करने के लिए हैं; ये आज के लिए अनुकूल हैं—और कल, शायद, ये नियम बन जाएँगे। कुल मिलाकर, तुम्हें उसका पालन करना चाहिए जो आज के कार्य में लाभदायक है। आने वाले कल पर ध्यान न दो: आज जो किया जाता है वह आज की खातिर है। हो सकता है कि कल बेहतर अभ्यास होंगे जिन्हे करने की तुम्हें आवश्यकता होगी—किन्तु उस पर अधिक ध्यान मत दो, उसका पालन करो जिसका पालन आज किया जाना चाहिए ताकि परमेश्वर का विरोध करने से बचा जाए। आज मनुष्य के लिए निम्नलिखित का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है: तुम्हें अवश्य परमेश्वर को धोखा नहीं देना या परमेश्वर से कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए जो तुम्हारी आँखों के सामने खड़ा है। तुम अपने सामने परमेश्वर के सम्मुख कोई भी गंदी या अहंकारी बात नहीं कहोगे। तुम परमेश्वर के भरोसे को जीतने के लिऐ, अपने भले कार्यों और अच्छे वचनों और अच्छे भाषणों के द्वारा अपनी आँखों के सामने परमेश्वर को धोखा नहीं दोगे। तुम परमेश्वर के सामने अनादरपूर्वक क्रिया नहीं करोगे। तुम उस सब का पालन करोगे जो परमेश्वर के मुँह से बोला जाता है और उसके वचनों का प्रतिरोध, विरोध, या उसके वचनों पर विवाद नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों का वह अर्थ नहीं लगाओगे जैसा तुम्हें उचित लगेगा। तुम्हें अपनी जिह्वा के प्रति सतर्क रहना चाहिए ताकि इसे तुम्हें शैतान की कपटपूर्ण योजनाओं का शिकार होने का कारण बनने से बचा सको। तुम्हारे लिए परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट सीमा का उल्लंघन करने से बचने के लिए तुम्हें अपने क़दमों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। ऐसा करना तुममें परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से अहंकारी और आडंबरपूर्ण वचनों को कहने का कारण बनेगा, और इसलिए तुम परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाओगे। तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों को लापरवाही से नहीं दोहराओगे, कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तुम्हारी हँसी उड़ाएँ, और शैतान तुम्हें मूर्ख बनाए। तुम आज के परमेश्वर के समस्त कार्य का आज्ञापालन करोगे। भले ही तुम उसको न समझ पाओ, किंतु तुम उस पर आलोचनात्मक राय नहीं बनाओगे; तुम केवल खोज और संगति कर सकते हो। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल स्थान का उल्लंघन नहीं करेगा। तुम मनुष्य की स्थिति से आज के परमेश्वर की सेवा करने से अधिक कुछ भी नहीं कर सकते हो। तुम मनुष्य की स्थिति से आज के परमेश्वर को सिखा नहीं सकते हो—ऐसा करना मार्ग से भटकना है। परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति के स्थान पर कोई भी व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है; तुम्हारे वचनों, कार्यों, और अंतर्तम विचारों में, तुम मनुष्य की स्थिति में स्थिर हो। इसका पालन किया जाना है, यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, यह किसी के द्वारा भी परिवर्तनीय नहीं है, और ऐसा करना प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। यह सभी को स्मरण रखना चाहिए।

परमेश्वर ने बोलते हुए और कथन कहते हुए जो लंबा समय व्यतीत किया है वह मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और उन्हें याद रखने के लिए उसका प्राथमिक कार्य मानने का कारण बना। कोई भी अभ्यास पर ध्यान नहीं देता है, यहाँ तक कि जिन बातों का तुम लोगों को पालन करना चाहिए तुम लोग नहीं करते हो, और इससे तुम लोगों की सेवा में बहुत सी कठिनाईयाँ और समस्याएँ आ गयी हैं। यदि परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से पहले तुमने उन बातों का पालन नहीं किया जिनका तुम्हें पालन करना चाहिए, तो तुम उन लोगों में से एक हो जो परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किए जाते हैं। इन अभ्यासों का पालन करने में, तुम्हें गंभीर और ईमानदार होना चाहिए। तुम्हें उन्हें बेड़ियाँ नहीं समझना चाहिए, बल्कि आज्ञाओं के रूप में उनका पालन करना चाहिए। आज, तुम्हें स्वयं को इस बात से चिंतित नहीं करना चाहिए कि कौन से प्रभाव प्राप्त किए जाने हैं; संक्षेप में, पवित्र आत्मा इसी प्रकार कार्य करता है, और जो कोई भी अपमान करता है, उसे अवश्य मरना चाहिए। पवित्र आत्मा भावना से रहित है, और तुम्हारी वर्तमान समझ से बेपरवाह है। यदि तुम आज उसका अपमान करते हो, तो वह तुम्हें दण्ड देगा। यदि तुम उसे उसके अधिकार क्षेत्र के दायरे के भीतर अपमानित करते हो, तो वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि यीशु के वचनों के तुम्हारे अनुपालन में तुम कितने गंभीर हो। आज, यदि तुम गलत करोगे, तो तुम्हारे साथ मृत्यु दण्ड का व्यवहार किया जाएगा। पालन नहीं करना तुम्हें कैसे स्वीकार्य हो सकता है? तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिए—भले ही इसका अर्थ कुछ तकलीफ़ सहना हो! इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कौन सा संप्रदाय, क्षेत्र, देश या पंथ है, भविष्य में इन सभी को इन अभ्यासों का पालन करना होगा। किसी को भी छूट नहीं है, और किसी को भी नहीं छोड़ा जाएगा! क्योंकि वे वही हैं जो आज पवित्र आत्मा करेगा, और वे सभी के लिए अपमान नहीं किए जाने योग्य हैं। यद्यपि ये बड़ी बातें नहीं हैं, फिर भी वे हर मनुष्य के द्वारा अवश्य की जानी चाहिए, और मनुष्य के लिए यीशु के द्वारा नियत की गई आज्ञाएँ हैं, जिसने पुनर्जीवित हो कर स्वर्ग में आरोहण किया था। क्या "मार्ग … (7)" यह नहीं कहता है कि यीशु की इस बात की परिभाषा कि तुम धर्मी हो या पापी आज परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार है? किसी को भी इस तथ्य की अनदेखी अवश्य नहीं करनी चाहिए। पुराने विधान में, पीढ़ी दर पीढ़ी फरीसियो ने परमेश्वर पर विश्वास किया, परंतु अनुग्रह के युग के आगमन के साथ वे यीशु को नहीं जानते थे, उन्होंने उसका विरोध किया। इससे ऐसा हुआ कि उन्होंने जो कुछ भी किया वह सब शून्य हो गया, और व्यर्थ हो गया, और परमेश्वर ने उसे स्वीकार नहीं किया। यदि तुम इसके वास्तविक स्वभाव को जान सको, तो तुम आसानी से पाप नहीं करोगे। बहुत से लोगों ने, शायद, स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध मापा है। परमेश्वर का विरोध करना कैसा लगता है, क्या यह कड़वा है या मीठा? तुम्हें यह समझना चाहिए—ऐसा ढोंग मत करो कि तुम नहीं जानते हो। कुछ लोग अपने हृदयों में न मानने वाले रहते हैं, फिर भी मैं सलाह देता हूँ कि तुम इसे प्रयास करके देखो—और देखो कि इसका स्वाद कैसा लगता है। यह कई लोगों को इसके बारे में शंकालु होने से रोकेगा। बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं फिर भी अपने हृदयों में गुप्त रूप से उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर का इस प्रकार विरोध करने के बाद, क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं होता है कि जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घोंप दिया गया हो? यदि यह पारिवारिक असमरसता नहीं है, तो यह शारीरिक कष्ट है, या पुत्रों और पुत्रियों का संताप है? यद्यपि तुम्हारी देह को मृत्यु से बचा दिया जाता है, किंतु परमेश्वर का हाथ तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा। क्या तुम्हें लगता है कि यह इतना आसान है? विशेष रूप से, कई लोगों के लिए जो परमेश्वर के निकट हैं, इस पर ध्यान केंद्रित करना यहाँ तक कि और भी अधिक आवश्यक है। समय बीतने के साथ-साथ, तुम इसे भूल जाओगे, और अनजाने में ही, तुम प्रलोभन में डूब जाओगे, तुम हर चीज के बारे में बेपरवाह हो जाओगे, और यह तुम्हारे पाप करने का आरंभ होगा। क्या यह तुम्हें मामूली लगता है? यदि तुम इसे अच्छी तरह से कर सकते हो, तब तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने—परमेश्वर के सामने परमेश्वर स्वयं के मुँह से मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर है। यदि तुम इसे महत्वपूर्ण नहीं मानते हो, तो तुम परेशानी में पड़ जाओगे—तुम परमेश्वर के अवज्ञाकारी होगे, तुम्हारे वचन और कार्य स्वच्छंद होंगे, और देर-सवेर तुम बड़ी आँधियों और बड़ी लहरों द्वारा बहा दिए जाओगे। इन बातों पर तुममें से हर एक को ध्यान देना चाहिए। हो सकता है कि वह मनुष्य जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी जाती है तुम्हारी निंदा नहीं करे, किंतु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ समाप्त नहीं होता है, वह तुम्हें क्षमा नहीं करेगा। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास वह है जो अपमान करने के लिए आवश्यक है? इसलिए, इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या कहता है, तुम्हें उसके वचनों को अभ्यास में अवश्य लाना चाहिए, और जिस किसी भी तरह से तुम पालन कर सकते हो तुम्हें पालन अवश्य करना चाहिए। यह कोई आसान मामला नहीं है!

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार तीन चेतावनियाँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है पतरस ने यीशु को कैसे जाना "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन

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