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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

युगों-युगों से, किसी भी मनुष्य ने राज्य में प्रवेश नहीं किया है और इसलिए किसी ने भी राज्य के युग के अनुग्रह का आनंद नहीं लिया है, किसी ने भी राज्य के राजा को नहीं देखा है। यद्यपि मेरे आत्मा की रोशनी में बहुत से लोगों ने मेरे राज्य की सुंदरता की भविष्यवाणी की है, किन्तु वे केवल उसके बाहरी रूप को जानते हैं, उसके भीतरी महत्व को नहीं। आज, जब राज्य पृथ्वी पर औपचारिक रूप में अस्तित्व में आता है, तो अधिकांश मानवजाति अभी भी नहीं जानती है की क्या संपन्न करना है, राज्य के युग के दौरान, कौन से क्षेत्र में अंततः मनुष्य को लाया जाना है। इसके बारे में, मुझे डर है कि सभी मनुष्य भ्रम की अवस्था में हैं। क्योंकि राज्य की संपूर्ण अनुभूति का दिन पूरी तरह से नहीं आया है, इसलिए सभी मनुष्य संभ्रमित हैं, इसे स्पष्ट रूप से देखने में असमर्थ हैं। दिव्यता में मेरा कार्य औपचारिक रूप से राज्य के युग के साथ आरंभ होता है। यह मेरे राज्य के युग के औपचारिक आरंभ के साथ है कि मेरा स्वभाव उत्तरोत्तर मनुष्यों पर प्रकट होना शुरू होता है। इस प्रकार इस क्षण पवित्र तुरही औपचारिक रूप से बजना और सभी को घोषित करना शुरू करती है। जब मैं औपचारिक रूप से अपनी सामर्थ्य को लूँगा और राज्य में राजा के रूप में राज करूँगा, तो मेरे सभी लोग मेरे द्वारा समय के साथ पूर्ण बना दिए जाएँगे। जब विश्व के सभी राष्ट्र तितर-बितर हो जाते हैं, यह ठीक तब होगा जब मेरा राज्य स्थापित होकर आकार ले लेगा और साथ ही जब मैं भी रूपान्तरित होकर समस्त विश्व की ओर मुड़ूँगा। उस समय, सभी लोग मेरा महिमामय चेहरा देखेंगें, मेरी सच्ची मुखाकृति देखेंगें। विश्व के सृजन से लेकर अब तक, मानवजाति शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट की गई है जैसी कि आज विद्यमान है। मनुष्य की भ्रष्टता के साथ मैं मनुष्यों से और भी अधिक छिप गया हूँ उनके लिये अधिक से अधिक अथाह बन गया हूँ। मनुष्य ने कभी भी मेरा वास्तविक चेहरा नहीं देखा है, कभी भी प्रत्यक्ष रूप से मेरे साथ बातचीत नहीं की है। केवल किंवदन्ती और मिथक में मनुष्य की कल्पनाओं का एक "मैं" रहा है। इसलिए मनुष्यों के मन में "मैं" को काबू करने के लिए मैं मानवीय कल्पनाओं के अनुरूप, अर्थात्, मानवीय धारणाओं के अनुरूप होता हूँ, ताकि मैं उस "मैं" की अवस्था को बदल सकूँ जिसे उन्होंने असंख्य वर्षों से आश्रय दिया हुआ है। यह मेरे कार्य का सिद्धान्त है। कोई एक भी व्यक्ति इसे पूरी तरह से जानने में समर्थ नहीं हुआ है। यद्यपि मनुष्यों ने अपने आप को मेरे सामने दंडवत किया है और वे मेरे सम्मुख मेरी आराधना करने आए हैं, फिर भी मैं मनुष्यों के इस तरह के कार्यों का आनंद नहीं लेता हूँ क्योंकि अपने हृदयों में वे मेरी छवि को नहीं, बल्कि मेरी बाहरी छवि को धारण करते हैं। इसलिये, उनके मन में मेरे स्वभाव का अभाव है, वे मेरे वास्तविक चेहरे के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। इसलिए, जब वे मानते हैं कि उन्होंने मेरा विरोध किया है या मेरी प्रशासनिक राजाज्ञा का अपमान किया है, तो मैं तब भी अपनी आँख मूँद लेता हूँ। और इसीलिए, उनके स्मृति में, मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो मनुष्यों को ताड़ित करने की अपेक्षा उन पर दया दिखाता है, या मैं परमेश्वर स्वयं हूँ जिसके कहने का आशय वह नहीं होता जो वो कहता है। ये सब मनुष्यों के विचारों में जन्मी कल्पनाएँ हैं और ये तथ्यों के अनुसार नहीं है।

मैं दिन प्रतिदिन ब्रह्माण्ड से ऊपर खड़ा हूँ, निरीक्षण कर रहा हूँ, और मनुष्य के हर कार्य का नज़दीकी से अध्ययन करते हुए, मानव जीवन का अनुभव करने के लिए, मैं नम्रतापूर्वक अपने निवास स्थान में अपने आप को छुपाता हूँ। किसी ने भी कभी भी अपने आपको वास्तव में मुझे अर्पित नहीं किया है। किसी ने भी कभी भी सत्य की खोज नहीं की है। कोई भी कभी भी मेरे लिए ईमानदार नहीं रहा है। किसी ने भी कभी भी मेरे सम्मुख संकल्प नहीं किए हैं और अपने कर्तव्य को बनाए नहीं रखा है। किसी ने भी कभी भी मुझे अपने भीतर निवास नहीं करने दिया है। किसी ने भी कभी भी मुझे वैसा मान नहीं दिया है जैसा वह अपने स्वयं के जीवन को देगा। किसी ने भी कभी भी मेरी संपूर्ण दिव्यता को व्यवहारिक वास्तविकता में नहीं देखा है। कोई भी कभी भी स्वयं व्यवहारिक परमेश्वर के संपर्क में रहने का इच्छुक नहीं रहा है। जब समुद्र मनुष्यों को पूर्णतः निगल लेता है, तो मैं उसे ठहरे हुए समुद्र में से बचाता हूँ और नए सिरे से जीवन जीने का अवसर देता हूँ। जब मनुष्य जीवित रहने के अपने आत्मविश्वास को खो देते हैं, तो मैं उन्हें, जीने की हिम्मत देते हुए, मृत्यु की कगार से खींच लाता हूँ, ताकि वे मुझे अपने अस्तित्व की नींव माने। जब मनुष्य मेरी अवज्ञा करते हैं, मैं उन्हें उनकी अवज्ञा में अपने को ज्ञात करवाता हूँ। मानवजाति की पुरानी प्रकृति के आलोक में और मेरी दया के आलोक में, मनुष्यों को मृत्यु प्रदान करने की बजाय, मैं उन्हें पश्चाताप करने और नई शुरूआत करने की अनुमति प्रदान करता हूँ। जब मनुष्य अकाल से पीड़ित होते हैं, तो जब तक उनकी एक भी साँस बची है, उन्हें शैतान की प्रवंचना का शिकार बनने से बचाते हुए, मैं उन्हें मुत्यु से हथिया लेता हूँ। कितनी ही बार लोगों ने मेरे हाथों को देखा है; कितनी ही बार उन्होंने मेरी दयालु मुखाकृति देखी है, मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा है; और कितनी बार उन्होंने मेरा प्रताप देखा और मेरा कोप देखा है। यद्यपि मानव जाति ने मुझे कभी नहीं जाना है, फिर भी मैं अनावश्यक परेशानी देने के लिए उनकी कमजोरियों का लाभ नहीं उठाता हूँ। मानव जाति के कष्टों का अनुभव करके, मैं इसलिए मनुष्यों की कमजोरियों के प्रति सहानुभूति रखता हूँ। यह केवल मनुष्य की अवज्ञा, उनकी कृतघ्नता की प्रतिक्रिया स्वरूप है, कि मैं विभिन्न अंशों में ताड़ना बाँटता हूँ।

मैं मनुष्य के व्यस्तता के समयों में अपने आपको छिपा कर रखता हूँ और उसके खाली समयों में अपने आपको प्रकट करता हूँ। मानव जाति मुझे अन्तर्यामी और परमेश्वर स्वयं होना कल्पना करती है जो सभी निवेदनों को स्वीकार करता है। इसलिए अधिकतर मेरे सामने केवल परमेश्वर की सहायता माँगने आते हैं, न कि मुझे जानने कि इच्छा के कारण से। जब बीमारी की तीव्र वेदना में होते हैं, तो मनुष्य अविलंब मेरी सहायता का निवेदन करते हैं। जब आपदा में होते हैं, तो अपनी पीड़ा से बेहतर ढंग से छुटकारा पाने के लिए, वे अपनी सारी परेशानियाँ अपनी पूरी शक्ति से मुझे बताते हैं। फिर भी एक भी मनुष्य सुख में होने के समय मुझसे प्रेम करने में समर्थ नहीं है। एक भी व्यक्ति अपने शांति और आनंद के समय में नहीं पहुँचा है ताकि मैं उनकी खुशी में सहभागी हो सकूँ। जब उनका सगा परिवार खुशहाल और ठीक होता है, तो मुझे प्रवेश करने से निषिद्ध करते हुए, मनुष्य पहले ही मुझे एक तरफ कर देते हैं या मेरे सामने द्वार बंद कर देते हैं, और इस प्रकार परिवार की धन्य खुशी का आनंद लेते हैं। मनुष्य का मन अत्यंत संकीर्ण है, यहाँ तक कि मुझ जैसे प्रेमी, दयालु और स्पर्शनीय परमेश्वर को रखने के लिए भी अत्यंत संकीर्ण है। कितनी बार मनुष्यों के द्वारा उनकी हँसी खुशी की बेला में मुझे अस्वीकार किया गया था; कितनी बार लड़खड़ाते हुए मनुष्य ने बैसाखी की तरह मेरा सहारा लिया था; कितनी बार बीमारी से पीड़ित मनुष्यों द्वारा मुझे चिकित्सक की भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया गया था। मानवजाति कितनी क्रूर है! सर्वथा अविवेकी और अनैतिक। यहाँ तक कि वे भावनाएँ भी महसूस नहीं की जा सकती हैं जिनसे मनुष्यों को सुसज्जित होना माना जाता है। वे किसी भी मानवीय भाव से लगभग रहित हैं। अतीत का विचार करो और वर्तमान से उसकी तुलना करो। क्या तुम लोगों के भीतर परिवर्तन हो रहे हैं? क्या उस अतीत का थोड़ा सा भी वर्तमान में कार्यशील है? या क्या वह अतीत अभी बदला जाना है?

संसार के ऊँच-नीच का अनुभव करते हुए, मैंने ऊँची पहाड़ियाँ और निचली घाटियाँ लाँघी हैं। मैं मनुष्यों के बीच भटका हूँ और मैं मनुष्यों के बीच कई वर्षों तक रहा हूँ, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि मानवजाति का स्वभाव थोड़ा सा ही बदला है। और यह ऐसा है मानो कि मनुष्य की पुरानी प्रकृति ने जड़ पकड़ ली हो और उनमें अंकुर आ गए हों। वे उस पुराने स्वभाव को बदलने में कभी भी समर्थ नहीं रहे हैं, केवल मूल नींव पर इसमें थोड़ा सा सुधार कर पाए हैं। जैसा कि लोग कहते हैं, कि सार नहीं बदला है, किन्तु रूप बहुत बदल गया है। ऐसा प्रतीत होता है, कि हर कोई, मुझे मूर्ख बनाने, मुझे चकित करने का प्रयास कर रहा है, ताकि वह चुपके से निकल जाए और मेरी सराहना पा सके। मैं लोगों कि चालों की ना तो प्रशंसा करता हूँ न ही उन पर ध्यान देता हूँ। क्रोधित होने की बजाय, मैं देखने किन्तु ध्यान न देने का दृष्टिकोण अपनाता हूँ। मैं मानव जाति को कुछ अंश तक ढिलाई देने की योजना बनाता हूँ और, तत्पश्चात्, सब मनुष्यों के साथ एक जैसा व्यवहार करता हूँ। चूँकि सभी मनुष्य आत्म-सम्मान-रहित, बेकार अभागे हैं, स्वयं को पसंद नहीं करते हैं, तो फिर नए सिरे से दया और प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उन्हें यहाँ तक कि मेरी आवश्यकता भी क्यों होगी? बिना अपवाद के, मनुष्य स्वयं को नहीं जानते हैं, और अपना महत्व नहीं जानते हैं। उन्हें अपने आप को तराजू में रखकर तौलना चाहिए। मानव जाति मुझ पर कोई ध्यान नहीं देती है, इसलिए मैं भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेता हूँ। मनुष्य मुझ पर कोई ध्यान नहीं देता है, इसलिए मुझे भी उन पर प्रयास लगाने की आवश्यकता नहीं है। क्या दोनों संसारों का यही सर्वोत्तम नहीं है? क्या यह तुम लोगों का, मेरे लोगों का वर्णन नहीं करता है? किसने मेरे सम्मुख संकल्प लिए हैं और उन्हें बाद में छोड़ा नहीं है? किसने इस या उस बात पर बार-बार संकल्प लेने के बजाय मेरे सामने दीर्घकालिक संकल्प लिए हैं? हमेशा, मनुष्य अपने सहूलियत के समयों में मेरे सम्मुख संकल्प करते हैं और विपत्ति के समयों पर उन्हें छोड़ देते हैं। बाद में वे अपने संकल्प को वापस लेते हैं और मेरे सम्मुख स्थापित करते हैं। क्या मैं इतना अनादरणीय हूँ कि मनुष्य द्वारा कूढ़े के ढेर से उठाये गए कचरे को यूँ ही स्वीकार कर लूँगा? कुछ मनुष्य अपने संकल्पों पर अडिग रहते हैं, कुछ शुद्ध होते हैं और कुछ अपने बलिदान के रूप में मुझे अपना सबसे बहुमूल्य अर्पित करते हैं। क्या तुम सभी लोग इसी तरह के नहीं हो? यदि, राज्य में मेरे लोगों में से एक के रूप में, तुम लोग अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ हो, तो तुम लोग मेरे द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिए जाओगे!

12 मार्च 1992

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार तीन चेतावनियाँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है पतरस ने यीशु को कैसे जाना "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन

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