परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है" | अंश 571

अगर तुम परमेश्वर के वचनों से परमेश्वर की इच्छा को और उसके कथनों के पीछे के अभिप्रायों को नहीं समझते हो, अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिसे उसके वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, अगर तुम इन बातों को नहीं समझते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह अपने हर वचन में इतना ईमानदार और निष्कपट क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर की इच्छा या उसके इरादों को नहीं समझते हो, तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो। अगर तुम यह समझ नहीं पाते हो, तो तुम सत्य को कैसे प्राप्त कर सकते हो? सत्य को प्राप्त करने का अर्थ है परमेश्वर द्वारा बोले जाने वाले हर वचन के माध्यम से परमेश्वर के अर्थ को समझना; इसका अर्थ है समझ लेने के बाद तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने में समर्थ हो ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को जी सको और वे तुम्हारी वास्तविकता बन जायेँ। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो। मात्र कुछ शब्द और सिद्धान्त समझकर तुम सोचते हो कि तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास वास्तविकता है। यहाँ तक कि तुम कहते हो, "परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार हों और हमने इसका अभ्यास किया है।" लेकिन तुम इसका कारण समझने में असफल हो जाते हो कि परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग ईमानदार हों और कपटी न हों, और साथ ही परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग उससे प्रेम करें। वास्तव में, लोगों से ऐसी अपेक्षा रखने में परमेश्वर का उद्देश्य है उनका उद्धार करना और उन्हें पूर्ण बनाना।

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जिनमें सत्य की प्यास है, जो सत्य खोजते हैं और जो सत्य से प्रेम करते हैं। वे लोग जो शब्दों और सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में गलत दृष्टिकोण रखते हैं; जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग केवल परमेश्वर के वचनों पर शोध करना जानते हैं और अध्ययन करते हैं कि वह आशीष पाने के बारे में और मनुष्य के गंतव्य के बारे में क्या कहता है। अगर परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और अपना अनुसरण बंद कर देते हैं। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को गंभीरता से नहीं लेते; वे बस अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छे कर्म करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और दूसरों के सामने खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंज़िल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, सभी के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, उन्हें सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कुछ अन्य लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस बिना रुचि के काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालांकि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम आवश्यक रूप से सत्य को न तो समझोगे, न सत्य को प्राप्त करोगे। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और सिद्धांतों को हासिल किया है। तुम नहीं जानते कि सत्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है। तुम अपनी हथेलियों में परमेश्वर के वचनों को रख सकते हो, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद भी तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में विफल रहते हो, तुम केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों को ही प्राप्त करते हो। सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। कई वर्षों के अनुभव के बगैर, तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य को ही पूरी तरह अनुभव करने में तुम्हारा पूरा जीवन-काल लग जाएगा। तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, लेकिन परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; तुमने उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझा है जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं। अगर तुम इनमें से कुछ भी नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को कैसे समझ सकते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम अभी भी बिलकुल बदले नहीं हो, न ही तुमने कोई प्रगति की है। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। तुम्हारे और परमेश्वर के बीच, पहले की ही तरह, अभी भी रुकावटें हैं। तुम्हें अभी भी उस पर संदेह है। न केवल तुम परमेश्वर को समझते नहीं हो, बल्कि तुम उसे बहाने देते हो और उसके प्रति धारणाएँ पालते हो। तुम उसका विरोध करते हो और उसका तिरस्कार भी करते हो। इसका अर्थ यह कैसे हो सकता है कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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