परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए" | अंश 353

प्रतिदिन उसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य के कार्यों और विचारों पर चिंतन किया जाता है और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी में जुट जाते हैं। यही वह मार्ग है जिस पर सभी जीवितों को चलना होगा और जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसमें किसी के लिए कोई छूट नहीं है। मैंने अनगिनित वचन कहे हैं और इसके साथ-साथ मैंने अनगिनत कार्य किये हैं। प्रतिदिन मैं देखता हूँ जब प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से वह सब कुछ करता है जिसे उसे अपने अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार करना है, और वह किस प्रकार विकसित होता जाता है। अनजाने में अनेक लोगों ने "सही मार्ग" पर पहले से ही चलना आरम्भ कर दिया है, जिसे मैंने हर प्रकार के मनुष्य के प्रकटन के लिए निर्धारित किया था। मैंने पहले से ही हर प्रकार के मनुष्य को अलग-अलग वातावरण में रखा है और अपने-अपने स्थानों में प्रत्येक मनुष्य अपनी अंतर्निहित विशेषताओं को प्रकट कर रहा है। उन्हें कोई बांध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे सम्पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं और वे जो अभिव्यक्त करते हैं वह स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होता है। केवल एक ही चीज़ है जो उनको नियन्त्रण में रखती है और वह है मेरे वचन। इसलिए असंख्य मनुष्य अप्रसन्नता से मेरे वचनों को पढ़ते हैं ताकि उनका अंत कहीं उनकी मृत्यु न हो, परन्तु मेरे वचनों को कभी भी अभ्यास में लाते नहीं हैं। दूसरी ओर, कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, अतः वे स्वाभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वे मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानवजाति की मंजिल, और मनुष्य होने के मूल्य की खोज करते जाते हैं। मानवजाति मेरे वचन की उपस्थिति में इससे अलग और कुछ नहीं है और मैं बस चीज़ों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूं। मैं ऐसा कुछ नहीं करता हूँ जो मनुष्य को उनके अस्तित्व के आधार के रूप में मेरे वचन के अनुसार जीने के लिए बाध्य करे। इस प्रकार वे जिनमें कभी विवेक नहीं रहा है या जिनके अस्तित्व का मूल्य नहीं है, शांतचित्त होकर चीज़ों को घटित होते देखते हैं और बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और जो चाहते हैं करते हैं। वे सत्य से और उन सब से जो मुझसे आता है, उकताने लगते हैं। इसके अतिरिक्त, वे मेरे घर में रहते हुए भी उकता जाते हैं। ये लोग भले ही सेवकाई कर रहे हों, फिर भी अपने लक्ष्य के लिए और दण्ड से बचने के लिए मेरे घर में अस्थायीतौर पर रहते हैं। परन्तु उनके इरादे कभी नहीं बदलते हैं और न ही उनके कार्य। यह आशीषों के लिए उनकी इच्छा को और प्रोत्साहित करता है, यह उस राज्य में एकतरफा यात्रा के लिए जहां वे अनंतकाल के लिये रह सकें और अनंत स्वर्ग में यात्रा के लिये भी। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी निकट आने की लालसा करते हैं, वे उतना ही अधिक महसूस करते हैं कि सत्य उनके लिए एक अवरोध और उनके मार्ग के लिए एक रोड़ा बन गया है। वे सत्य का अनुसरण या न्याय तथा ताड़ना को स्वीकार किए बगैर, और उन सब से बढ़कर, मेरे घर में समर्पित रूप से रहने की जरूरत को समझे बिना और जो आज्ञा मैं देता हूँ उसका पालन किए बिना, सदा-सर्वदा स्वर्ग के राज्य का आनन्द उठाने और राज्य में कदम रखने के लिए इन्तज़ार नहीं कर पाते हैं। ये लोग मेरे घर में प्रवेश न तो ऐसे हृदय की संतुष्टि के लिए करते हैं जो सत्य की खोज करता है और न ही मेरे प्रबन्धन के साथ मिलकर कार्य करने के लिए। वे महज उनमें से एक होने का लक्ष्य रखते हैं जिसे आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाता है। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, न ही अपनी भ्रष्टता की गहराई के चरम का एहसास किया है, फिर भी वे मेरे घर में अंत तक "सेवकों" के रूप में रहे। वे "धीरज से" मेरे दिन के आने का इन्तज़ार करते हैं और जब वे मेरे कार्य के तरीके के द्वारा यहाँ वहाँ उछाले जाते हैं तो वे थकते नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी कोशिश कितनी बड़ी है और उन्होंने उसकी क्या कीमत चुकाई है, कोई नहीं देखेगा कि उन्होंने सत्य के लिए कष्ट सहा है या मेरे लिए बलिदान किया है। अपने हृदय में, वे उस दिन को देखने का इन्तज़ार नहीं कर सकते हैं जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे बढ़कर, वे यह जानने के लिए बेचैन हैं कि मेरी सामर्थ और मेरा अधिकार कितना विशाल है। यह वो एक चीज़ है जिसमें बदलाव लाने और सत्य का अनुसरण करने के लिए उन्होंने कभी भी शीघ्रता नहीं की है। वे उससे प्रेम करते हैं जिससे मैं उकता गया हूँ और वे उससे उकता गए हैं जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी चाह करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ लेकिन साथ ही वे उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते तो हैं फिर भी इस संसार से कभी नफरत नहीं करते हैं और इस बात से बहुत भयभीत हैं कि इसे मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। उनके इरादे परस्पर विरोधी हैं: वे इस संसार से अतिप्रसन्न हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, फिर भी साथ ही वे मुझसे लालसा रखते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ। इस रीति से वे विनाश के कष्ट से बचा लिए जाएँगे और इससे पहले कि वे सत्य के मार्ग से भटक जाएँ, वे अगले युग के स्वामियों के रूप में रूपान्तरित कर दिए जाएँगे। यह इसलिए है क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और वह सब कुछ जो मुझ से आता है, वे उससे उकता गए हैं। शायद वे थोड़े से समय के लिए यह सोचकर "आज्ञाकारी लोग" बन जाएँगे कि कहीं आशीषों को खो न दें, लेकिन आशीषों के लिए उनकी चिंतित मानसिकता तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने और नाश होने का भय कभी धुंधला नहीं पड़ सकता। जैसे-जैसे मेरा दिन नज़दीक आता है, वैसे-वैसे उनकी इच्छा लगातार उत्कट होती जाती है। और विनाश जितना भयंकर होता है, उतना ही ज़्यादा यह उनको असहाय कर देता है और मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए जिनकी उन्होंने लम्बे समय से लालसा की है, उसके लिए वे यह नहीं जानते हैं कि कहाँ से प्रारम्भ करें। एक बार जब मेरा हाथ अपना काम करना प्रारम्भ कर देता है तो ये लोग एक अग्रगामी सैन्य टुकड़ी के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। वे बस सैन्य टुकड़ी की प्रथम पंक्ति में आने के बारे में सोचते हैं और यह सोचकर बहुत ज़्यादा भयभीत होते हैं कि मैं उन्हें नहीं देखूंगा। वे वही करते और कहते हैं जिसे वे सही समझते हैं; और यह नहीं जानते कि उनके कार्य कभी भी सत्य के अनुरूप नहीं रहे और वे मात्र मेरी योजनाओं में गड़बड़ी और हस्तक्षेप करने के लिए हैं। यद्यपि उन्होंने पुरजोर प्रयास किया है और शायद कठिनाई से होकर गुज़रने की उनकी इच्छा और इरादा सही हो, फिर भी जो कुछ वे करते हैं उनसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कार्य अच्छे इरादे के साथ किए गए हों और ऐसा तो बहुत ही कम हुआ जब मैंने उन्हें अपनी वेदी के ऊपर कुछ रखते हुए देखा हो। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उनके कार्य ऐसे ही हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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