परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम किसके प्रति वफादार हो?" | अंश 333

यदि अब मुझे तुम्हारे सामने कुछ धन-सम्पत्ति रखनी होती और तुम से कहना होता कि खुलकर चुनिए, यह जानते हुए कि मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराऊँगा, तो बहुतेरे धन-सम्पत्ति को चुनते और सत्य को छोड़ देते। पर तुम से बेहतर वे होंगे जो धन-सम्पत्ति को छोड़ कर अनिच्छा से सत्य को चुनेंगे, जबकि वे जो दोनों के बीच हैं, वे एक हाथ से धन-सम्पत्ति को पकड़ेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह से, क्या तुम्हारा असली स्वभाव प्रकट नहीं होता? जब सत्य और किसी अन्य चीज़ के बीच, जिसके प्रति तुम वफादार हो, चयन करते समय तुम सभी ऐसा ही निर्णय लोगे, और तुम्हारी मानसिकता वही रहेगी। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम में बहुतेरे ऐसे नहीं हैं जो सही या ग़लत के बीच में झूल गए? सकारात्मक और नकारात्मक, तथा काले और सफेद के बीच प्रतियोगिता में, तुम निश्चित तौर पर अपने उन चुनावों से परिचित हो जो तुमने परिवार और परमेश्वर, संतान और परमेश्वर, शांति और बिखराव, धन-सम्पत्ति और ग़रीबी, पदस्थिति और सामान्य स्थिति, समर्थन दिए जाने और अलग फेंक दिए जाने इत्यादि के बीच किया है। शांतिपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच, तुमने बेझिझक पहले को चुना, और वह भी बिना किसी संकोच के; धन-सम्पत्ति और कर्तव्यों के बीच, तुमने फिर से पहले को चुना, और तुम में किनारे पर पहुँचने की इच्छा भी कम है; भोग-विलास और ग़रीबी के बीच, तुमने फिर से पहले को चुना; बेटे, बेटियों, पत्नियों और मेरे बीच में, तुमने पहले को चुना; धारणा और सत्य के बीच में, तुमने एक बार फिर पहले को चुना। तुम्हारी हर प्रकार की बुराइयों का सामना करते हुए भी, मेरा विश्वास तुम में कम नहीं हुआ है। मैं बहुत ज़्यादा आश्चर्यचकित हूँ कि तुम्हारा हृदय कोमल होने से इतना प्रतिरोध करता है। सालों के अथक प्रेम और प्रयास ने मुझे प्रकट रूप में केवल तुम्हारा तिरस्कार और निराशा ही प्रदान की है। फिर भी मेरी आशाएँ हर गुज़रते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन तो पहले से ही हर किसी के सामने पूरी तरह से रख दिया गया है। तो भी, तुम लगातार उसकी खोज करते हो जो अंधकार और बुराई से सम्बंध रखता है, और वह तुम पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देता है। अगर ऐसा है, तो तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुमने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? यदि तुम्हें फिर से चुनने को कहा जाए, तो तुम्हारी स्थिति क्या होगी? तो क्या पहले जैसी ही होगी? जो तुम मुझे दोगे क्या वह तब भी निराशा और अति दुखदायी कष्ट होगा? क्या तुम्हारे हृदयों में थोड़ा-सा भी उत्साह होगा? क्या तुम तब भी नहीं जानोगे कि मेरे हृदय को सुकून देने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? इस समय, तुम्हारा चुनाव क्या है? क्या तुम मेरे वचनों के प्रति अपना सर्मपण करोगे या उनसे उकता जाओगे? मेरे दिन को तुम सब की आँखों के सामने रख दिया गया है, और जिसका तुम सामना करते हो वह नया जीवन और एक नई शुरूआत है। तो भी, मुझे तुम्हें बताना होगा कि यह शुरूआत पुराने कामों को प्रारम्भ करने के लिए नहीं है, बल्कि पुराने कामों का अंत है, अर्थात् यह अंतिम कार्य है। मेरा ख्याल है तुम सब लोग समझ जाओगे कि इस आरम्भिक बिंदु के बारे में असाधारण क्या है। परन्तु जल्द ही एक दिन, तुम इस शुरूआती बिन्दु के अर्थ को समझ जाओगे, अतः आइए हम एक साथ उस से होकर गुज़र जाएँ और अगले अंत से परिचित हो जायें। फिर भी, जिस बात से मैं निरन्तर बेचैन हो जाता हूँ वह यह है कि जब अन्याय और न्याय का सामना होता है, तो तुम हमेशा पहले को चुनते हो। परन्तु यह तो तुम्हारे भूतकाल की बात थी। साथ ही, मैं यह आशा करता हूँ कि उन बातों को एक एक करके अपने दिमाग से बाहर कर दूँ जो तुम्हारे भूतकाल में घटी थी, भले ही ऐसा करना बहुत कठिन है। फिर भी मेरे पास उसे करने का एक अच्छा कारण है। भविष्य को भूतकाल का स्थान लेने दो और आज अपने सच्चे व्यक्तित्व के बदले में अपने भूतकाल की छाया को हटने दो। इसका मतलब है कि मुझे तुम्हें परेशान करना होगा कि तुम एक बार फिर चुनाव करो और यह देखो कि तुम किसके प्रति वफादार हो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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