परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है" | अंश 565

स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर से प्रकाशनों के अनुसार होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के घृणास्पद स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाने के बाद, और तुम्हारे वास्तव में स्वयं से पूरी तरह से नफ़रत करने और शरीर से मुँह मोड़ने में सक्षम हो जाने पर, लगातार परमेश्वर के वचन का पालन करो, और पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने की इच्छा रखो, तब तुम पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके होगे। परमेश्वर के अनुग्रह के बिना, और पवित्र आत्मा से प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त किए बिना, इस मार्ग पर चलना मुश्किल होगा, क्योंकि लोगों के पास सत्य नहीं है और वे खुद को प्रकट कर देने में असमर्थ हैं। पतरस की पूर्णता के मार्ग पर चलना मुख्यतः संकल्पित होने, आस्था रखने और परमेश्वर पर भरोसा करने पर निर्भर है। इसके अलावा, व्यक्ति को पवित्र आत्मा के काम के प्रति समर्पित होना चाहिए; किसी भी चीज़ में व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के बिना नहीं चल सकता। ये वे प्रमुख पहलू हैं, जिनमें से किसी का भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अनुभव के माध्यम से स्वयं को जान लेना बहुत कठिन है; पवित्र आत्मा के कार्य के बिना इसमें प्रवेश कर पाना बहुत मुश्किल है। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पौलुस का मार्ग जीवन की तलाश या आत्म-बोध पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं था; उसने विशेष रूप से काम करने और उसके प्रभाव और गति पर ध्यान केंद्रित किया। उसकी प्रेरणा थी अपने काम और अपनी पीड़ा के बदले परमेश्वर के आशीष प्राप्त करना और परमेश्वर से पुरस्कार प्राप्त करना। यह प्रेरणा गलत थी। पौलुस ने जीवन पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, न ही उसने स्वभावगत परिवर्तन हासिल करने को कोई महत्व दिया; उसने केवल पुरस्कारों पर ध्यान केंद्रित किया। चूँकि उसके लक्ष्य गलत थे, इसलिए जिस रास्ते पर वह चला, वह भी निस्संदेह गलत था। यह उसकी अभिमानी और दंभी प्रकृति के कारण हुआ। स्पष्टतः, पौलुस के पास कोई सत्य नहीं था, न ही उसके पास कोई जमीर या विवेक था। लोगों को बचाने और बदलने में परमेश्वर मुख्य रूप से उनके स्वभाव बदलता है। उसके वचनों का उद्देश्य लोगों में रूपांतरित स्वभाव और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने और सामान्य तरीके से उसकी आराधना करने की क्षमता के परिणाम हासिल करना है। परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य का यही उद्देश्य है। पौलुस की खोज का तरीका परमेश्वर की इच्छा के सीधे उल्लंघन और उसके साथ टकराव का था; यह पूरी तरह से उसके विरुद्ध जाता था। जबकि पतरस की तलाश का तरीका पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था, जो ठीक वही परिणाम है, जिसे परमेश्वर इंसानों में हासिल करना चाहता है। इसलिए पतरस का मार्ग धन्य है और परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करता है। चूँकि पौलुस का मार्ग परमेश्वर की इच्छा का उल्लंघन है, इसलिए परमेश्वर उससे घृणा करता है और उसे शाप देता है। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा जाननी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सचमुच परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसकी इच्छा को पूरी तरह से समझने में सक्षम है—जिसका अर्थ यह समझना है कि परमेश्वर मनुष्य को क्या बनाना चाहता है और अंततः वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है—केवल तभी वह सटीक रूप से समझ सकता है कि किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम पतरस के मार्ग को पूरी तरह से नहीं समझते, और केवल उस पर चलने की इच्छा रखते हो, तो तुम उस पर नहीं चल पाओगे। दूसरे शब्दों में, हो सकता है तुम बहुत-से सिद्धांतों को जानते हो, लेकिन अंततः वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे। हालाँकि हो सकता है तुम सतही रूप से प्रवेश कर लो, लेकिन तुम कोई वास्तविक परिणाम प्राप्त करने में असमर्थ होगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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