परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे" | अंश 499

परमेश्वर में अधिकांश लोगों के विश्वास का सार धर्म से जुड़ा दृढ़ विश्वास है : वे परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ हैं, और केवल एक रोबोट की तरह परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हैं, उनमें परमेश्वर के लिए सच्ची तड़प नहीं होती, और न ही वे उसे बहुत ज्यादा चाहते हैं। वे बस उसका मूक अनुसरण करते हैं। बहुत-से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु बहुत कम लोग हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं; वे केवल परमेश्वर का "आदर" करते हैं क्योंकि वे विनाश से डरते हैं, या फिर वे परमेश्वर की इसलिए "प्रशंसा" करते हैं क्योंकि वह ऊँचा और शक्तिमान है—परंतु उनके आदर और प्रशंसा में प्रेम या सच्ची तड़प नहीं होती। अपने अनुभवों में वे सत्य की अनावश्यक बारीकियाँ या फिर कुछ महत्वहीन रहस्य खोजते हैं। अधिकतर लोग सिर्फ अनुसरण करते हैं, वे आशीष प्राप्त करने के लिए अनाड़ियों की तरह अशांत सागर में मछली का शिकार करते हैं; वे सत्य की खोज नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने के लिए सच्चे अर्थ में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं। परमेश्वर में सभी लोगों के विश्वास का जीवन अर्थहीन है, वह मूल्यविहीन है, और इसमें उनके व्यक्तिगत सोच-विचार और लक्ष्य शामिल रहते हैं; वे परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर से प्रेम करने के उद्देश्य से नहीं, अपितु धन्य होने के लिए करते हैं। कई लोग वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है; वे जो चाहते हैं वही करते हैं और कभी परमेश्वर के हितों का या इस बात का ध्यान नहीं रखते कि वे जो करते हैं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। ऐसे लोग सच्चा विश्वास तक प्राप्त नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति प्रेम तो दूर की बात है। परमेश्वर का सार मनुष्य के विश्वास मात्र के लिए नहीं है; इससे भी बढ़कर यह मनुष्य के प्रेम के लिए है। परंतु परमेश्वर में विश्वास करने वालों में से बहुत-से लोग यह "रहस्य" खोज पाने में अक्षम हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करने का साहस नहीं करते, न ही वे उसे प्रेम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कभी खोजा ही नहीं कि परमेश्वर के विषय में प्रेम करने लायक कितना कुछ है; उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से प्रेम करता है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है। परमेश्वर की सुंदरता उसके कार्य में अभिव्यक्त होती है : लोग उसकी सुंदरता को तभी खोज सकते हैं जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं; केवल अपने वास्तविक अनुभवों में ही वे परमेश्वर की सुंदरता को महसूस कर सकते हैं; और वास्तविक जीवन में इसका अवलोकन किए बिना कोई परमेश्वर की सुंदरता को नहीं खोज सकता। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है, परंतु लोग उसके साथ वास्तव में जुड़े बिना इसे खोज पाने में अक्षम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुडने में असमर्थ होते, और यदि वे उसके साथ वास्तव में नहीं जुड़ पाते, तो वे उसके कार्य को अनुभव भी नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अत्यधिक झूठ और कल्पना से दूषित होता। स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति प्रेम उतना वास्तविक नहीं है जितना पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति प्रेम है, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाय उस पर आधारित होने के, जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा है और जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब लोग उसके वास्तविक कर्मों और उसकी सुंदरता को देख पाते हैं, और वे उसके व्यवहारिक और सामान्य स्वभाव का सब कुछ देख सकते हैं, जो पूरा का पूरा स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान की अपेक्षा हजारों गुना अधिक वास्तविक है। स्वर्ग के परमेश्वर से लोग चाहे जितना भी प्रेम करते हों, इस प्रेम के विषय में कुछ भी वास्तविक नहीं है, और यह पूरी तरह मानवीय विचारों से भरा हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम चाहे जितना भी कम क्यों न हो, यह प्रेम वास्तविक है; अगर यह बहुत थोड़ा-सा भी है, तो भी यह वास्तविक है। परमेश्वर वास्तविक कार्य के माध्यम से उसे जानने के लिए लोगों को उत्प्रेरित करता है, और इस ज्ञान के माध्यम से वह उनका प्रेम प्राप्त करता है। यह पतरस के समान है : यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु को इतना चाह पाना असंभव होता। इसी तरह, यीशु के प्रति उसकी वफादारी भी यीशु से उसके जुड़ाव पर ही आधारित थी। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करे, इसीलिए परमेश्वर मनुष्यों के बीच आया है और मनुष्य के साथ रहता है, और वह मनुष्य को जो भी दिखाता और अनुभव कराता है, वही परमेश्वर की वास्तविकता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर की सुंदरता को जानना है तो उसके कार्य का अनुभव करो

ईश्वर का सार बस इंसान के विश्वास के लिए नहीं; बल्कि है कि इंसान प्रेम करे उसे। लेकिन परमेश्वर के कई विश्वासी, जानते नहीं अब तक इसे परमेश्वर की सुंदरता व्यक्त होती उसके काम में। पर लोग इसे तभी समझ सकते हैं जब अपने अनुभव से वे महसूस करते हैं। असल अनुभव में महसूस होती, परमेश्वर की सुंदरता। असलियत में उसे देखे बिना कोई उसे खोज नहीं सकता। लोग करते न हिम्मत ईश्वर से प्रेम करने की, न करते कोशिश उससे प्रेम करने की। वे नहीं जान पाए हैं कि परमेश्वर है बड़ा प्यारा न ये कि वो करता प्यार इंसान से, वो है इंसान के प्रेम योग्य ईश्वर। परमेश्वर में बहुत कुछ है प्रेम करने को, उससे जुड़े बिना, इसे देख पाना मुमकिन नहीं। जब आता ईश्वर धरती पर, इंसान देख पाता उसके असल कर्म, उसकी मनोहरता, और उसका असल और सामान्य स्वभाव। ये सब कुछ अधिक असल है स्वर्ग में परमेश्वर के इंसानी ज्ञान से। परमेश्वर में बहुत कुछ है प्रेम करने को, परमेश्वर में बहुत कुछ है प्रेम करने को।

स्वर्ग के परमेश्वर से कितना भी इंसान प्रेम करे, यह असल नहीं बल्कि भरा है इंसानी कल्पनाओं से। धरती के परमेश्वर के लिए उनका प्रेम कम हो फिर भी है वो असल। अपने असली काम से, वह लोगों को खुद को जानने देता है। इस ज्ञान से, वो लोगों का प्रेम हासिल करता है। इंसान करे ईश्वर से प्रेम, इसलिए वो उनके बीच आए, अपनी असलियत का अनुभव करने देता है। अगर पतरस न रहता यीशु के साथ, तो वो कभी न कर पाता उससे प्रेम। यीशु के प्रति उसकी वफ़ा बनी थी यीशु के साथ उसके जुड़ने के आधार पर। लोग करते न हिम्मत ईश्वर से प्रेम करने की, न करते कोशिश उससे प्रेम करने की। वे नहीं जान पाए हैं कि परमेश्वर है बड़ा प्यारा न ये कि वो करता प्यार इंसान से, वो है इंसान के प्रेम योग्य ईश्वर। परमेश्वर में बहुत कुछ है प्रेम करने को, उससे जुड़े बिना, इसे देख पाना मुमकिन नहीं। जब आता ईश्वर धरती पर, इंसान देख पाता उसके असल कर्म, उसकी मनोहरता, और उसका असल और सामान्य स्वभाव। ये सब कुछ अधिक असल है स्वर्ग में परमेश्वर के इंसानी ज्ञान से। परमेश्वर में बहुत कुछ है प्रेम करने को। परमेश्वर में बहुत कुछ है प्रेम करने को।

अगर परमेश्वर देह नहीं बनता, तो उसके काम का अनुभव नहीं होता, तो उसके प्रति इंसान का प्रेम, कल्पना, मिथ्या से कलंकित होता। स्वर्ग के ईश्वर के प्रति प्रेम धरती के ईश्वर के प्रति प्रेम जितना असल नहीं, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान का आधार है बस कल्पना, न कि इंसान का अनुभव और जो उसने आँखों से देखा।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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