परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या : पतरस के जीवन पर" | अंश 532

पतरस ने कई वर्षों तक यीशु का अनुगमन किया और उसमें कई बातें ऐसी देखीं, जो औरों में नहीं थीं। एक वर्ष तक अपना अनुगमन करने के पश्चात् यीशु ने उसे बारह शिष्यों में से एक चुना। (निस्संदेह यीशु ने इसे जोर से नहीं बोला और दूसरे इससे बिलकुल अनजान थे।) जीवन में, पतरस ने यीशु द्वारा की गई हर चीज से खुद को मापा। सबसे बढ़कर, यीशु ने जिन संदेशों का प्रचार किया, वे उसके हृदय में अंकित हो गए। वह यीशु के प्रति अत्यधिक समर्पित और वफादार था, और उसने यीशु के खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं की। परिणामस्वरूप जहाँ कहीं यीशु गया, वह यीशु का विश्वसनीय साथी बन गया। पतरस ने यीशु की शिक्षाओं, उसके नम्र शब्दों, उसके भोजन, उसके कपड़ों, उसके आश्रय और उसकी यात्राओं पर ग़ौर किया। उसने हर मामले में यीशु का अनुकरण किया। वह कभी पाखंडी नहीं था, लेकिन फिर भी उसने वह सब त्याग दिया, जो पुराना था और कथनी और करनी दोनों से यीशु के उदाहरण का अनुगमन किया। तभी उसे अनुभव हुआ कि आकाश और पृथ्वी और सभी वस्तुएँ सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और इस कारण उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं थी। उसने यीशु को पूर्णरूपेण आत्मसात कर लिया और उसे उदाहरण की तरह इस्तेमाल किया। यीशु का जीवन दर्शाता है कि उसने जो कुछ किया, वह पाखंडी नहीं था; अपने बारे में डींगें मारने के बजाय उसने प्रेम से लोगों को प्रभावित किया। विभिन्न चीजों ने दिखाया कि यीशु क्या था, और इस कारण से पतरस ने उसकी हर बात का अनुकरण किया। पतरस के अनुभवों ने उसे यीशु की मनोरमता का अधिकाधिक बोध कराया और उसने इस तरह की बातें कहीं : "मैंने पूरे ब्रह्मांड में सर्वशक्तिमान की खोज की है और आकाश, पृथ्वी और सभी चीजों के आश्चर्यों को देखा है, और इस प्रकार मैंने सर्वशक्तिमान की मनोरमता का गहरा अनुभव प्राप्त किया है। परंतु इस पर भी मेरे हृदय में वास्तविक प्रेम कदापि नहीं था और मैंने अपनी आँखों से सर्वशक्तिमान की मनोरमता को कभी नहीं देखा था। आज सर्वशक्तिमान की दृष्टि में मुझे उसके द्वारा कृपापूर्वक देखा गया है, और मैंने अंतत: परमेश्वर की मनोरमता का अनुभव कर लिया है। मैंने अंतत: जान लिया है कि मानव-जाति सिर्फ इसलिए परमेश्वर से प्रेम नहीं करती, क्योंकि उसने सब चीजें बनाई हैं, बल्कि अपने दैनिक जीवन में मैंने उसकी असीम मनोरमता पाई है। यह भला उस स्थिति तक सीमित कैसे हो सकती है, जो अभी दिखाई पड़ रही है?" जैसे-जैसे समय बीता, पतरस में भी बहुत-सी मनोहर बातें आती गईं। वह यीशु के प्रति बहुत आज्ञाकारी हो गया, और निस्संदेह उसे अनेक विघ्नों का भी सामना करना पड़ा। जब यीशु उसे विभिन्न स्थानों पर प्रचार करने के लिए ले गया, तो उसने सदैव विनम्र होकर यीशु के उपदेशों को सुना। वर्षों से यीशु का अनुगमन करने के कारण वह कभी अहंकारी नहीं हुआ। यीशु द्वारा यह बताए जाने के बाद कि उसके आने का कारण क्रूस पर चढ़ाया जाना है, ताकि वह अपना कार्य पूरा कर सके, पतरस अकसर अपने दिल में पीड़ा अनुभव करता और एकांत में छुपकर रोया करता। फिर भी, आखिरकार वह "दुर्भाग्यपूर्ण" दिन आ ही गया। यीशु के पकड़े जाने के बाद पतरस अपनी मछली पकड़ने की नाव में अकेले रोता रहा और उसके लिए बहुत प्रार्थनाएँ कीं। परंतु अपने हृदय में वह जानता था कि यह पिता परमेश्वर की इच्छा है और इसे कोई नहीं बदल सकता। यीशु के प्रति अपने प्रेम के कारण ही वह दुखी होकर रोता रहा था। निस्संदेह यह मानवीय दुर्बलता है। अत: जब उसे ज्ञात हुआ कि यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया जाएगा, उसने यीशु से पूछा : "अपने जाने के बाद क्या तू हमारे बीच लौटेगा और हमारी देखभाल करेगा? क्या हम फिर भी तुझे देख पाएँगे?" हालाँकि ये शब्द बहुत सीधे-सादे और मानवीय धारणाओं से भरे थे, पर यीशु पतरस की पीड़ा की कड़वाहट के बारे में जानता था, अत: अपने प्रेम के द्वारा उसने उसकी दुर्बलता को ध्यान में रखा : "पतरस, मैंने तुझसे प्रेम किया है। क्या तू यह जानता है? हालाँकि तू जो कहता है, उसका कोई कारण नहीं है, फिर भी, पिता ने वादा किया है कि अपने पुनरुत्थान के बाद मैं 40 दिनों तक लोगों को दिखाई दूँगा। क्या तुझे विश्वास नहीं है कि मेरा आत्मा तुम लोगों पर निरंतर अनुग्रह करता रहेगा?" हालाँकि इससे पतरस को कुछ सुकून मिला, फिर भी उसने महसूस किया कि किसी चीज की कमी है, और इसलिए, पुनरुत्थान के बाद, यीशु पहली बार खुले तौर पर उसके सामने आया। किंतु पतरस को अपनी धारणाओं से चिपके रहने से रोकने के लिए यीशु ने उस भव्य भोजन को अस्वीकार कर दिया, जो पतरस ने उसके लिए तैयार किया था, और पलक झपकते ही गायब हो गया। उस क्षण से पतरस को प्रभु यीशु की गहन समझ प्राप्त हुई, और वह उससे और अधिक प्रेम करने लगा। पुनरुत्थान के बाद यीशु अकसर पतरस के सामने आया। चालीस दिन पूरे होने पर स्वर्गारोहण करने के बाद वह पतरस को तीन बार और दिखाई दिया। हर बार जब वह दिखाई दिया, तब पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण होने वाला और नया कार्य आरंभ होने वाला था।

अपने पूरे जीवन में पतरस ने मछलियाँ पकड़कर अपना जीवनयापन किया, परंतु इससे भी अधिक वह सुसमाचार के प्रचार के लिए जीया। अपने बाद के वर्षों में उसने पतरस की पहली और दूसरी पत्री लिखी, साथ ही उसने उस समय के फिलाडेल्फिया की कलीसिया को कई पत्र भी लिखे। उस समय के लोग उससे बहुत प्रभावित थे। लोगों को अपनी खुद की साख का इस्तेमाल करके उपदेश देने के बजाय उसने उन्हें जीवन की उपयुक्त आपूर्ति उपलब्ध करवाई। वह जीते-जी कभी यीशु की शिक्षाओं को नहीं भूला और जीवनभर उनसे प्रेरित रहा। यीशु का अनुगमन करते हुए उसने प्रभु के प्रेम का बदला अपनी मृत्यु से चुकाने और सभी चीजों में उसके उदाहरण का अनुसरण करने का संकल्प लिया था। यीशु ने इसे स्वीकार कर लिया, इसलिए जब पतरस 53 वर्ष का था (यीशु के जाने के 20 से अधिक वर्षों के बाद), तो यीशु उसकी आकांक्षा की पूर्ति में मदद करने के लिए उसके सामने प्रकट हुआ। उसके बाद के सात वर्षों में पतरस ने अपना जीवन स्वयं को जानने में व्यतीत किया। इन सात वर्षों के पश्चात एक दिन उसे उलटा क्रूस पर चढ़ा दिया गया और इस तरह उसके असाधारण जीवन का अंत हो गया।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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