परमेश्वर के दैनिक वचन | "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" | अंश 299

परमेश्वर की प्रबंधन योजना छह हजार वर्षों तक फैली है और उसके काम में अंतर के आधार पर तीन युगों में विभाजित है: पहला युग पुराने नियम का व्यवस्था का युग है; दूसरा अनुग्रह का युग है; और तीसरा वह है जो कि अंत के दिनों से संबंधित है—राज्य का युग। प्रत्येक युग में एक अलग पहचान को दर्शाया जाता है। यह केवल काम में अंतर के कारण है, अर्थात, काम की आवश्यकताएं। काम का पहला चरण इस्राएल में किया गया था, और यहूदिया में छुटकारे के काम का समापन करने का दूसरा चरण पूरा किया गया था। छुटकारे के काम के लिए, यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण से और एकमात्र पुत्र के रूप में हुआ था। यह सब काम की आवश्यकताओं के कारण था। अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने काम को अन्यजातियों के राष्ट्रों में विस्तारित करना और वहाँ के लोगों पर विजय प्राप्त करना चाहता है ताकि उसका नाम उनके बीच महान हो। वह मानव जीवन के सभी सही तरीकों को समझने के साथ ही सम्पूर्ण सत्य और जीवन के मार्ग को समझने के लिए मार्गदर्शन करना चाहता है। यह सब काम एक आत्मा द्वारा किया जाता है। वह अलग-अलग दृष्टिकोण से ऐसा करे तो भी, काम की प्रकृति और सिद्धांत एक समान रहते हैं। एक बार जब तुम उन कामों के सिद्धांतों और प्रकृति को देखते हो, जो उन्होंने किया है, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि इन सबके पीछे एक ही आत्मा का हाथ है। फिर भी कुछ लोग कह सकते हैं: "पिता पिता है; पुत्र पुत्र है; पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, और अंत में, वे एक बनेंगे।" तो तुम उन्हें एक कैसे बना सकते हो? पिता और पवित्र आत्मा को एक कैसे बनाया जा सकता है? यदि वे मूल रूप से दो थे, तो चाहे वे एक साथ कैसे भी जोड़ें जायें, क्या वे दो हिस्से नहीं बने रहेंगे? जब तुम उन्हें एक बनाने को कहते हो, तो क्या यह बस दो अलग हिस्सों को जोड़कर एक बनाना नहीं है? लेकिन क्या वे पूरे किए जाने से पहले वे दो भाग नहीं थे? प्रत्येक आत्मा का एक विशिष्ट सार होता है, और दो आत्माएं एक नहीं बन सकती हैं। आत्मा भौतिक वस्तु नहीं है और भौतिक दुनिया की किसी भी अन्य वस्तु के समान नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखते हैं, पिता एक आत्मा है, बेटा दूसरा, और पवित्र आत्मा एक और, फिर तीन आत्माएं एक साथ पूरे तीन गिलास पानी की तरह मिल कर पूरा एक बनते हैं। क्या यह तीन को एक बनाना नहीं है? यह एक गलत व्याख्या है! क्या यह परमेश्वर को विभाजित करना नहीं है? पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी को एक कैसे बनाया जा सकता है? क्या वे विभिन्न प्रकृति के तीन भाग नहीं हैं? अभी भी ऐसे लोग हैं जो कहते हैं, "क्या परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि यीशु उसका प्रिय पुत्र है?" "यीशु परमेश्वर का प्रिय पुत्र है, जिस पर वह प्रसन्न है" निश्चित रूप से परमेश्वर ने स्वयं ही कहा था। यह परमेश्वर की स्वयं के लिए गवाही थी, लेकिन केवल एक अलग परिप्रेक्ष्य से, स्वर्ग में आत्मा के अपने स्वयं के देहधारण को साक्ष्य देना। यीशु उसका देहधारण है, स्वर्ग में उसका पुत्र नहीं। क्या तुम समझते हो? यीशु के शब्द, "मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है," क्या यह संकेत नहीं देते कि वे एक आत्मा हैं? और यह देहधारण के कारण नहीं है कि वे स्वर्ग और पृथ्वी के बीच अलग हो गए थे? वास्तव में, वे अभी भी एक हैं; चाहे कुछ भी हो, यह केवल परमेश्वर की स्वयं के लिए गवाही है। युग में परिवर्तन, काम की आवश्यकताओं, और उसके प्रबंधन योजना के विभिन्न चरणों के कारण, जिस नाम से मनुष्य उसे बुलाता है वह भी अलग हो जाता है। जब वह काम के पहले चरण को करने के लिए आया था, तो उसे केवल यहोवा, इस्राएलियों का चरवाहा ही कहा जा सकता था। दूसरे चरण में, देहधारी परमेश्वर को केवल प्रभु और मसीह कहा जा सकता था। परन्तु उस समय, स्वर्ग में आत्मा ने केवल यह बताया था कि वह परमेश्वर का प्यारा पुत्र है, और उसने परमेश्वर का एकमात्र पुत्र होने का उल्लेख नहीं किया था। ऐसा हुआ ही नहीं था। परमेश्वर की एकमात्र सन्तान कैसे हो सकती है? तो क्या परमेश्वर मनुष्य नहीं बनता? क्योंकि वह देहधारण था, उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा गया, और इस से, पिता और पुत्र के बीच का संबंध आया। यह बस स्वर्ग और पृथ्वी के बीच विभाजन के कारण हुआ। यीशु ने देह के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना की। चूंकि उसने इस तरह की सामान्य मानवता के देह को धारण किया था, यह उस देह के परिप्रेक्ष्य से है जो उसने कहा: मेरा बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का है। चूंकि मैंने इस धरती पर आने के लिए देह धारण किया है, अब मैं स्वर्ग से बहुत दूर हूँ। इस कारण से, वह केवल पिता परमेश्वर के सामने देह के परिप्रेक्ष्य से ही प्रार्थना कर सकता था। यह उसका कर्तव्य था, और जो परमेश्वर के देहधारी आत्मा में होना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर नहीं है क्योंकि वह देह के दृष्टिकोण से पिता से प्रार्थना करता है। यद्यपि उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा जाता है, वह अभी भी परमेश्वर है, क्योंकि वह आत्मा का देहधारण है, और उसका सार अब भी आत्मा है। जैसे ही मनुष्य इसे देखता है, वह सोचता है कि वह क्यों प्रार्थना करता है यदि वह खुद परमेश्वर है। इसका कारण यह है कि वह देहधारी परमेश्वर, देह भीतर रह रहा परमेश्वर है, और स्वर्ग में आत्मा नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखता है, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी परमेश्वर हैं। केवल तीनों से एक बना ही सच्चा परमेश्वर समझा जा सकता है, और इस तरह, उनकी शक्ति असाधारण रूप से महान है। अभी भी ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि केवल इस तरह से वह सात गुना सशक्त आत्मा है। जब पुत्र ने अपने आने के बाद प्रार्थना की, तो वह आत्मा है जिससे उसने प्रार्थना की थी। वास्तव में, वह एक सृजित प्राणी होने के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना कर रहा था। क्योंकि शरीर संपूर्ण नहीं है, और वह संपूर्ण नहीं था और जब वह शरीर में आया तो उसमें कई कमजोरियां थीं। इस प्रकार वह देह में अपना कार्य करते हुए बहुत परेशान था। यही कारण है कि उसने अपने क्रूस पर चढ़ने से पहले पिताजी से तीन बार प्रार्थना की और साथ ही उससे पहले भी कई बार प्रार्थना की थी। उसने अपने शिष्यों के बीच प्रार्थना की; अकेले एक पहाड़ पर प्रार्थना की; उसने मछली पकड़ने वाली नाव पर सवार होकर प्रार्थना की; उसने कई लोगों के बीच प्रार्थना की; रोटी तोड़ते वक्त प्रार्थना की; और दूसरों को आशीष देते समय उसने प्रार्थना की। उसने ऐसा क्यों किया? वह आत्मा था जिससे उसने प्रार्थना की थी; वह आत्मा से प्रार्थना कर रहा था, स्वर्ग में परमेश्वर से, देह के परिप्रेक्ष्य से। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, यीशु काम के उस चरण में पुत्र बन गया। इस चरण में, हालांकि, वह प्रार्थना नहीं करता है। ऐसा क्यों है? इसका कारण है कि वह जो लाता है वह वचन का काम है, और वचन का न्याय और ताड़ना है। उसे प्रार्थना की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसकी सेवकाई को बोलना है। वह क्रूस पर नहीं चढ़ाया जाता है, और लोग उसे उन्हें नहीं सौंपते जो सत्ता में हैं। वह केवल अपना काम करता है और सब कुछ सही हो जाता है। जिस वक्त यीशु ने प्रार्थना की, तो वह स्वर्ग के राज्य के अवतरित होने के लिए, पिता की इच्छा पूरी होने के लिए और आने वाले काम के लिए पिता परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा था। इस चरण में, स्वर्ग का राज्य पहले ही उतर चुका है, तो क्या उसे अब भी प्रार्थना करने की ज़रूरत है? उसका काम युग खत्म करने का है, और अब कोई नया युग नहीं है, इसलिए क्या अगले चरण के लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता है? अफ़सोस कि ऐसा नहीं है!

मनुष्य के स्पष्टीकरण में कई विरोधाभास हैं। अवश्य, ये सभी मनुष्य के विचार हैं; बिना और किसी जाँच-पड़ताल के, तुम सभी को विश्वास होगा कि वे सही हैं। क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का त्रित्व के रूप में यह विचार मनुष्य की धारणा है? मनुष्य का कोई ज्ञान पूरा और संपूर्ण नहीं है। हमेशा अशुद्धियां होती हैं, और मनुष्य के पास बहुत अधिक विचार हैं; यह दर्शाता है कि एक सृजन किया गया प्राणी, परमेश्वर के काम की व्याख्या कर ही नहीं सकता है। मनुष्य के मन में बहुत कुछ है, सभी तर्क और विचार से आते हैं, जो सत्य के साथ संघर्ष करते हैं। क्या तुम्हारा तर्क परमेश्वर के काम का पूरी तरह से विश्लेषण कर सकता है? क्या तुम यहोवा के सभी कामों की समझ पा सकते हो? क्या यह तुम एक मानव हो कर सब कुछ देख सकते हो, या वह स्वयं परमेश्वर है जो अनन्त से अनन्त तक देखने में सक्षम है? क्या यह तुम हो जो बीते अनंत काल से आने वाले अनंत काल तक देख सकता है, या यह परमेश्वर है जो ऐसा कर सकता है? तुम्हारा क्या कहना है? परमेश्वर की व्याख्या करने के लिए तुम कैसे योग्य हो? तुम्हारे स्पष्टीकरण का आधार क्या है? क्या तुम परमेश्वर हो? स्वर्ग और पृथ्वी, और इसमें सब कुछ स्वयं परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी। यह तुम नहीं थे, जिसने यह किया था, तो तुम गलत स्पष्टीकरण क्यों दे रहे हो? अब, क्या तुम त्रित्व में विश्वास करते रहोगे? क्या तुम्हें नहीं लगता कि यह बहुत भारी है? यह तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा कि तुम एक परमेश्वर में विश्वास करो, न कि तीन में। हल्का होना सबसे अच्छा है, क्योंकि "प्रभु का भार हल्का है।"

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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