परमेश्वर के दैनिक वचन | "युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन" | अंश 343

मैंने पृथ्वी पर बहुत अधिक कार्य किया है और मैं बहुत वर्षों तक मानव-जाति के बीच चला हूँ, फिर भी लोगों को मेरे स्वरूप और स्वभाव का शायद ही कभी ज्ञान होता है, और कुछ ही लोग उस कार्य के बारे में बता सकते हैं, जो मैं करता हूँ। लोगों में बहुत चीज़ों की कमी है, उनमें इस बात की समझ की कमी हमेशा रहती है कि मैं क्या करता हूँ, और उनके दिल हमेशा सतर्क रहते हैं, मानो वे बहुत डरते हों कि मैं उन्हें किसी दूसरी स्थिति में डाल दूँगा और फिर उन पर कोई ध्यान नहीं दूँगा। इस प्रकार, मेरे प्रति लोगों का रवैया हमेशा सतर्कता की एक बड़ी मात्रा के साथ बहुत उदासीन रहता है। इसका कारण यह है कि मैं जो कार्य करता हूँ, लोग उसे समझे बिना वर्तमान तक आए हैं, और विशेषकर, वे उन वचनों से चकित हैं, जो मैं उनसे कहता हूँ। वे मेरे वचनों को यह जाने बिना अपने हाथों में रखते हैं, कि उन्हें इन पर अटल विश्वास करने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करना चाहिए, या अनिर्णय का विकल्प चुनते हुए उन्हें भूल जाना चाहिए। वे नहीं जानते कि उन्हें इन शब्दों को अभ्यास में लाना चाहिए या इंतजार करना और देखना चाहिए; उन्हें सब-कुछ छोड़कर बहादुरी से अनुसरण करना चाहिए, या पहले की तरह दुनिया के साथ मित्रता जारी रखनी चाहिए। लोगों की आंतरिक दुनिया बहुत जटिल है, और वे बहुत धूर्त हैं। चूँकि लोग मेरे वचनों को स्पष्ट या पूर्ण रूप से देख नहीं सकते, इसलिए उनमें से कई लोगों को अभ्यास करने में कष्ट होता है और अपना दिल मेरे सामने रखने में कठिनाई होती है। मैं तुम लोगों की कठिनाइयों को गहराई से समझता हूँ। देह में रहते हुए कई कमजोरियाँ अपरिहार्य होती हैं और कई वस्तुगत कारक तुम्हारे लिए कठिनाइयाँ पैदा करते हैं। तुम लोग अपने परिवार का पालन-पोषण करते हो, अपने दिन कड़ी मेहनत में बिताते हो, और तुम्हारा समय कठिनाई से गुजरता है। देह में रहने में कई कठिनाइयाँ हैं—मैं इससे इनकार नहीं करता, और तुम लोगों से मेरी अपेक्षाएँ निश्चित रूप से तुम्हारी कठिनाइयों के अनुसार हैं। मेरे कार्य की सभी अपेक्षाएँ तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद पर आधारित हैं। शायद अतीत में लोगों द्वारा अपने कार्य में तुम लोगों से की गई अपेक्षाएँ अत्यधिकता के तत्त्वों से युक्त थीं, लेकिन तुम लोगों को यह जान लेना चाहिए कि मैंने कभी भी अपने कहने और करने में तुम लोगों से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं कीं। मेरी समस्त अपेक्षाएँ लोगों की प्रकृति, देह और उनकी जरूरतों पर आधारित हैं। तुम लोगों को पता होना चाहिए, और मैं तुम लोगों को बहुत स्पष्ट रूप से बता सकता हूँ, कि मैं लोगों के सोचने के कुछ उचित तरीकों का विरोध नहीं करता, और न मैं मनुष्य की मूल प्रकृति का विरोध ही करता हूँ। ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि लोग नहीं समझते कि मेरे द्वारा उनके लिए निर्धारित मानक वास्तव में क्या हैं, और न वे मेरे वचनों का मूल अर्थ ही समझते हैं; लोग अभी तक मेरे वचनों के बारे में संदेह से ग्रस्त हैं, यहाँ तक कि आधे से भी कम लोग मेरे वचनों पर विश्वास करते हैं। शेष लोग अविश्वासी हैं, और ज्यादातर ऐसे हैं, जो मुझे "कहानियाँ कहते" सुनना पसंद करते हैं। इतना ही नहीं, कई लोग ऐसे भी हैं, जो इसे तमाशा समझकर इसका मजा लेते हैं। मैं तुम लोगों को सावधान करता हूँ : मेरे बहुत-से वचन उन लोगों के लिए प्रकट कर दिए गए हैं, जो मुझ पर विश्वास करते हैं, और जो लोग राज्य के सुंदर दृश्य का आनंद तो लेते हैं लेकिन उसके दरवाज़ों के बाहर बंद हैं, वे मेरे द्वारा पहले ही मिटा दिए गए हैं। क्या तुम लोग बस मेरे द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत मोठ घास नहीं हो? तुम लोग कैसे मुझे जाते देख सकते हो और फिर खुशी से मेरी वापसी का स्वागत कर सकते हो? मैं तुम लोगों से कहता हूँ, नीनवे के लोगों ने यहोवा के क्रोध भरे शब्दों को सुनने के बाद तुरंत टाट के वस्त्र और राख में पश्चात्ताप किया था। चूँकि उन्होंने उसके वचनों पर विश्वास किया, इसलिए वे भय और खौफ़ से भर गए और इसलिए उन्होंने तुरंत टाट और राख में पश्चात्ताप किया। जहाँ तक आज के लोगों का संबंध है, हालाँकि तुम लोग भी मेरे वचनों पर विश्वास करते हो, बल्कि इससे भी बढ़कर, यह मानते हो कि आज एक बार फिर यहोवा तुम लोगों के बीच आ गया है; लेकिन तुम लोगों का रवैया सरासर श्रद्धाहीन है, मानो तुम लोग बस उस यीशु को देख रहे हो, जो हजारों साल पहले यहूदिया में पैदा हुआ था और अब तुम्हारे बीच में उतर आया है। मैं गहराई से उस धोखेबाजी को समझता हूँ, जो तुम लोगों के दिल में मौजूद है; तुममें से अधिकतर लोग केवल जिज्ञासावश मेरा अनुसरण करते हैं और अपने खालीपन के कारण मेरी खोज में आए हैं। जब तुम लोगों की तीसरी इच्छा—एक शांतिपूर्ण और सुखी जीवन जीने की इच्छा—टूट जाती है, तो तुम लोगों की जिज्ञासा भी बिखर जाती है। तुम लोगों में से प्रत्येक के दिल के भीतर मौजूद धोखाधड़ी तुम्हारे शब्दों और कर्मों के माध्यम से उजागर होती है। स्पष्ट कहूँ तो, तुम लोग मेरे बारे में केवल उत्सुक हो, मुझसे भयभीत नहीं हो; तुम लोग अपनी जीभ पर काबू नहीं रखते और अपने व्यवहार को तो और भी कम नियंत्रित करते हो। तो तुम लोगों का विश्वास आखिर कैसा है? क्या यह वास्तविक है? तुम लोग सिर्फ अपनी चिंताएँ दूर करने और अपनी ऊब मिटाने के लिए, अपने जीवन में मौजूद खालीपन को भरने के लिए मेरे वचनों का उपयोग करते हो। तुम लोगों में से किसने मेरे वचनों को अभ्यास में ढाला है? वास्तविक विश्वास किसे है? तुम लोग चिल्लाते रहते हो कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, जो लोगों के दिलों में गहराई से देखता है, परंतु जिस परमेश्वर के बारे में तुम अपने दिलों में चिल्लाते रहते हो, उसकी मेरे साथ क्या अनुरूपता है? जब तुम लोग इस तरह चिल्लाते हो, तो फिर वैसे कार्य क्यों करते हो? क्या यही वह प्रेम है, जो तुम लोग मुझे प्रतिफल में चुकाना चाहते हो? तुम्हारे होंठों पर समर्पण की कोई छोटी मात्रा नहीं है, लेकिन फिर तुम लोगों के बलिदान और अच्छे कर्म कहाँ हैं? अगर तुम्हारे शब्द मेरे कानों तक न पहुँचते, तो मैं तुम लोगों से इतनी नफरत कैसे कर पाता? यदि तुम लोग वास्तव में मुझ पर विश्वास करते, तो तुम इस तरह के संकट में कैसे पड़ सकते थे? तुम लोगों के चेहरों पर ऐसे उदासी छा रही है, मानो तुम अधोलोक में खड़े परीक्षण दे रहे हो। तुम लोगों के पास जीवन-शक्ति का एक कण भी नहीं है, और तुम अपनी आंतरिक आवाज़ के बारे में क्षीणता से बात कर रहे हो; यहाँ तक कि तुम शिकायत और धिक्कार से भी भरे हुए हो। मैं जो करता हूँ, उसमें तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपना विश्वास खो दिया था, यहाँ तक कि तुम्हारा मूल विश्वास भी गायब हो गया है, इसलिए तुम अंत तक संभवतः कैसे अनुसरण कर सकते हो? ऐसी स्थिति में तुम लोगों को कैसे बचाया जा सकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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