परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" | अंश 318

परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास, सत्य की तुम्हारी खोज, और यहाँ तक कि जिस तरह से तुम आचरण करते है वे सभी वास्तविकता पर आधारित होने चाहिएः जो कुछ भी तुम करते हो वह व्यवहारिक होना चाहिए, और तुम्हें भ्रामक, काल्पनिक बातों की खोज नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार से व्यवहार करने का कोई महत्व नहीं है, और, इसके अलावा, इस प्रकार के जीवन का कोई महत्व नहीं है। क्योंकि तुम्हारी खोज और जीवन केवल मिथ्या और कपट के बीच व्यतीत होता है, और तुम उन चीजों की खोज नहीं करते हो जो महत्वूपर्ण और मूल्यवान हैं, इसलिए तुम्हें केवल अनर्गल तर्क-वितर्क और सिद्धान्त प्राप्त होते हैं जो सत्य से संबंधित नहीं होते हैं। इस प्रकार की चीजों का तुम्हारे अस्तित्व के महत्व और मूल्य से कोई संबंध नहीं होता है और ये तुम्हारे लिए केवल खोखला अधिकार ला सकती हैं। इस तरह, तुम्हारा सम्पूर्ण जीवन बिना मूल्य और महत्व का हो जाएगा—और यदि तुम सार्थक जीवन की खोज नहीं करते हो, तो तुम सौ वर्षों तक भी जीवित रह सकते हो किन्तु यह सब व्यर्थ का होगा। इसे मानव जीवन कैसे कहा जा सकता है? क्या यह वास्तव में एक जानवर का जीवन नहीं है? इसी प्रकार से, यदि तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग का अनुसरण करने का प्रयास तो करते हो, किन्तु उस परमेश्वर को खोजने का कोई प्रयास नहीं करते हो जिसे देखा जा सकता है, और इसके बजाय अदृश्य एवं अमूर्त परमेश्वर की आराधना करते हो, तो क्या इस प्रकार की खोज और भी अधिक व्यर्थ नहीं है? अंत में, तुम्हारी खोज खण्डहर का ढेर बन जाएगी। इस प्रकार की खोज तुम्हारे किस लाभ की है? मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों को प्यार करता है जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता है, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और मनुष्य के द्वारा अकल्पनीय एवं नश्वर मात्र द्वारा अप्राप्य हैं। जितनी अधिक अवास्तविक ये वस्तुएँ होती हैं, उतना ही अधिक मनुष्य के द्वारा विश्लेषित की जाती हैं, जिनकी वह सभी से बेपरवाह हो कर भी खोज करता है, और अपने आप को भुलावे में रखता है कि वह इन्हें प्राप्त करने में सक्षम है। जितना अधिक अवास्तविक ये होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से मनुष्य उनकी जाँच करता है और, यहाँ तक कि इतना दूर तक जा कर उनका विश्लेषण करता है, कि उनके बारे में अपने स्वयं की विस्तृत अवधारणाएँ बनाता है। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती है, मनुष्य प्रायः उतना ही अधिक उनके प्रति उपेक्षापूर्ण होता है; वह केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखता है और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाता है। क्या यही प्रवृत्ति तुम लोगों की उस वास्तविक कार्य के प्रति नहीं है जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तवकि होती हैं, तुम लोग उतना ही अधिक उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम लोग उनकी जाँच करने के लिए अपना कोई भी समय नहीं निकालते हो, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन वास्तविक, सीधी-सादी अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो जो कि सर्वाधिक वास्तविक है, और केवल उसकी वास्तविकता और समान्यता को स्वीकार करने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग अज्ञातता के बीच विश्वास नहीं करते हो? अतीत में तुम लोगों का अज्ञात परमेश्वर में अविचल विश्वास था, और तुम लोगों की आज के वास्तविक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं थी। क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कल का परमेश्वर स्वर्ग का उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर छोटा सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि मनुष्यों के द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उसकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न वास्तविक देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसकी खोज नहीं करता है? क्योंकि आज का परमेश्वर मनुष्य से जो कहता है वह ठीक वही है जिसे करने का मनुष्य सबसे अधिक अनिच्छुक है, और जो उसे लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह मनुष्यों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह उसके दागों को उघाड़ना नहीं है? इस प्रकार से, अधिकांश लोग जो वास्तविकता की खोज नहीं करते हैं वे देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक प्रकट सत्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर को अभी देहधारी बनना था, तो तुमने किसी धार्मिक व्यक्ति, या किसी श्रद्धालु विश्वासी को देखा होगा। परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, इस प्रकार के कई श्रद्धालु विश्वासी अनजाने में मसीह विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तुम वास्तविकता पर ध्यान नहीं देते हो या सत्य की खोज नहीं करते हो, बल्कि इसके बजाय तुम झूठ से ग्रस्त हो जाते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है? देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तो क्या वे सभी जो देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं मसीह विरोधी नहीं हैं? और इसलिए क्या तुम जिस पर विश्वास करते हो और जिससे प्रेम करते हो वह सच में यह देहधारी परमेश्वर है? क्या यही वास्तव में जीवित, श्वास लेता हुआ वह परमेश्वर है जो बहुत ही वास्तविक और असाधारण रूप से सामान्य है? तुम्हारी खोज का वास्तव में उद्देश्य क्या है? क्या यह स्वर्ग में है या पृथ्वी पर है? क्या यह एक धारणा है या क्या यह एक सत्य है? क्या यह परमेश्वर है या कोई अलौकिक प्राणी है? वास्तव में, सत्य जीवन की सर्वाधिक वास्तविक सूक्ति है, और मानवजाति के बीच इस तरह की सूक्तियों में सर्वोच्च है। क्योंकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, और परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया कार्य है, इस लिए इसे जीवन की सूक्ति कहा जाता है। यह कोई ऐसी सूक्ति नहीं है जिसे किसी चीज में से संक्षिप्त किया गया है, न ही यह किसी महान व्यक्ति के द्वारा कहा गया प्रसिद्ध उद्धरण है; इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी, तथा सभी चीजों के स्वामी का मानवजाति के लिए कथन है, न कि मनुष्य द्वारा सारांश किए गए कुछ वचन, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे समस्त जीवन की सूक्तियों का उच्चतम कहा जाता है। मनुष्य की सत्य को अभ्यास में लाने की खोज उसके कर्तव्य का प्रदर्शन है, अर्थात्, परमेश्वर की अपेक्षा को संतुष्टि करने की खोज है। इस अपेक्षा का सार, किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किए जाने योग्य खोखले सिद्धान्त के बजाए, सभी सत्यों में सबसे अधिक वास्तविक है। यदि तुम्हारी खोज सिद्धान्त के अलावा कुछ नहीं है और वास्तविकता से युक्त नहीं है, तो क्या तुम सत्य के विरुद्ध विद्रोह नहीं करते हो? क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य पर आक्रमण करता है? इस प्रकार का व्यक्ति कैसे परमेश्वर के प्रेम की खोज कर सकता है? जो लोग वास्तविकता के बिना हैं ये वे लोग हैं जो सत्य के साथ विश्वासघात करते हैं, और सभी अंतर्निहित रूप से विद्रोही हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

सत्य जीवन का सबसे ऊंचा सूत्र है

"सत्य" जीवन के सब सूत्रों में सबसे सच्चा है, और मानवता में सबसे ऊंचा है। जीवन का वह सूत्र है क्योंकि वो है, वो है जो परमेश्वर इंसान से चाहता और वह काम जो उसने खुद किया है, परमेश्वर इंसान से चाहता और वह काम जो उसने खुद किया है। यह किन्हीं बातों से बनाई उक्ति नहीं है, ना कहावत किसी महत की, महत की। पर यह कथन है मानव जाति को, आकाश और धरती के स्वामी का।

ये मनुष्यों द्वारा जोड़े गए शब्द नहीं, यह जीवन है प्रभु का, स्वयं प्रभु। इसलिए जीवन के सब सूत्रों में सबसे ऊंचा है। सत्य का अभ्यास है फर्ज अपने पूरे करना, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करना। यह किन्हीं बातों से बनाई उक्ति नहीं है, ना कहावत किसी महत की, महत की। पर यह कथन है मानव जाति को, आकाश और धरती के स्वामी का।

इन "अपेक्षाओं" का मर्म है सबसे असली सत्य, ना कि खाली सिद्धांत जो हो नायाब। यह किन्हीं बातों से बनाई उक्ति नहीं है, ना कहावत किसी महत की, महत की। पर यह कथन है मानव जाति को, आकाश और धरती के स्वामी का। यह किन्हीं बातों से बनाई उक्ति नहीं है, ना कहावत किसी महत की, महत की। पर यह कथन है मानव जाति को, आकाश और धरती के स्वामी का।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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