परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है" | अंश 347

तुम लोगों की देह, तुम लोगों की अतिव्ययी इच्छाएँ, तुम लोगों का लोभ और तुम लोगों की वासना तुम लोगों में बहुत ही गहराई तक जमी हुई है। यह चीजें इतना निरंतर तुम लोगों के हृदयों को नियंत्रित कर रही है कि तुम लोग अपने उन सामंती और पतित विचारों के जूए को अपने ऊपर से उतार फेंकने के लिए शक्तिहीन हो। तुम लोगों में न तो अपनी वर्तमान स्थिति को बदलने की और न ही अंधकार के प्रभाव से बच निकलने की तड़प है। तुम लोग मात्र इन चीजों से बँधे हुए हो। यहाँ तक कि यदि तुम जानते भी हो कि इस प्रकार का जीवन अत्यधिक कष्टमय है और इस तरह की दुनिया अत्यधिक अंधकारमय है, तब भी, तुम लोगों में से सर्वथा किसी एक में भी इस प्रकार के जीवन को बदलने का साहस नहीं है। तुम लोग केवल इस प्रकार के वास्तविक जीवन से बच निकलने, पापशोधन स्थल से अपनी आत्माओं को छुड़ाने और एक शान्त, सुखद, स्वर्ग-समान वातावरण में जीने की अभिलाषा करते हो। तुम लोग अपने वर्तमान जीवन को बदलने के लिए कठिनाईयों को सहने के अनिच्छुक हो; न ही तुम लोग इस न्याय और ताड़ना के अंदर उस जीवन की खोज करने की इच्छा रखते हो जिसमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। बल्कि, तुम लोग देह से परे उस सुन्दर संसार के बारे में अवास्तविक स्वप्नों की कल्पना करते हो। जिस जीवन की तुम लोग अभिलाषा करते हो वह एक ऐसा जीवन है जिसे तुम बिना कोई पीड़ा सहे आसानी से प्राप्त कर सकते हो। यह पूरी तरह से अवास्तविक है! क्योंकि तुम लोग जो आशा करते हो वह देह में एक सार्थक जीवनकाल जीने के लिए और जीवनकाल के दौरान सत्य को प्राप्त करने के लिए, अर्थात्, सत्य का जीवन जीने और इंसाफ़ के लिए टिके रहने के लिए नहीं है। यह वह नहीं है जिसे तुम लोग उज्जवल, चकाचौंधा करने वाला जीवन मानोगे। तुम लोगों को लगता है कि यह एक भव्य या सार्थक जीवन नहीं होगा। तुम लोगों के लिए, ऐसा जीवन जीना वास्तव में अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचना नहीं है। भले ही तुम लोग आज इस ताड़ना को स्वीकार करते हो, फिर भी तुम लोग जिसकी खोज कर रहे हो वह सत्य को प्राप्त करना या वर्तमान में सत्य में जीना नहीं है, बल्कि इसके बजाय बाद में देह से परे एक सुखी जीवन में प्रवेश करने में समर्थ होना है। तुम लोग सत्य की तलाश नहीं कर रहे हो, न ही तुम लोग सत्य का पक्ष ले रहे हो, और तुम लोग निश्चित रूप से सत्य के लिए अस्तित्व में नहीं हो। तुम लोग आज प्रवेश की खोज नहीं कर रहे हो, किन्तु लगातार सोच रहे हो कि एक दिन आएगा जब तुम लोग स्वर्ग में ले जाए जाने की अपेक्षा करते हुए नीले आसमान की ओर देखोगे और कड़वे आँसू बहाओगे। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की ऐसी सोच पहले से ही वास्तविकता से परे है? तुम लोग सोचते रहते हो कि निसंदेह अनन्त दया और करूणा करने वाला उद्धारकर्ता एक दिन इस संसार में, कठिनाई और पीड़ा को सहने वाले तुम्हें, अपने साथ ले जाने के लिए आएगा, और यह कि वह निसंदेह तुम्हारे लिए बदला लेगा, जिसे सताया और उत्पीड़ित किया गया है। क्या तुम पाप से भरे हुए नहीं हो? क्या तुम अकेले हो जिसने इस संसार में दुःख झेला है? तुम स्वयं ही शैतान के अधिकार क्षेत्र में गिरे हो और तुमने दुःख झेला है, फिर भी तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारा बदला ले? जो परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने में असमर्थ है—क्या वह परमेश्वर का शत्रु नहीं है? जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है—क्या वह मसीह विरोधी नहीं है? तुम्हारे अच्छे कर्म क्या मायने रखते हैं? क्या वे परमेश्वर की आराधना करने वाले किसी हृदय का स्थान ले सकते हैं? तुम सिर्फ़ कुछ अच्छे कार्य करके परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त नहीं कर सकते हो; और क्योंकि तुम्हें उत्पीड़ित किया और सताया गया है सिर्फ़ इसलिए परमेश्वर तुम्हारे विरुद्ध अन्याय का बदला नहीं लेगा। जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और फिर भी परमेश्वर को नहीं जानते हैं, परन्तु जो अच्छे कर्म करते हैं—क्या वे सब भी ताड़ित नहीं किए जाते हैं? तुम सिर्फ़ परमेश्वर पर विश्वास करते हो, सिर्फ़ यह चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारे विरुद्ध हुए अन्याय का समाधान करे एवं बदला ले, और चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारी विपत्ति से तुम्हें छुटकारा प्रदान करे। परन्तु तुम सत्य पर ध्यान देने से इनकार करते हो; न ही तुममें सत्य को जीने की प्यास है। तुम इस कठिन, खोखले जीवन से बच निकलने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं हो। इसके बजाय, देह में अपना जीवन और अपने पापमय जीवन को जीते समय तुम अपेक्षापूर्वक परमेश्वर की ओर देखते हो कि वह तुम्हारे कष्टों को ठीक करे और तुम्हारे अस्तित्व के कोहरे को हटा दे। यह कैसे सम्भव है? यदि तुम सत्य को धारण करते हो, तो तुम परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हो। यदि तुम जीवन जीते हो, तो तुम परमेश्वर के वचन की अभिव्यक्ति हो सकते हो। यदि तुम्हारे पास जीवन है तो तुम परमेश्वर की आशीषों का आनन्द ले सकते हो। जो लोग सत्य को धारण करते हैं वे परमेश्वर के आशीष का आनन्द ले सकते हैं। परमेश्वर उनके कष्टों का निवारण सुनिश्चित करता है जो उसे सम्पूर्ण हृदय से प्रेम करते हैं और साथ ही कठिनाईयों और पीड़ाओं को सहते हैं, उनके नहीं जो केवल अपने आप से प्रेम करते हैं और शैतान के धोखों का शिकार हो चुके हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते उनमें अच्छाई कैसे हो सकती है? जो लोग केवल देह से प्रेम करते हैं उनमें धार्मिकता कैसे हो सकती है? क्या धार्मिकता और अच्छाई दोनों सत्य के संदर्भ में नहीं हैं? क्या ये परमेश्वर से सम्पूर्ण हृदय से प्रेम करने वालों के लिए आरक्षित नहीं हैं? जो लोग सच्चाई से प्रेम नहीं करते हैं और जो केवल सड़ी हुई लाशें हैं—क्या ये सभी लोग बुराई को आश्रय नहीं देते हैं? जो लोग सत्य को जीने में असमर्थ हैं—क्या वे सभी सत्य के बैरी नहीं हैं? और तुम्हारे बारे में क्या है?

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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