परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं" | अंश 519

मनुष्य परमेश्वर का अनुभव करता है, स्वयं को जानता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पाता है और जीवन में वृद्धि करने के लिए कोशिश करता है सब कुछ परमेश्वर को जानने के लिए ही है। यदि तुम सिर्फ़ स्वयं को जानने और स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने की कोशिश करते हो और यह नहीं जानते कि मनुष्य के लिए परमेश्वर क्या कार्य करता है, उसका उद्धार कितना महान है, या तुम परमेश्वर का अनुभव कैसे करते हो और परमेश्वर के कार्यों की गवाही किस प्रकार देते हो, तो तुम्हारा अनुभव बेकार है। यदि तुम सोचते हो कि सत्य को अभ्यास में लाने के योग्य होना और उसे सहने का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में वृद्धि कर चुका है, तो इसका अर्थ यह है कि तुमने जीवन के सही अर्थ को अभी तक नहीं समझा है और मनुष्य के लिए कार्य करने के परमेश्वर के उद्देश्य को अभी तक नहीं समझा है। एक दिन, जब तुम धार्मिक कलीसियाओं में, पश्चातापी कलीसिया के सदस्यों के मध्य या जीवित कलीसिया के मध्य होगे, तुम ऐसे कई भक्त लोगों को पाओगे जिनकी प्रार्थनाओं में दर्शन पाया जाता है और जो छुए जाने को महसूस करते हैं और उनके पास वचन होते हैं जो जीवन का अनुसरण करने में उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इसके अलावा, कई मामलों में वे सहने और अपने आप को त्यागने के योग्य होते हैं, देह के द्वारा अगुवाई प्राप्त न किए जाने के योग्य होते हैं। उस समय, तुम अंतर बताने के योग्य नहीं होगेः तुम विश्वास करोगे कि जो कुछ वे करेंगे वह सही है, जीवन की सामान्य अभिव्यक्ति है और अफसोस की बात है कि जिस नाम पर वे विश्वास करते हैं वह गलत है। क्या इस प्रकार का विश्वास मूर्खता नहीं है? ऐसा क्यों कहा गया कि कई लोगों के पास कोई जीवन नहीं है? क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते, और इसलिए ऐसा कहा गया है कि उनके पास परमेश्वर नहीं है, और कोई जीवन नहीं है। यदि तुम्हारा परमेश्वर पर विश्वास एक ऐसे बिन्दु तक पहुंच गया है जहां से तुम परमेश्वर के कार्यों, परमेश्वर की वास्तविकता, और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को पूरी तरह से जानने के योग्य हो, तो तुम्हारे पास सत्य है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य और स्वभाव को नहीं जानते हो, तो तुम्हारा अनुभव में अभी भी कमी है। यीशु ने किस प्रकार से परमेश्वर के कार्य के उस चरण किया, इस चरण को कैसे किया जा रहा है, परमेश्वर ने किस प्रकार से अनुग्रह के युग में अपना कार्य किया और क्या कार्य किया गया है, इस चरण में कौन सा कार्य किया जा रहा है—यदि तुम्हारे पास इन बातों को सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है, तो तुम कभी भी आश्वासित और सुरक्षित महसूस नहीं करोगे। यदि, अनुभव के एक अवधि के बाद, तुम परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य और उसके कार्य के प्रत्येक चरण को जानने के योग्य हो, और परमेश्वर के वचनों के उद्देश्यों की पूरी जानकारी है, और पता है कि उसके द्वारा कही गई काफी बातें अभी तक पूरी क्यों नहीं हुई हैं, तो तुम आराम कर सकते हो और प्रत्येक चिंताओं या शुद्धता से स्वतंत्र होकर आगे के मार्ग पर दृढ़ता से जारी रह सकते हो। तुम लोगों को यह देखने की आवश्यकता है कि परमेश्वर अपने इतने सारे कार्य को पूरा करने के लिए क्या उपयोग करता है। वह अपने कहे वचनों का उपयोग करता है, कई प्रकार के वचनों के द्वारा मनुष्य को शुद्ध करता और मनुष्य की अवधारणाओं को परिवर्तित करता है। तुम लोगों ने जो भी दुख सहा है, जो भी शुद्धता के कार्य का अनुभव किया है, जो व्यवहार तुम लोगों ने स्वयं में स्वीकार किया है, जो भी प्रबुद्धता का तुम लोगों ने अनुभव किया है—ये सभी परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों के उपयोग के द्वारा ही प्राप्त हुए हैं। किस वजह से मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करता है? परमेश्वर के वचनों के कारण से! परमेश्वर के वचन गहराई से रहस्मयी हैं, और मनुष्य के हृदयों को छू सकते हैं, मनुष्य के हृदयों की गहराई वाली बातों को भी प्रकट कर सकते हैं, अतीत में हुई बातों को भी बता सकते हैं और भविष्य में देखने दे सकते हैं। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के वचनों के कारण से दुखों को सहता है, और परमेश्वर के वचनों के कारण ही सिद्ध बनता है और केवल उसी के बाद मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करता है। परमेश्वर के वचन को स्वीकारने के लिए मनुष्य को इस चरण में क्या करना चाहिए, और चाहे उसे सिद्ध बनाया जाए या शुद्ध किया जाए इसकी परवाह किए बिना, जो महत्वपूर्ण है वह परमेश्वर के वचन हैं; यही परमेश्वर का कार्य है और यही दर्शन है जो मनुष्य को आज जानना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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