परमेश्वर के दैनिक वचन | "पतरस ने यीशु को कैसे जाना" | अंश 520

यीशु का अनुसरण करने के अपने समय के दौरान, उसके बारे में पतरस के कई अभिमत थे और वह अपने परिप्रेक्ष्य से आँकलन करता था। यद्यपि पवित्रात्मा के बारे में उसकी एक निश्चित अंश में समझ थी, तब भी पतरस बहुत प्रबुद्ध नहीं था, इसलिए वह अपनी बातों में कहता हैः "मुझे उसका अवश्य अनुसरण करना चाहिए जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा चुना जाता है। मैं तेरा अनुसरण करूँगा।" उसने यीशु के द्वारा की गई चीज़ों को नहीं समझा और कोई प्रबुद्धता प्राप्त नहीं की। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उन चीज़ों में जो उसने की और कही, और स्वयं यीशु में रुचि बढ़ी। उसे महसूस होने लगा कि यीशु ने अनुराग और सम्मान दोनों प्रेरित किए; वह उसके साथ सम्बद्ध होना और उसके साथ ठहरना पसंद करता था, और यीशु के वचनों को सुनना उसे आपूर्ति और सहायता प्रदान करते थे। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उसे हृदय से लगाया: उसके कार्यों को, वचनों को, गतिविधियों को, और अभिव्यक्तियों को। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय प्रकटन अत्यधिक साधारण था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और उसकी ओर से पतरस ने उन चीज़ों को देखा और सीखा जिन्हें उसने पहले कभी देखा या सीखा नहीं था। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है न ही असाधारण मानवता है, किन्तु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं समझ सका था, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सब से भिन्न कार्य करता है, क्योंकि उसने चीज़ों को किसी साधारण मनुष्य द्वारा किए गए से कहीं अधिक भिन्न तरह से किया था। यीशु के साथ सम्पर्क में उसके समय से, पतरस ने यह भी महसूस किया कि उसका चरित्र किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न था। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया, और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया, न ही कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में, यीशु शिष्ट और आकर्षक, स्पष्ट और हँसमुख, फिर भी शान्त था, और अपने कार्य के निष्पादन में कभी भी गरिमा को नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी-कभी अल्प-भाषी रहता था, फिर भी अन्य समयों में लगातार बात करता था। कई बार वह इतना प्रसन्न होता था कि वह कबूतर की तरह चुस्त और जीवंत बन जाता था, और फिर कभी-कभी इतना दुःखी होता था कि वह बिल्कुल भी बात नहीं करता था, मानो कि वह एक मौसम की मार खाई हुई माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रुओं को मारने के लिए मुस्तैद हो, और कई बार यहाँ तक कि एक गर्जने वाले सिंह की तरह होता था। कभी-कभी वह हँसता था; फिर कभी वह प्रार्थना करता और रोता था। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यीशु ने कैसे क्रिया की, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, उसकी दया, क्षमा, और सख़्ती, उसके भीतर एक सच्ची श्रद्धा और लालसा को बढ़ाते हुए, उसे सच्ची तरह से यीशु से प्यार करवाने लगते थे। वास्तव में, एक बार जब पतरस ने यीशु के साथ-साथ कुछ वर्षों तक जीवन बिता लिया था केवल तभी उसने यह सब धीरे-धीरे यह महसूस किया।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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