परमेश्वर के दैनिक वचन : जीवन में प्रवेश | अंश 476
पतरस ऐसा मनुष्य था जिसे सिद्ध किया गया था। केवल न्याय एवं ताड़ना का अनुभव करने, और इस प्रकार परमेश्वर के शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के बाद...
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यीशु का अनुसरण करने के दौरान पतरस ने उसके बारे में कई मत बनाए और हमेशा अपने दृष्टिकोण से उसका आकलन किया। यद्यपि पतरस को पवित्रात्मा की एक निश्चित मात्रा में समझ थी, किंतु उसकी समझ कुछ हद तक अस्पष्ट थी, इसीलिए उसने कहा : "मुझे उसका अनुसरण अवश्य करना चाहिए, जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा चुना जाता है।" उसने यीशु द्वारा की गई चीज़ों को नहीं समझा और उसमें उनके बारे में स्पष्टता का अभाव था। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किए गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और स्वयं यीशु में रुचि बढ़ी। उसने महसूस किया कि यीशु ने स्नेह और सम्मान दोनों प्रेरित किए; उसे उसके साथ जुड़ना और रहना अच्छा लगा, और यीशु के वचन सुनने से उसे आपूर्ति और सहायता मिली। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उन्हें हृदय से लगाया : उसके क्रियाकलाप, वचन, गतिविधियाँ, और अभिव्यक्तियाँ। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय रंग-रूप अत्यधिक सामान्य था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, अनुकंपा और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा, वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और पतरस ने यीशु में वे चीज़ें देखीं और उससे वे चीज़ें पाईं, जो उसने पहले कभी नहीं देखी या पाई थीं। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है और न ही कोई असाधारण मानवता है, किंतु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं बता सका, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सबसे भिन्न तरीके से कार्य करता है, क्योंकि जो चीज़ें उसने कीं, वे सामान्य मनुष्य द्वारा की जाने वाली चीज़ों से बहुत भिन्न थीं। यीशु के साथ संपर्क होने के समय से पतरस ने यह भी देखा कि उसका चरित्र साधारण मनुष्य से भिन्न है। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को न तो बढ़ा-चढ़ाकर बताया, न ही उसे कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया, जिससे ऐसा चरित्र उजागर हुआ जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में यीशु स्पष्ट रूप से और शिष्टता के साथ बोलता था, हमेशा प्रफुल्लित किंतु शांतिपूर्ण ढंग से संवाद करता था, और अपना कार्य करते हुए कभी अपनी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी बहुत कम बोलता था, तो कभी लगातार बोलता रहता था। कभी वह इतना प्रसन्न होता था कि नाचते-उछलते कबूतर की तरह दिखता था, तो कभी इतना दुःखी होता था कि बिलकुल भी बात नहीं करता था, मानो दुख के बोझ से लदी और बेहद थकी कोई माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रु को मारने के लिए हमलावर हो, और कई बार वह किसी गरजते सिंह जैसा दिखाई देता था। कभी वह हँसता था; तो कभी प्रार्थना करता और रोता था। यीशु ने चाहे कैसे भी काम किया, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी करुणा, क्षमा और लोगों से की गई उसकी सख्त अपेक्षाओं ने उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाया और उसके लिए एक सच्ची श्रद्धा और लालसा विकसित की। निस्संदेह, पतरस को इस सबका एहसास धीरे-धीरे तब तक नहीं हुआ, जब तक वह कई वर्ष यीशु के साथ नहीं रह लिया।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस ने यीशु को कैसे जाना
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