परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" | अंश 92

तुम लोगों पर किया गया विजय का कार्य गहनतम अर्थ रखता है : एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को पूर्ण करना है, और इसलिए पूर्ण करना है, ताकि वे विजेताओं का एक समूह बन सकें—पूर्ण किए गए लोगों का प्रथम समूह, अर्थात प्रथम फल। दूसरी ओर, यह सृजित प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने देना, परमेश्वर के पूर्ण और महानतम उद्धार को प्राप्त करने देना और मनुष्य को न केवल उसकी दया और प्रेमपूर्ण करुणा का, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से ताड़ना और न्याय का अनुभव लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए कोई घृणा नहीं है। यहाँ तक कि जो ताड़ना और न्याय तुमने देखे हैं, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम, ऐसा प्रेम जो लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष गवाही देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने की नींव रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाना है, ताकि वे सामान्य लोगों की तरह जी सकें, क्योंकि लोग नहीं जानते कि कैसे जीएँ, और बिना मार्गदर्शन के तुम केवल खोखला जीवन जियोगे; तुम्हारा जीवन मूल्यहीन और निरर्थक होगा, और तुम एक सामान्य व्यक्ति बनने में बिलकुल असमर्थ रहोगे। यह मनुष्य को जीते जाने का गहनतम अर्थ है। तुम लोग मोआब के वंशज हो; तुममें जीते जाने का कार्य किया जाता है, तो वह एक महान उद्धार है। तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने वास्तव में गहन उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है, और क्या ऐसा उद्धार और भी बड़ा नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि कैसे जिया जाए, यहाँ तक कि तुम इससे बिलकुल भी अवगत नहीं हो, और चूँकि तुम इस दुराचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं दुराचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में लौट सकते हो! यदि तुम इस धारा में रहने और इस न्याय और अमित उद्धार का आनंद लेने, और मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जाने वाले इन सब आशीषों का और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम्हें कुछ कष्ट और शुद्धिकरण सहना पड़ सकता है, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा लोग शुद्ध, और निर्ममतापूर्वक उजागर किए जाते हैं—जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पापों का दंड देना, उनके देह को दंड देना है—फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह को नष्ट करने की सीमा तक नकारने के इरादे से नहीं है। वचन के समस्त गंभीर प्रकटीकरण तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से हैं। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यामिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और निस्संदेह तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम सहते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। इस उद्धार से तुम्हें सुख प्राप्त होना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

सबसे असल है परमेश्वर का प्रेम

ईश्वर के तुम सब में जीत के कार्य, ये कितना महान उद्धार है। तुम में से हर एक शख़्स, भरा है पाप और अनैतिकता से। अब तुम हुए रूबरू ईश्वर से, वो ताड़ना देता है और न्याय करता है। तुम पाते हो उसका महान उद्धार, तुम पाते हो उसका महानतम प्यार। ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है। ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार। ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है। ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

ईश्वर नहीं चाहता कि वो नष्ट करे मानवजाति को जिसे बनाया उसने अपने हाथों से। वो बचाने की पूरी कोशिश कर रहा है। तुम्हारे बीच में वह बोलता और काम करता है। ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है। ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

ईश्वर तुमसे नफरत नहीं करता है, उसका प्यार निश्चित ही है सबसे सच्चा। वो जांचता है क्योंकि मानव नाफ़रमानी करता है, ये बचाने की केवल एक ही राह है। क्योंकि तुम नहीं जानते कि कैसे जीना है, और तुम जीते हो ऐसी जगह में, मैली और पाप से भरी, उसे न्याय करना ही होगा तुम्हें बचाने को।

ईश्वर नहीं चाहता कि तुम नीचे गिरो, ना जीओ इस मैली जगह में, शैतान द्वारा कुचले या नर्क में गिर जाओ। मानव को बचाने के लिए है ईश्वर की जीत। ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है। ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार। ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है। ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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