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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

जब तुम रोते हुए इस संसार में आते हो, उस समय तुम अपना कार्य करना प्रारम्भ कर देते हो। तुम परमेश्वर की योजना और विधान में अपनी भूमिका को अपना लेते हो। तुम अपने जीवन की यात्रा प्रारम्भ कर देते हो। तुम्हारी कैसी भी पृष्ठभूमि हो और तुम्हारे सामने कैसी भी यात्रा हो, स्वर्ग में रखी हुई योजनाओं और प्रबंधों से कोई भी बचकर नहीं भाग सकता और कोई भी अपने भाग्य पर नियंत्रण नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी बातों पर शासन करता है वही केवल ऐसे कार्यों को करने के योग्य है। जब से मनुष्य अस्तित्व में आया, परमेश्वर अपने कार्य में लगा हुआ है, इस ब्रह्माण्ड का प्रबंधन करता और सभी बातों के परिवर्तन एवं संचालन में निर्देश देता है। सभी बातों की तरह, परमेश्वर से मनुष्य चुपचाप और अनजाने में मिठास, बारिश और ओस का पोषण प्राप्त करता है। सभी बातों के समान, मनुष्य अनजाने में परमेश्वर के हाथ की योजनाओं की अधीनता में रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में है और मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की आंखों के सामने है। चाहे तुम इस बात पर विश्वास करो या न करो, सभी चीजों में, चाहे वे जीवित हों या मृत, बदलाव, परिवर्तन, नवीनीकरण और विलोपन परमेश्वर की इच्छा से होता है। इस प्रकार से परमेश्वर सभी बातों पर शासन करता है।

जैसे-जैसे रात बढ़ती है, मनुष्य अनजान बना रहता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय यह नहीं जान पाता कि अंधकार कैसे बढ़ता है और कहां से यह आता है। जैसे चुपचाप रात ढल जाती है, मनुष्य दिन के उजियाले का स्वागत करता है, फिर भी मनुष्य का हृदय बहुत ही कम स्पष्ट या अवगत होता है कि यह उजियाला कहां से और कैसे आया, और इसने रात के अंधियारे को कैसे दूर कर दिया। इस प्रकार के दिन और रात के सतत बदलाव मनुष्य को एक अवधि से दूसरी अवधि में लेकर जाते हैं, समय के साथ आगे बढ़ते हैं, जबकि यह भी सुनिश्चित करते हैं कि सभी समय और अवधि के दौरान परमेश्वर के कार्य और उसकी योजनाएं पूरी होती रहें। मनुष्य सदियों से परमेश्वर के साथ चलता आया है, फिर भी मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर सभी बातों पर, जीवित प्राणियों के भाग्य पर शासन करता है या सभी बातों को परमेश्वर किस प्रकार से आयोजित या निर्देशित करता है। यह कुछ ऐसी बातें हैं जो अतीतकाल से आज तक मनुष्य नजरों में नहीं आ पाई हैं। जहाँ तक उस कारण की बात है, यह इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर के मार्ग बहुत ही भ्रान्तिजनक हैं, या क्योंकि परमेश्वर की योजना का अभी भी पूरा होना बाकी है, परन्तु इसलिए कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से अत्यधिक दूर है। इसलिए, हालांकि मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करता है, वह अनजाने में शैतान की सेवा में लगा रहता है। कोई भी सक्रिय तौर पर परमेश्वर के नक्शेकदमों या उपस्थिति नहीं खोजता है और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में नहीं रहना चाहता। परन्तु वे शैतान और दुष्टता की इच्छा पर भरोसा करने को तैयार रहते हैं ताकि इस संसार और दुष्ट मानवजाति के जीवन के नियमों का पालन करने के लिए अनुकूल बन जाएँ। इस बिन्दु पर, मनुष्य का हृदय और आत्मा शैतान के लिए बलिदान हो जाता है और वे उसके बने रहने का सहारा बन जाते हैं। इसके अलावा, मनुष्य का हृदय और आत्मा शैतान का निवास और उपयुक्त खेल का मैदान बन जाते हैं। इस प्रकार से, मनुष्य अनजाने में अपने मानव होने के नियमों की समझ, और मानव के मूल्य और उसके अस्तित्व के उद्देश्य को खो देता है। परमेश्वर से प्राप्त नियमों और परमेश्वर तथा मनुष्य के मध्य की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय से क्षीण होती जाती है और मनुष्य परमेश्वर पर अपना ध्यान केन्द्रित करना या उसे खोजना बंद कर देता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, मनुष्य समझ नहीं पाता कि परमेश्वर ने मनुष्य को क्यों बनाया है, न ही वह परमेश्वर के मुख से निकलने वाले शब्दों को समझ पाता है या न ही जो कुछ परमेश्वर से होता है उसे महसूस कर पाता है। मनुष्य परमेश्वर के नियमों और आदेशों का विरोध करना प्रारम्भ कर देता है; मनुष्य का हृदय और आत्मा शक्तिहीन हो जाते हैं... परमेश्वर अपनी मूल रचना के मनुष्य को खो देता है, और मनुष्य अपने प्रारम्भ के मूल को खो देता है। यही इस मानवजाति का दुख है। वास्तविकता में, प्रारम्भ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने मानवजाति के लिए त्रासदी का मंचन किया है जिसमें मनुष्य नायक और पीड़ित दोनों है और कोई भी उत्तर नहीं दे सकता कि इस त्रासदी का निर्देशक कौन है।

इस वृहद संसार में बार बार अनगिनत परिवर्तन हुए हैं। कोई भी मानवजाति की अगुवाई या निर्देश करने के योग्य नहीं है, सिर्फ़ ब्रह्माण्ड की सभी चीजों पर शासन करने वाला ही इसके योग्य है। कोई भी इतना शक्तिशाली नहीं है जो इस मानवजाति के लिए श्रम या तैयारियां कर सकता हो, फिर उसकी तो बात ही क्या जो इस मानवजाति को धरती के अन्याय से छुड़ाकर ज्योति की मंजिल की दिशा में अगुवाई कर सके। परमेश्वर मानवजाति के भविष्य को लेकर शोक प्रगट करता है और उसके पतन से दुखी होता है। वह मानवजाति के धीमी गति से गिरावट की ओर जाने और वापस न लौटने के मार्ग पर चलने को लेकर दुखी महसूस करता है। मानवजाति ने परमेश्वर के हृदय को तोड़ दिया है और उसको त्यागकर बुराई के पीछे चल पड़ी है। किसी ने भी इस बात पर कभी भी ध्यान नहीं दिया कि मानवजाति किस दिशा में जाएगी। इसी मुख्य वजह से ही परमेश्वर के क्रोध को कोई भी महसूस नहीं करता। परमेश्वर को प्रसन्न करने का मार्ग कोई नहीं तलाशता या न परमेश्वर के नज़दीक आने की चेष्टा करता है। इसके अलावा, कोई भी परमेश्वर के दुख और कष्ट को समझना ही नहीं चाहता। यहां तक कि परमेश्वर की आवाज़ सुनकर भी, मनुष्य परमेश्वर से दूर के रास्ते पर चलता ही रहता है, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचकर निकल जाता है और परमेश्वर के वचन से दूर हो जाता है और यहां तक कि वह अपने आप को शैतान को बेचना पसंद करता है, जो परमेश्वर का शत्रु है। और किसने इस पर विचार किया है कि परमेश्वर एक पश्चताप न करने वाले मनुष्य के साथ किस प्रकार का व्यवहार करेगा जिसने परमेश्वर को त्याग दिया है? कोई भी नहीं जानता कि बार बार स्मरण कराना और परमेश्वर के द्वारा प्रबोधन इसलिए दिया जाता है क्योंकि वह अपने हाथ में एक अद्वितीय आपदा लिए हुए है जो उसने तैयार की है, जो कि मनुष्य के हाड़-मांस और प्राण के लिए असहनीय होगी। यह आपदा न केवल देह के लिए दण्ड है वरन् आत्मा के लिए भी यह एक दण्ड है। तुम्हें इसे जानने की आवश्यकता हैः जब परमेश्वर की योजना निष्प्रभावी बना दी जाती है और जब उसका स्मरण कराना और प्रबोधन देना किसी प्रतिक्रिया को उत्पन्न नहीं करता, तो वह अपना कौन सा क्रोध प्रगट करेगा? यह ऐसा होगा जो किसी प्राणी ने पहले न तो कभी अनुभव किया गया होगा और न ही सुना होगा। इसलिए मैं कहता हूं कि यह आपदा अभूतपूर्व है और फिर कभी भी दोहराई नहीं जाएगी। क्योंकि परमेश्वर की योजना के भीतर केवल एक ही रचना और एक ही उद्धार है। यह पहला अवसर है और आखिरी भी। इसलिए, कोई भी इस प्रकार के इरादे और परमेश्वर की मानवजाति के उद्धार की उत्कृष्ट सम्भावना को समझ नहीं सकता है।

परमेश्वर ने इस संसार को बनाकर मनुष्य नामक प्राणी को इसमें बसाया, और उसे जीवन प्रदान किया। इसके बदले में, मनुष्य को माता-पिता और परिजन मिले और अब वह अकेला नहीं रहा। जब से मनुष्य ने इस भौतिक संसार पर अपनी पहली नज़र डाली, तो उसे परमेश्वर के विधान के भीतर ही अस्तित्व में रहने के लिए नियत किया गया था। यह जीवन की श्वास परमेश्वर की ओर से थी जो प्रत्येक जीवित प्राणी को युवावस्था की ओर बढ़ने में सहायता करती है। इस प्रक्रिया के दौरान, कोई भी यह विश्वास नहीं करता कि मनुष्य परमेश्वर के देखभाल में जीवित रहता और बढ़ता है। बल्कि, वे मानते हैं कि मनुष्य अपने माता-पिता के प्रेम और देखभाल में बढ़ता है, और उसका बढ़ना जीवन की प्रवृत्ति से संचालित होता है। इसका कारण यह है कि मनुष्य नहीं जानता है कि कौन जीवन देता है या वह कहां से आया, और इससे बेखबर है कि जीवन की प्रवृत्ति चमत्कारों को कैसे बनाती है। मनुष्य सिर्फ यह जानता है कि जीवन की निरंतरता के लिए भोजन आवश्यक है, यह कि जीवन के अस्तित्व का स्रोत दृढ़ता से आता है, और उसके मन का विश्वास उसके अस्तित्व की पूंजी है। मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह और प्रावधानों को महसूस नहीं करता है। मनुष्य इसलिए परमेश्वर के द्वारा उसे दिए हुए जीवन को व्यर्थ में गवां देता है... कोई भी मनुष्य जिस पर परमेश्वर दिन और रात नज़र रखे रहता है, उसकी आराधना करने के पहल नहीं करता। परमेश्वर अपनी योजना के तहत मनुष्यों के लिए लगातार कार्य करता रहता है जिसके लिए वह किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं करता है। वह इस आशा में इस कार्य को करता है कि एक दिन मनुष्य अपने स्वप्न से जागेगा और अचानक जीवन के मूल्यों और उद्देश्यों को समझ लेगा, उस कीमत को समझेगा जिस पर परमेश्वर ने मनुष्य को सब कुछ दिया है, और जानेगा कि कितनी उत्सुकता से परमेश्वर मनुष्य की राह देखता है कि वह उसके पास लौट आए। किसी ने कभी भी मनुष्य के जीवन की उत्पत्ति और निरंतरता के रहस्यों को नहीं जाना है। फिर भी, केवल परमेश्वर ही है जो मनुष्य की ओर से प्राप्त होने वाले दुखों और चोट को चुपचाप सहन करता है, जिसने परमेश्वर से सब कुछ प्राप्त किया परन्तु वह उसके प्रति कृतज्ञ नहीं है। मनुष्य अपने जीवन में आने वाली हर एक बात को यूं ही ले लेता है, और आदतन मनुष्य द्वारा परमेश्वर को धोखा दिया जाता है, उसे भुला दिया और उससे बलपूर्वक ले लिया जाता है। क्या परमेश्वर की योजना वाकई इतनी महत्वपूर्ण है? क्या मनुष्य, जीवित प्राणी जो परमेश्वर के हाथ से आया, सच में इतना महत्व रखता है? परमेश्वर की योजना अत्यंत महत्वपूर्ण है; और अपनी योजना के लिए ही परमेश्वर ने प्राणी की रचना की है। इसलिए, परमेश्वर मनुष्य से घृणा के कारण अपनी योजना को बर्बाद नहीं कर सकता। परमेश्वर अपनी योजना के लिये, जो श्वास उसने छोड़ी उसके लिए कष्ट उठाता है वह मनुष्य की देह के लिये नहीं बल्कि उसके जीवन के लिये ही इतने सब कष्ट उठाता है। वह मनुष्य के देह को नहीं बल्कि जीवन के रूप में जो श्वास उसने छोड़ा है, उसे वापिस लेना चाहता है। यही उसकी योजना है।

जो भी इस संसार में आता है उसे जीवन और मृत्यु का अनुभव करना आवश्यक है, और कई लोगों ने मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का अनुभव किया है। जो जीवित हैं वे जल्द ही मर जाएंगे और मरने वाले जल्द ही वापस आएंगे। परमेश्वर के द्वारा यह सब कुछ प्रत्येक जीवित प्राणी के लिए निर्धारित किया हुआ है। हालांकि, यह विषय और चक्र वे सत्य है जो परमेश्वर मनुष्य को दिखाना चाहता है, कि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा दिया हुआ जीवन अंतहीन और, देह, समय या स्थान से मुक्त है। यह जीवन का रहस्य परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया है और यह सिद्ध करता है कि जीवन उसी के द्वारा आता है। हालांकि कई लोग यह विश्वास नहीं करेंगे कि जीवन परमेश्वर की ओर से प्रदान किया जाता है, मनुष्य उसके अस्तित्व पर विश्वास करे या न करे, लेकिन वह निश्चय ही परमेश्वर की ओर से प्रदान की गई प्रत्येक चीज़ का आनन्द लेता है। अगर परमेश्वर का हृदय एक दिन अचानक परिवर्तित हो जाये और दुनिया में मौजूद प्रत्येक चीज़ को वह पुनः मांगे और जो जीवन उसने दिया उसे वापस ले ले, तब कुछ भी नहीं बचेगा। परमेश्वर अपने जीवन का प्रयोग सभी को पोषण प्रदान करने के लिये करता है, फिर वह चाहे सजीव हो या निर्जीव, सभी को अपने सामर्थ्य और अधिकार के बल से सही व्यवस्था में लाता है। यह एक सत्य है जो कोई भी आसानी से धारण नहीं कर सकता है या समझ नहीं सकता है और ये परमेश्वर के द्वारा जीवन शक्ति के न समझ में आने वाले सत्यों का सही प्रगटीकरण और आदेश है। अब मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूं: परमेश्वर के जीवन की महानता और सामर्थ्य किसी भी प्राणी के द्वारा मापी नहीं जा सकती। यह ऐसा ही है, ऐसा ही था और आने वाले समय में भी इसी प्रकार से रहेगा। और दूसरा रहस्य है: सभी प्राणियों के लिये परमेश्वर के द्वारा ही जीवन का स्रोत आता है, चाहे वह किसी भी रूप या स्वरूप में हो। तुम किसी भी प्रकार के प्राणी हो, तुम परमेश्वर के द्वारा निर्धारित जीवन के मार्ग को बदल नहीं सकते। किसी भी मामले में, मैं मनुष्य के लिए यही इच्छा करता हूं कि मनुष्य यह समझें कि बिना देखभाल, सुरक्षा और परमेश्वर के प्रावधान के, मनुष्य जो प्राप्त करने के लिए रचा गया है वह प्राप्त नहीं कर सकता, चाहे वह कितना भी अधिक प्रयास या संघर्ष कर ले। परमेश्वर की ओर से प्रदान किये गये जीवन के बिना, मनुष्य अपने जीवन के मूल्य और उद्देश्य को खो देता है। परमेश्वर ऐसे मनुष्य को कैसे लापरवाह होने दे सकता है जो अपने जीवन के मूल्य को व्यर्थ गंवा देता है? और फिर इस बात को भी न भूलो कि परमेश्वर तुम्हारे जीवन का मुख्य स्रोत है। यदि परमेश्वर ने जो कुछ भी मनुष्य को दिया है वह उसे संजो कर रखने में विफल रहता है तो जो कुछ परमेश्वर ने उसे दिया है वह उसे न केवल वापस ले लेगा, बल्कि उससे भी ज्यादा परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो कुछ भी खर्च किया है उसका दुगुना उसे भरना पड़ेगा।

मई 26, 2003

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार तीन चेतावनियाँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है पतरस ने यीशु को कैसे जाना "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन

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