परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए" | अंश 468

परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान लोगों को उसके साथ कैसे सहयोग करना चाहिए? परमेश्वर वर्तमान में लोगों की परीक्षा ले रहा है। वह एक वचन भी नहीं बोल रहा; बल्कि स्वयं को छिपा रहा है और लोगों से सीधे संपर्क नहीं कर रहा है। बाहर से ऐसा लगता है, मानो वह कोई कार्य नहीं कर रहा, लेकिन सच्चाई यह है कि वह अभी भी मनुष्य के भीतर कार्य कर रहा है। जीवन में प्रवेश पाने की कोशिश करने वाले हर किसी के पास अपने जीवन की खोज के लिए एक दर्शन होता है, और उसे संदेह नहीं होता, भले ही वह परमेश्वर के कार्य को पूरी तरह से न समझता हो। परीक्षणों से गुजरते हुए, यहाँ तक कि जब तुम नहीं जानते कि परमेश्वर क्या करना चाहता है और वह क्या कार्य निष्पादित करना चाहता है, तब भी तुम्हें पता होना चाहिए कि मानवजाति के लिए परमेश्वर के इरादे हमेशा अच्छे होते हैं। यदि तुम सच्चे दिल से उसका अनुसरण करते हो, तो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा, और अंत में वह निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा, और लोगों को एक उचित मंजिल तक ले जाएगा। भले ही परमेश्वर वर्तमान में लोगों का किसी भी प्रकार से परीक्षण कर रहा हो, एक दिन ऐसा आएगा जब वह लोगों को उचित परिणाम प्रदान करेगा और उनके द्वारा किए गए कार्य के आधार पर उन्हें उचित प्रतिफल देगा। परमेश्वर लोगों को एक निश्चित बिंदु तक ले जाकर एक तरफ फेंक नहीं देगा और उन्हें अनदेखा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह एक विश्वसनीय परमेश्वर है। इस चरण में पवित्र आत्मा शुद्धिकरण का कार्य कर रहा है। वह हर एक व्यक्ति को शुद्ध कर रहा है। मृत्यु और ताड़ना के परीक्षणों से युक्त कार्य के चरणों में शुद्धिकरण वचनों के माध्यम से किया गया था। लोगों को परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए सबसे पहले उसके वर्तमान कार्य को समझना चाहिए और यह भी कि मानवजाति को कैसे सहयोग करना चाहिए। वास्तव में, यह कुछ ऐसा है, जिसे हर किसी को समझना चाहिए। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर क्या करता है, चाहे वह शुद्धिकरण हो या भले ही वह बोल नहीं रहा हो, परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण मानवजाति की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं होता। उसके कार्य का प्रत्येक चरण लोगों की अवधारणाओं को खंड-खंड कर देता है। यह उसका कार्य है। लेकिन तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि चूँकि परमेश्वर का कार्य एक निश्चित चरण में पहुँच गया है, इसलिए चाहे जो हो जाए, वह मानवजाति को मौत के घाट नहीं उतारेगा। वह मानवजाति को वादे और आशीष दोनों देता है, और वे सभी जो उसका अनुसरण करते हैं, उसके आशीष प्राप्त करने में सक्षम होंगे, लेकिन जो अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाएँगे। यह तुम्हारे अनुसरण पर निर्भर करता है। चाहे कुछ भी हो, तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हर एक व्यक्ति की उचित मंजिल होगी। परमेश्वर ने मनुष्यों को सुंदर आकांक्षाएँ प्रदान की हैं, लेकिन यदि वे अनुसरण नहीं करते, तो वे अप्राप्य हैं। तुम्हें अब इसे देखने में सक्षम होना चाहिए—परमेश्वर द्वारा लोगों का शुद्धिकरण और ताड़ना उसका कार्य है, लेकिन लोगों को अपनी तरफ से हर समय अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यावहारिक अनुभव में तुम्हें पहले जानना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाएँ और पीएँ; तुम्हें उसके वचनों में यह ढूँढ़ना चाहिए कि तुम्हें किस चीज़ में प्रवेश करना चाहिए और तुम्हारी कमियाँ क्या हैं, तुम्हें अपने व्यावहारिक अनुभव में प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के उस भाग को लेना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाया जाना चाहिए, और वैसा करने का प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना एक पहलू है। उसके अतिरिक्त, कलीसिया का जीवन बनाए रखा जाना चाहिए, तुम्हें एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना चाहिए, और तुम्हें अपनी सभी वर्तमान अवस्थाओं को परमेश्वर को सौंपने में सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य रहना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन तुम्हारे सामान्य प्रवेश को बनाए रख सकता है। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन निर्बाध जारी रखना और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही काम है, जो लोगों को करना चाहिए। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है, लेकिन सामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह पूर्ण बनाया जाना है, जबकि एक असामान्य स्थिति वाले लोगों के लिए यह एक परीक्षण है। पवित्र आत्मा के शुद्धिकरण के कार्य के वर्तमान चरण में, कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत महान है और कि लोगों को पूरी तरह से शुद्धिकरण की आवश्यकता है, अन्यथा उनकी अध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी हो जाएगी और उनके पास परमेश्वर की इच्छा प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं होगा। हालाँकि, जिन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, उनके लिए यह परमेश्वर का अनुसरण न करने और सभाओं में भाग न लेने या परमेश्वर के वचन को न खाने-पीने का एक कारण बन जाता है। परमेश्वर के कार्य में, चाहे वह कुछ भी करे या कोई भी बदलाव लाए, लोगों को एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन की एक आधार-रेखा अवश्य बनाए रखनी चाहिए। शायद तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के इस वर्तमान चरण में शिथिल नहीं हुए हो, लेकिन तुमने अभी भी बहुत-कुछ प्राप्त नहीं किया है, और बहुत अच्छी फसल नहीं काटी है। इस तरह की परिस्थितियों में तुम्हें अभी भी नियमों का पालन करना चाहिए; तुम्हें इन नियमों के अनुसार चलना चाहिए, ताकि तुम अपने जीवन में नुकसान न झेलो और ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करो। यदि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन असामान्य है, तो तुम परमेश्वर के वर्तमान कार्य को नहीं समझ सकते; बल्कि हमेशा महसूस करते हो कि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, और यद्यपि तुम उसका अनुसरण करने के लिए तैयार होते हो, लेकिन तुममें अंत:प्रेरणा का अभाव रहता है। तो भले ही परमेश्वर वर्तमान में कुछ भी कर रहा हो, लोगों को सहयोग अवश्य करना चाहिए। यदि लोग सहयोग नहीं करते, तो पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर सकता, और यदि लोगों के पास सहयोग करने वाला दिल नहीं है, तो वे शायद ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं। यदि तुम अपने अंदर पवित्र आत्मा का कार्य चाहते हो, और यदि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सम्मुख अपनी मूल भक्ति बनाए रखनी चाहिए। अब, तुम्हारे पास गहन समझ, उच्च सिद्धांत, या ऐसी अन्य चीजों का होना आवश्यक नहीं है—बस इतना ही आवश्यक है कि तुम परमेश्वर के वचन को मूल आधार पर बनाए रखो। यदि लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते और गहरे प्रवेश की कोशिश नहीं करते, तो परमेश्वर उन चीजों को छीन लेगा, जो मूलत: उसकी थीं। अंदर से लोग हमेशा सुविधा के लोभी होते हैं और उसका आनंद लेते हैं, जो पहले से ही उपलब्ध होता है। वे बिना कोई भी कीमत चुकाए परमेश्वर के वादे प्राप्त करना चाहते हैं। ये अनावश्यक विचार हैं, जो मनुष्य रखता है। बिना कोई कीमत चुकाए स्वयं जीवन प्राप्त करना—पर क्या कभी कुछ भी इतना आसान रहा है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करता है और अपने स्वभाव में बदलाव चाहता है, तो उसे उसकी कीमत अवश्य चुकानी चाहिए और वह अवस्था प्राप्त करनी चाहिए, जहाँ वह हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करेगा, चाहे परमेश्वर कुछ भी करे। यह ऐसा काम है, जिसे लोगों को अवश्य करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि तुम इस सबका एक नियम के रूप में पालन करते हो, तो भी तुम्हें हमेशा इस पर टिके रहना चाहिए, और चाहे परीक्षण कितने भी बड़े हों, तुम परमेश्वर के साथ अपने सामान्य संबंध को जाने नहीं दे सकते। तुम्हें प्रार्थना करने, अपने कलीसिया-जीवन को बनाए रखने, और अपने भाइयों और बहनों को कभी न छोड़ने में सक्षम होना चाहिए। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले, तब भी तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए। आध्यात्मिक जीवन के लिए यह न्यूनतम अपेक्षा है। हमेशा खोज करने की इच्छा रखना, सहयोग करने का भरसक प्रयास करना, अपनी समस्त ऊर्जा लगा देना—क्या यह किया जा सकता है? यदि लोग इसे आधार के रूप में लें, तो वे विवेक हासिल करने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। तुम्हारी स्वयं की अवस्था सामान्य होने पर परमेश्वर का वचन स्वीकार करना आसान है, इन परिस्थितियों में सत्य का अभ्यास करना मुश्किल नहीं लगता, और तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य महान है। लेकिन यदि तुम्हारी हालत खराब है, तो परमेश्वर का कार्य कितना भी महान क्यों न हो, और चाहे कोई कितनी भी खूबसूरती से क्यों न बोलता हो, तुम उस पर कोई ध्यान नहीं दोगे। जब व्यक्ति की हालत सामान्य नहीं होती, तो परमेश्वर उसमें कार्य नहीं कर सकता, और वे अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सकते।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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