परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" | अंश 496

परमेश्वर के लोगों के बाहरी स्वभाव से निपटना भी उसके कार्य का एक भाग है; लोगों के बाहरी, असामान्य मानवता से निपटना, उदाहरण के लिए, या उनकी जीवनशैली और आदतें, उनके तौर-तरीके और आचार-व्यवहार, साथ ही साथ उनके बाहरी अभ्यास और उनकी उत्सुकताएं। परन्तु जब वह कहता है कि लोग सत्य को अभ्यास में लाएं और अपने स्वभाव को बदलें, प्रमुख रूप से जिसके साथ उन्हें निपटना है वे उनके भीतर की धारणा और प्रेरणाएं हैं। केवल तेरे बाहरी स्वभाव से निपटना कठिन नहीं है; परन्तु यह तुझे उन चीज़ों को खाने से मना करने के समान जो तुझे पसंद है, जो कि आसान है। वह जो तेरे भीतर की धारणाओं को छूता है, हालांकि, छोड़ने के लिए आसान नहीं है: इसके लिए आवश्यक है कि तू देह के खिलाफ़ विद्रोह करे, और एक कीमत चुकाए, और परमेश्वर के सामने कष्ट सहे। यह विशेष तौर पर लोगों की प्रेरणाओं के साथ होता है। परमेश्वर पर उनके विश्वास के समय से आज तक, लोगों ने कई गलत प्रेरणाओं को धारण किया है। जब तू सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा होता है, तू ऐसा महसूस करता है कि तेरी सभी प्रेरणाएं उचित हैं, परन्तु जब तेरे साथ कुछ घटित होता है, तो तू देखेगा कि तेरे भीतर बहुत सारी गलत प्रेरणाएं हैं। इस प्रकार, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, वह उन्हें महसूस कराता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएं हैं जो परमेश्वर के प्रति उनके ज्ञान को बाधा पहुँचा रही है। जब तुझे समझ आता है कि तेरी प्रेरणाएं गलत हैं, यदि तू अपनी धारणाओं और प्रेरणाओं के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाता है और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाता है और तेरे साथ घटित होने वाली प्रत्येक बातों पर भी अपने स्थान पर दृढ़ खड़े रहता है, तो यह साबित करता है कि तूने देह के खिलाफ़ विद्रोह किया है। जब तू अपने देह के विरूद्ध विद्रोह करता है, तो तेरे भीतर निश्चय ही एक युद्ध होगा। शैतान कोशिश करेगा और तुझे इसका अनुसरण करने के लिए बाध्य करेगा, तुझसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने के लिए कोशिश करेगा और देह के हितों को बनाए रखेगा—परन्तु परमेश्वर के वचन तुझे प्रबुद्ध करेंगे और तेरे भीतर रोशनी प्रदान करेंगे, और इस समय यह तुझ पर निर्भर करता है कि तू परमेश्वर का अनुसरण करे या फिर शैतान का अनुसरण करे। परमेश्वर लोगों को कहता है कि सत्य को अभ्यास में लाओ ताकि मुख्य तौर पर अपने भीतर की चीज़ों से ठीक तरह से निपट सको, अपने विचारों, और उनकी धारणाओं से निपट सको जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं हैं। पवित्रआत्मा लोगों के भीतर स्पर्श करता है और उनके भीतर अपने कार्य को करता है, और इसलिए जो कुछ होता है उन सब के पीछे एक युद्ध है: प्रत्येक बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, एक बड़ा युद्ध होता है, और हालांकि उनके देह में सब कुछ अच्छा दिखाई दे सकता है, परन्तु उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का युद्ध, वास्तव में, चल रहा होगा—और केवल इस घमासान युद्ध के बाद, एक अत्याधिक परिवर्तन के बाद, विजय या हार का फैसला किया जा सकता है। किसी को यह पता नहीं रहता है कि रोयें या हंसे। क्योंकि मनुष्यों के भीतर पाई जाने वाली अधिकांश प्रेरणाएं गलत होती हैं, या क्योंकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं के हिसाब से अलग होता है, जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं तो पर्दे के पीछे एक बड़ा युद्ध चल रहा होता है। इस सत्य को अभ्यास में लाने के बाद, पर्दे के पीछे लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन अंततः बनाने के पहले उदासी के असंख्य आंसू बहा चुके होंगे। इसी युद्ध के कारण लोग दुखों और शुद्धिकरण को सह पाते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब तेरे ऊपर युद्ध आता है, यदि तू वास्तव में परमेश्वर की ओर खड़ा रह पाता है, तो तू परमेश्वर को संतुष्ट कर पाएगा। सत्य के अभ्यास के समय आने वाला कष्ट अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उनके भीतर सब कुछ ठीक होगा, तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता नहीं है, और वहां पर कोई युद्ध नहीं होगा और वे पीड़ित नहीं होंगे। यह इसलिए क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी बातें हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने के लिए ठीक नहीं हैं, और देह के अधिकांश विद्रोही स्वभाव, जो लोगों को देह के साथ विद्रोह करने का सबक अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर “पीड़ा” कहता है जो वह लोगों को उसके साथ हो कर गुज़रने के लिए कहता है। जब तू समस्याओं से घिरे, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो: हे परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट रखने की इच्छा रखता हूं, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कठिनाई को सहना चाहता हूं, और चाहे कितना भी भयानक असफलताएं आएं, मैं फिर भी तुझे संतुष्ट करूंगा। यहां तक कि यदि मुझे अपना सम्पूर्ण जीवन भी तुझे देना पड़े, फिर भी मुझे तुझे संतुष्ट करना होगा! इस संकल्प के साथ, जब तू प्रार्थना करेगा तो तू अपनी गवाही में दृढ़ खड़ा रह पाएगा। हर बार जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तब हर बार वे शुद्धिकरण से होकर गुज़रते हैं, हर बार जब वे थक जाते हैं, और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, लोग अत्याधिक पीड़ा को सहते हैं। यह सब कुछ लोगों के लिए एक परीक्षा है, और इसलिए उन सबके भीतर एक युद्ध पाया जाता है। यही एक वास्तविक मूल्य है जो उन्हें चुकाना है। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना और ज्यादा इधर-उधर भागना एक प्रकार का मूल्य है। यही लोगों को करना चाहिए, यह उनका कर्तव्य है, और यही उनकी ज़िम्मेदारी है जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, परन्तु लोगों को उनके भीतर पाई जाने वाली उन बातों को एक तरफ रखना होगा जिन्हें एक तरफ रखा जाना चाहिए। यदि तू ऐसा नहीं करता है, तो चाहे तू कितनी भी अधिक पीड़ाओं को सह ले, और चाहे कितनी भी भाग-दौड़ कर ले, सब कुछ व्यर्थ होगा! अर्थात् केवल तेरे भीतर का बदलाव ही तय कर सकता है कि तेरी बाहरी कठिनाई का कोई मूल्य है या नहीं। जब तेरा आंतरिक स्वभाव बदल गया होगा और तू सत्य को अभ्यास में ला चुका होगा, तो ही तेरी सारी बाहरी पीढ़ाएं परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त करेंगी; यदि तेरे भीतरी स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है, तो चाहे तू कितने भी अधिक कष्टों को सह ले या तू बाहर कितना भी भाग-दौड़ कर ले, परमेश्वर की ओर से तुझे कोई भी अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा—और परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित कठिनाईयों का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए, जो कीमत तू चुका रहा है वह मायने रखती है या नहीं, वह इस बात पर निर्भर करता है कि तेरे भीतर कोई बदलाव आया है कि नहीं, और इससे कि परमेश्वर की इच्छा की संतुष्टि प्राप्त करने, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी को प्राप्त करने के लिए तूने सत्य को अभ्यास में लाया है या नहीं, और अपनी स्वयं की प्रेरणाओं और धारणाओं के विरूद्ध विद्रोह किया है या नहीं। तूने चाहे कितनी भी भाग-दौड़ की हो, यदि तूने कभी भी अपनी स्वयं की प्रेरणाओं के विरूद्ध विद्रोह नहीं किया है, केवल बाहरी कार्यों और उत्सुकता को ही खोजा है, और कभी भी अपने जीवन पर ध्यान नहीं दिया है, तो तेरी कठिनाईयां व्यर्थ होंगी। यदि, किसी एक निश्चित वातारण में, तेरे पास कुछ कहने को है, परन्तु तू भीतर ठीक महसूस नहीं कर रहा है, तो यह तेरे भाइयों और बहनों को लाभ नहीं पहुंचाएगा और हो सकता है कि उन्हें हानि पहुंचाए, तो तू वह नहीं कहेगा, भीतर ही भीतर कष्ट सहना पसंद करेगा, क्योंकि ये वचन परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकते। इस समय में, एक युद्ध तेरे भीतर चल रहा होगा, परन्तु तू पीड़ा को सहने की इच्छा करेगा और अपने प्रेम करने वाली चीज़ों को छोड़ना चाहेगा, तू परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इन कठिनाईयों को सहने की इच्छा रखेगा, और हालांकि तू भीतर कष्ट सहेगा, तू देह को बढ़ावा नहीं देगा और परमेश्वर का हृदय संतुष्ट हो जाएगा और इसलिए तू भी अंदर चैन महसूस करेगा। यही वास्तव में कीमत चुकाना है, और इसी कीमत की इच्छा परमेश्वर को है। यदि तू इस प्रकार से अभ्यास करेगा, तो परमेश्वर निश्चय ही तुझे आशीषित करेगा; यदि तू इसे प्राप्त नहीं कर सकता है, तो इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि तू कितना समझता है, या तू कितना अच्छा बोल सकता है, यह सब कुछ व्यर्थ ही होगा! यदि, परमेश्वर को प्रेम करने के मार्ग पर, तू परमेश्वर की ओर खड़े होने के योग्य है जब वह शैतान के साथ युद्ध करता है, और तू शैतान के पास वापस नहीं जाता है, तब तू परमेश्वर के प्रेम को प्राप्त कर सकता है, और तू अपनी गवाही में दृढ़ खड़ा हो सकता है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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