परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं" | अंश 518

यह स्वर्ग का नियम और पृथ्वी का सिद्धांत है कि परमेश्वर पर विश्वास किया जाए और उसको जाना जाए, और आज—इस युग के दौरान जब देहधारी परमेश्वर स्वयं अपना कार्य करता है—यह परमेश्वर को जानने के लिए विशेष अच्छा समय है। परमेश्वर को संतुष्ट करना उसकी इच्छा को समझने पर आधारित है, और परमेश्वर की इच्छा को जानने के लिए, परमेश्वर को अच्छी तरह से जानना आवश्यक है। परमेश्वर की यह जानकारी एक दर्शन है जो एक विश्वासी के पास होना चाहिए; यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है। यदि मनुष्य में यह ज्ञान न हो तो परमेश्वर पर उसका विश्वास अस्पष्ट होता है, और खोखले सिद्धांत में होता है। हालांकि परमेश्वर का अनुसरण करना इस तरह के लोगों का संकल्प है, वे कुछ भी प्राप्त नहीं करते हैं। वे सभी जो इस धारा से कुछ भी प्राप्त नहीं करते हैं, वे हटा दिए जाएंगे, और वे ऐसे लोग हैं जो बहुत ही कम कार्य कर रहे हैं। तुम परमेश्वर के कार्य का कोई सा भी कदम का अनुभव करो, तुम्हारे पास एक सामर्थी दर्शन होना चाहिए। इस प्रकार के दर्शन के बिना, तुम्हारे लिए नए कार्य के प्रत्येक चरण को स्वीकारना कठिन कार्य होगा, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के नए कार्य की कल्पना करने में अयोग्य है, यह मनुष्य की धारणाओं से बाहर है। और इसलिए, चरवाहे की उचित देखभाल के बिना, दर्शन के बारे में चरवाहे की संगति के बिना, मनुष्य इस नए कार्य को स्वीकारने में असमर्थ है। यदि मनुष्य दर्शन प्राप्त नहीं कर सकता है, तो वह परमेश्वर के नए कार्य को प्राप्त नहीं कर सकता है, और यदि मनुष्य परमेश्वर के नए कार्य का आज्ञापालन नहीं कर सकता है, तो मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को समझने में योग्य नहीं होता है, और इसलिए परमेश्वर के संबंध में उसका ज्ञान कुछ भी नहीं है। इससे पहले कि मनुष्य परमेश्वर के वचनों का पालन करे, उसे परमेश्वर के वचनों को जानना होगा, यानि परमेश्वर की इच्छा को जानना होगा; केवल इसी प्रकार से परमेश्वर के वचनों को यथार्थ तौर पर और परमेश्वर के हृदय के अनुसार किया जा सकता है। इसे हर उस व्यक्ति के द्वारा किया जाना चाहिए जो सत्य को खोजता है, और यही वह प्रक्रिया है जिसका अनुभव हर उस व्यक्ति को करना चाहिए जो परमेश्वर को जानने की कोशिश करता है। परमेश्वर के वचन को जानने की प्रक्रिया, परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है, और परमेश्वर के कार्य को जानने की भी प्रक्रिया है। इसलिए दर्शन को जानना न केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानने से संबंध रखता है, बल्कि इसमें परमेश्वर के वचनों और कार्यों को जानना भी सम्मिलित है। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से लोग परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, और परमेश्वर के कार्य के माध्यम से वे परमेश्वर के स्वभाव को जानते हैं और कि परमेश्वर क्या है। परमेश्वर पर विश्वास करना परमेश्वर को जानने की ओर पहला कदम है। परमेश्वर में प्रारम्भिक विश्वास से परमेश्वर पर सबसे गहरा विश्वास तक आगे बढ़ने की प्रक्रिया परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है, और परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास केवल विश्वास दिखाने के लिए करते हो, न कि परमेश्वर को जानने के लिए उस पर विश्वास करते हो, तो तुम्हारे विश्वास में कुछ भी सत्य नहीं है, और यह शुद्ध नहीं हो सकता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। यदि परमेश्वर का अनुभव करने की प्रक्रिया में, मनुष्य धीरे-धीरे परमेश्वर को जानने लगता है, तो उसका स्वभाव भी धीरे-धीरे बदलेगा, और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सत्य होगा। इस प्रकार से, जब मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास करने में सफलता प्राप्त करता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त कर लेगा। परमेश्वर इस हद तक चला गया कि वह दूसरी बार देहधारण करके आया और व्यक्तिगत तौर पर अपने कार्य को किया ताकि मनुष्य उसे जान सके, और उसे देख सके। परमेश्वर को जानना परमेश्वर के कार्य के अंत में अंतिम प्रभाव को प्राप्त करना है; यही परमेश्वर की मानवजाति से अंतिम अपेक्षा है। यह उसने अपनी निर्णायक गवाही की खातिर किया है, ताकि मनुष्य अंततः और पूरी तरह से उसकी ओर फिरे। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम केवल परमेश्वर को जान करके ही कर सकता है और परमेश्वर को प्रेम करने के लिए उसे परमेश्वर को जानना होगा। इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि वह कैसे खोजता है या क्या प्राप्त करने के लिए खोज करता है, उसे परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के योग्य बनना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार से मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता है। केवल परमेश्वर को जान कर ही मनुष्य सचमुच परमेश्वर पर विश्वास कर सकता है और केवल परमेश्वर को जान कर ही वह परमेश्वर का सचमुच आदर और आज्ञापालन कर सकता है। जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे उसका वास्तव में आदर और आज्ञापालन कभी नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर को जानने में परमेश्वर के स्वभाव को जानना, परमेश्वर की इच्छा को समझना, और यह जानना शामिल है कि परमेश्वर क्या है। फिर भी परमेश्वर को जानने का जो कोई भी पहलु वह हो, प्रत्येक के लिए मनुष्य को एक मूल्य चुकाना होगा, और उसकी इच्छा को मानना आवश्यक है, जिसके बिना अंत तक कोई भी परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य नहीं होगा। मनुष्य की धारणाओं के सामने परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से असंगत नज़र आता है, परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर क्या है यह मनुष्य के लिए जानना बहुत ही कठिन है, और जो कुछ परमेश्वर कहता और करता है वह भी मनुष्य की समझ से परे है; यदि मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करना चाहता है, परन्तु परमेश्वर की आज्ञापालन करने की इच्छा नहीं रखता है, तो मनुष्य कुछ भी प्राप्त नहीं करेगा। उत्पत्ति से लेकर आज तक, परमेश्वर ने बहुत कार्य किया है जो मनुष्य की समझ से बाहर है और जिसे मनुष्य ग्रहण करने में कठिनाई महसूस करता है, और परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है जो मनुष्य की धारणाओं को ठीक होने में कठिनाई प्रस्तुत करता है। फिर भी वह अपना कार्य करना कभी भी बंद नहीं करता है क्योंकि मनुष्य के पास कई सारी समस्याएं हैं; उसने कार्य करने और बोलने का कार्य जारी रखा है और हालांकि किनारे पर बहुत सारे "योद्धा" गिरे हैं, वह फिर भी अपना कार्य करता जाता है और लोगों के ऐसे समूहों को एक के बाद एक चुनना जारी रखता है जो उसके नए कार्य का पालन करने की इच्छा जताते हैं। वह उन गिरे हुए "नायकों" पर दया नहीं दिखाता है, परन्तु उन्हें सम्भाल कर रखता है जो उसके वचन और नए कार्य को स्वीकार करते हैं। लेकिन किस उद्देश्य के लिए वह इस तरह कार्य को कदम दर कदम करता है? वह क्यों हमेशा लोगों को ख़त्म करता और चुनता रहता है? वह क्यों हमेशा इस प्रकार के तरीकों का इस्तेमाल करता रहता है? उसके कार्य का लक्ष्य यह है कि मनुष्य उसे जानें, और इस प्रकार से उसके द्वारा प्राप्त किए जाएं। उसके कार्य का नियम उन लोगों पर कार्य करना है जो आज उसके किए गए कार्य को मानने के लिए तैयार हैं, और उन पर कार्य नहीं करता जो उसके अतीत के कार्य को तो मानते हैं, परन्तु आज उसके कार्य का विरोध करते हैं। यही मुख्य कारण है कि उसने इतने सारे लोगों को ख़त्म कर दिया है।

परमेश्वर को जानने के पाठ का प्रभाव एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता हैः मनुष्य को अनुभव एकत्रित करना, परेशानियों से होकर जाना, और सच्ची आज्ञाकारिता होनी चाहिए। सबसे पहले, परमेश्वर के कार्य और वचन से प्रारम्भ करना होगा। तुम्हें यह जानना होगा कि परमेश्वर को जानने में क्या-क्या सम्मिलित है, परमेश्वर का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है, और अपने अनुभवों के दौरान परमेश्वर को कैसे देखा जा सकता है। यही चीज प्रत्येक व्यक्ति को करना आवश्यक है जब वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। कोई भी परमेश्वर के कार्य और वचन को सीधे तौर पर नहीं समझ सकता है, और कोई भी परमेश्वर के ज्ञान को अल्प समय में पूरी तरह से नहीं प्राप्त कर सकता है। सबसे ज्यादा आवश्यकता अनुभव की आवश्यक प्रक्रिया की है, जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को जानने या वास्तव में उसका अनुसरण करने के योग्य नहीं बन पाएगा। जितना अधिक कार्य मनुष्य करता है, वह उतना ही अधिक परमेश्वर को जानता है। जितना अधिक मनुष्य की धारणाएं परमेश्वर के कार्यों के प्रतिकूल होती हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर के प्रति मनुष्य का ज्ञान नया और गहरा होगा। यदि परमेश्वर का कार्य हमेशा के लिए अपरिवर्तित रहा होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर का केवल अल्प ज्ञान ही होता। संसार की उत्पत्ति से लेकर आज तक, तुम लोगों को स्पष्टता से जानना होगा कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में क्या किया, अनुग्रह के युग में और राज्य के युग में उसने क्या किया। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानना होगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

इंसान से परमेश्वर की अंतिम अपेक्षा है कि इंसान उसे जाने

परमेश्वर के वचनों को जानने की रीति, है उसे और उसके काम को जानना। दर्शनों को जानना यानी देहधारी ईश्वर को, उसकी मानवता, वचन और काम को जानना।

परमेश्वर के वचनों से, जानता है उसे इंसान। ईश-वचनों से, उसकी इच्छा को समझे इंसान। ईश-कार्य से, उसके स्वभाव को जाने इंसान। ईश-कार्य से, उसके स्वरूप को जाने इंसान। पूरा हो जाने पर काम परमेश्वर का, परमेश्वर को जान लेना, अंतिम परिणाम है, परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा है। ये उसकी अंतिम गवाही के लिये है। परमेश्वर के इस काम को करने की वजह है, मुड़ जाए पूरी तरह उसकी ओर इंसान आख़िरकार।

ईश-आस्था है पहला कदम उसे जानने का। शुरुआती आस्था बदले गहरी आस्था में— ये रीति है परमेश्वर को जानने की, उसके काम का अनुभव करने की।

अगर परमेश्वर में आस्था तुम्हारी सिर्फ़ विश्वास की है, नहीं है आस्था उसे जानने की, तो सच्चाई नहीं है तुम्हारी आस्था में; बेशक तुम शुद्ध नहीं हो अपनी आस्था में। पूरा हो जाने पर काम परमेश्वर का, परमेश्वर को जान लेना, अंतिम परिणाम है, परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा है। ये उसकी अंतिम गवाही के लिये है। परमेश्वर के इस काम को करने की वजह है, मुड़ जाए पूरी तरह उसकी ओर इंसान आख़िरकार।

अगर परमेश्वर के काम का अनुभव लेते हुए, परमेश्वर को इंसान धीरे-धीरे जान जाता है, तो स्वभाव भी फिर उसका धीरे-धीरे बदलता है, आस्था भी उसकी ज़्यादा सच्ची हो जाती है। ईश्वर के प्रति आस्था में सफल होकर, उसे पूरी तरह पा चुका होगा इंसान। बड़ी मुश्किलों से फिर देहधारण किया परमेश्वर ने, ताकि जान सके, देख सके परमेश्वर को इंसान। पूरा हो जाने पर काम परमेश्वर का, परमेश्वर को जान लेना, अंतिम परिणाम है, परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा है। ये उसकी अंतिम गवाही के लिये है। परमेश्वर के इस काम को करने की वजह है, मुड़ जाए पूरी तरह उसकी ओर इंसान आख़िरकार। परमेश्वर को जानकर ही उसे प्रेम कर सकता है इंसान। और प्रेम करने के लिये, परमेश्वर को जाने इंसान। कैसे भी खोजे, परमेश्वर को अवश्य जाने इंसान। यही तरीका है ईश-इच्छा को पूरा करने का।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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