परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे" | अंश 501

तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक सत्य तुम्हारे पास होता है; तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे पास होता है; और तुम जितना अधिक सत्य को अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हो। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें उत्तरोत्तर देखने में सक्षम बनाएगा, ठीक वैसे ही जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाई हैं, बल्कि, इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को उत्तराधिकार में अपना प्रेम देने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : "क्या स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते और चलते-फिरते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें तो लोगों का प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें उसे वास्तविक जीवन में खोजना और ढूँढ़ना चाहिए और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। ऐसे भी अवसर हो सकते हैं जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट न कर पाओ। वह इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें अधिक प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों की सृष्टि कर सकता है, कि वह देहधारी हुआ ही इसलिए है कि लोग वास्तव में उसे देख सकें और वास्तव में उसके साथ जुड़ सकें; तुम देखोगे कि वह मनुष्यों के बीच चलने में सक्षम है, और उसका पवित्र आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकता है, और उन्हें अपनी सुंदरता देखने और अपना अनुशासन, अपनी ताड़ना और अपने आशीष अनुभव करने दे सकता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम डाँट-फटकार झेल पाओगे और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें छोड़ देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा छोड़े जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हारे मन में ये भावनाएँ आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

सत्य पर और अमल करो, परमेश्वर का और आशीष पाओ

परमेश्वर का प्रेम देखने के लिए तुम्हें जीवन में करना होगा अमल सत्य पर, दर्द पीना होगा, त्यागना होगा प्रिय चीज़ों को उसे खुश करने के लिए।

बहते आँसुओं के बावजूद तुम्हें उसके हृदय को संतुष्ट करना होगा। तुम धन्य हो जाओगे और तुम्हारा दर्द पवित्र आत्मा का कार्य लाएगा। वास्तविक जीवन और ईश्वर के वचनों के, अनुभव से लोग उसकी मनोहरता देख सकते हैं। उसके प्रेम को जान कर ही कर सकते हैं उससे सच्चा प्यार। तुम जितना ज़्यादा सच का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक उसका आशीष पाओगे। जितना ज़्यादा तुम सत्य पर करोगे अमल, उतना ही सत्य होगा तुममें। तुम जितना ज़्यादा सच का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर के प्रेम से भर जाओगे। जो ऐसे करोगे अमल सदा, खुद में ईश्वर प्रेम देखोगे। जानोगे उसे पतरस की तरह कि परमेश्वर में है बुद्धि रचने की स्वर्ग धरती सब कुछ और उससे भी अधिक है, लोगों में वास्तविक कार्य करने की भी बुद्धि उसमें।

पतरस ने कहा ईश्वर लोगों के प्रेम के योग्य है क्योंकि उसने बनाईं स्वर्ग, धरती और सभी चीज़ें।

क्योंकि उसने इंसान बनाया, वह उसे बचा सके, पूर्ण कर सके। वह इंसान को अपना प्यार देता है। बहुत कुछ है उसमें प्रेम करने के लिए। वास्तविक जीवन और ईश्वर के वचनों के, अनुभव से लोग उसकी मनोहरता देख सकते हैं। उसके प्रेम को जान कर ही कर सकते हैं उससे सच्चा प्यार। तुम जितना ज़्यादा सच का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक उसका आशीष पाओगे। जितना ज़्यादा तुम सत्य पर करोगे अमल, उतना ही सत्य होगा तुममें। तुम जितना ज़्यादा सच का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर के प्रेम से भर जाओगे।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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