परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है" | अंश 492

लोग अगर केवल अपने विवेक की भावनाओं की सुनें तो वे परमेश्वर की सुंदरता को महसूस नहीं कर सकते हैं। अगर वे सिर्फ अपने विवेक पर भरोसा करते हैं, तो परमेश्वर के लिए उनका प्रेम कमजोर होगा। यदि तू केवल परमेश्वर का अनुग्रह और प्रेम का कर्ज़ चुकाने की बात करता है, तो तेरे पास उसके लिए अपने प्रेम में कोई भी जोश नहीं होगा; अपने विवेक के एहसास के आधार पर उससे प्रेम करना एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है। मैं यह क्यों कहता हूँ कि यह एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है? यह एक व्यावहारिक मुद्दा है। परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम किस तरह का प्रेम है? क्या वह परमेश्वर को मूर्ख बनाना और उसके लिए यंत्रवत ढंग से काम करना नहीं है? अधिकांश लोगों का मानना है कि चूँकि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कोई पुरस्कार नहीं है, और उससे प्रेम नहीं करने के लिए भी सभी को एकसमान ताड़ना दी जाएगी, इसलिए कुल मिलाकर पाप न करना ही काफी है। तो परमेश्वर से प्रेम करना और अपने विवेक के एहसास के आधार पर उसके प्रेम को चुकाना एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है, और यह परमेश्वर के लिए किसी के हृदय से निकला स्वाभाविक प्रेम नहीं है। परमेश्वर के लिए प्रेम किसी व्यक्ति के हृदय की गहराई से एक वास्तविक मनोभाव होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : “मैं स्वयं परमेश्वर के पीछे जाने और उसका अनुसरण करने के लिए तत्पर हूँ। अब परमेश्वर मुझे त्याग देना चाहे तो भी मैं उसका अनुसरण करूँगा। वह मुझे चाहे या ना चाहे, मैं तब भी उससे प्रेम करता रहूँगा, और अंत में मुझे उसे प्राप्त करना होगा। मैं अपना हृदय परमेश्वर को अर्पण करता हूँ, और चाहे वह कुछ भी करे, मैं अपने पूरे जीवन उसका अनुसरण करूँगा। चाहे कुछ भी हो, मुझे परमेश्वर से प्रेम करना होगा और उसे प्राप्त करना होगा; मैं तब तक आराम नहीं करूँगा जब तक मैं उसे प्राप्त नहीं कर लेता हूँ।” क्या तू इस तरह का संकल्प रखता है?

परमेश्वर पर विश्वास करने का मार्ग उससे प्रेम करने का मार्ग ही है। यदि तू उस पर विश्वास करता है तो तुझको उससे प्रेम करना ही चाहिए; हालांकि, उससे प्रेम करना केवल उसके प्रेम का प्रतिदान करने या अपने विवेक के एहसास के आधार पर उससे प्रेम करने को संदर्भित नहीं करता है-यह परमेश्वर के लिए एक शुद्ध प्रेम है। कभी-कभी लोग सिर्फ अपने विवेक के आधार पर परमेश्वर के प्रेम को महसूस करने में सक्षम नहीं होते हैं। मैंने हमेशा क्यों कहा : “परमेश्वर की आत्मा हमारी आत्माओं को प्रेरित करे”? मैंने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए लोगों के विवेक को प्रेरित करने की बात क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि लोगों का विवेक परमेश्वर की सुंदरता महसूस नहीं कर सकता है। यदि तू इन वचनों से आश्वस्त नहीं है, तो तू अपने विवेक का उपयोग उसके प्रेम को महसूस करने के लिए कर। उस पल में तेरे पास कुछ प्रबल प्रेरणा होगी, लेकिन यह जल्द ही गायब हो जाएगी। यदि तू परमेश्वर की सुंदरता को महसूस करने के लिए केवल अपने विवेक का उपयोग करता है, तो तेरे पास प्रार्थना करते समय प्रबल प्रेरणा होती है, लेकिन उसके बाद जल्द ही यह चली जाती है, बस गायब हो जाती है। ऐसा क्यों होता है? यदि तू केवल अपने विवेक का उपयोग करता है तो तू परमेश्वर के लिए अपने प्रेम को जागृत करने में असमर्थ होगा; जब तू वास्तव में अपने हृदय में उसकी सुंदरता महसूस करेगा तो तेरी आत्मा उसके द्वारा प्रेरित होगी, और केवल उसी समय तेरा विवेक अपनी मूल भूमिका निभाने में सक्षम होगा। अर्थात जब परमेश्वर इंसान की आत्मा को प्रेरित करता है और जब इंसान के पास ज्ञान होता है और वह हृदय में प्रोत्साहित होता है, जब वह अनुभव प्राप्त कर लेता है, उसके बाद ही, वो अपने विवेक से परमेश्वर को प्रभावी रूप से प्रेम करने में सक्षम होगा। अपने विवेक से परमेश्वर से प्रेम करना गलत नहीं है—यह परमेश्वर को प्रेम करने का सबसे निम्न स्तर है। “परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति बस इंसाफ करते हुए” प्रेम करना, इंसान को सक्रिय ढंग से प्रवेश करने के लिये प्रेरित कर ही नहीं सकता है। जब लोग पवित्र आत्मा का कुछ कार्य प्राप्त करते हैं, यानी, जब वे अपने व्यावहारिक अनुभव में परमेश्वर का प्रेम देखते हैं और अनुभव करते हैं, जब उन्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान होता है और वास्तव में देखते हैं कि परमेश्वर मानव जाति के प्रेम के कितने योग्य है और वह कितना प्यारा है, केवल तभी लोग परमेश्वर को सच में प्रेम करने में सक्षम होते हैं।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

परमेश्वर में आस्था की राह, है राह उससे प्यार करने की

परमेश्वर में आस्था की राह है राह उससे प्यार करने की। यदि तुम ईश्वर में आस्था रखते हो, तुम्हें उसके प्रति प्रेम रखना चाहिए।

ईश्वर से प्रेम का अर्थ नहीं है केवल उसके प्रेम को चुकाना, ना ही है करना प्रेम विवेक द्वारा उससे, बल्कि ईश्वर के प्रति है रखना शुद्ध प्रेम। विवेक नहीं जगायेगा ईश्वर के लिए प्रेम। जब तुम महसूस करो उसकी सुंदरता, तुम्हारी रूह को छूएगा परमेश्वर, तुम्हारा विवेक अपना कार्य करेगा। ईश्वर के लिए सच्चा प्यार आता है दिल की गहराई से। ये वो प्यार है जिसका आधार मानव का ईश्वर का सच्चा ज्ञान है।

जब ईश्वर प्रेरित करे मानव के रूह को, जब उनके दिलों में ज्ञान की प्राप्ति हो, तब ईश्वर को वे विवेक से प्यार कर सकते हैं अनुभव की प्राप्ति के बाद। अपने विवेक से ईश्वर से प्रेम करना ग़लत नहीं है, पर है कम प्यार, ये करता है ईश्वर के अनुग्रह के साथ इन्साफ़, पर मानव के प्रवेश को प्रेरित नहीं करता। ईश्वर के लिए सच्चा प्यार आता है दिल की गहराई से। ये वो प्यार है जिसका आधार मानव का ईश्वर का सच्चा ज्ञान है।

जब लोगों को प्राप्त हो पवित्रात्मा का कार्य, जब वे देखें और चखें ईश्वर का प्यार, जब पास हो उनके परमेश्वर का ज्ञान, तब उससे सच में प्यार किया जा सकता है। जब वे देखें कि परमेश्वर है योग्य, मानव के प्यार के इतने क़ाबिल, वो कितना प्यारा है ये देखकर, वे ईश्वर से सच में प्यार कर सकते हैं। ईश्वर के लिए सच्चा प्यार आता है दिल की गहराई से। ये वो प्यार है जिसका आधार मानव का ईश्वर का सच्चा ज्ञान है।

जो परमेश्वर को समझते नहीं, वे सिर्फ़ ईश्वर को अपनी धारणा और पसंद के आधार पर प्रेम करते हैं; वो प्यार दिल से नहीं, वो झूठा है। परमेश्वर को जो समझ जाए एक दफ़ा, दर्शाता है कि उसका दिल है ईश्वर की ओर। उसके दिल में जो प्यार है, वो सच्चा, स्वाभाविक है। केवल ऐसा ही व्यक्ति है जिसके दिल में परमेश्वर है। ईश्वर के लिए सच्चा प्यार आता है दिल की गहराई से। ये वो प्यार है जिसका आधार मानव का ईश्वर का सच्चा ज्ञान है।

‘मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ’ से

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