परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग" | अंश 558

खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपनी भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के बारे में पता होना चाहिए, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति और सार के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो। परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; और इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना मत करो—हमें उनसे अपनी तुलना करनी चाहिए। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें इसका विश्वास न हो, तो खुद अनुभव करके देख लो। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद पर लागू करने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को कुलटाओं और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार हैं, अत: ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए; कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी सेक्स नहीं किया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है; कुछ लोगों का मानना है कि परमेश्वर के ऐसे वचन सुनने में बहुत अप्रिय लगते हैं और वे उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन गलत हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्मचिंतन करने में असमर्थ हैं। यहाँ "कुलटा" और "वेश्या" लोगों के व्यभिचार की भ्रष्टता को संदर्भित करते हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर कोई व्यभिचार की भ्रष्टता से ग्रस्त है—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टाचार का उनका स्तर समान है। क्या यह तथ्य नहीं है? कुछ और करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि हमें परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों में से हर एक वचन को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे सुनने में अच्‍छे लगते हों या नहीं, और चाहे वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का। यही वह दृष्टिकोण है, जिसे हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह भक्ति का दृष्टिकोण है, सहिष्‍णुता का दृष्टिकोण है, या कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की कोई भी पंक्ति बाह्य रूपों के बारे में नहीं है, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सरल रूप के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे ऐसी नहीं हैं। अगर तुम परमेश्वर द्वारा कही गई हर पंक्ति को एक सामान्य प्रकार के इंसानी व्यवहार या बाह्य रूप की तरह देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं है, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, वे बाह्य रूप नहीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। लोगों को उनके बाहरी रूप से देखने पर, वे सभी ठीक लग सकते हैं। लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के वचनों पर बने रहने के लिए रूप-रंग या जो बाहर से दिखता है उस पर निर्भर नहीं रह सकते।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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