परमेश्वर के दैनिक वचन | "इस्राएलियों की तरह सेवा करो" | अंश 461

इन दिनों, कई लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि दूसरों के साथ समन्वय करते समय क्या सबक सीखे जाने चाहिये। मैंने देखा है कि तुम लोगों में से कई लोग दूसरों के साथ सहयोग करते समय बिलकुल सबक नहीं सीख पाते; तुममें से ज़्यादातर लोग अपने ही विचारों से चिपके रहते हैं। कलीसिया में काम करते समय, तुम अपनी बात कहते हो और दूसरे लोग उनकी बातें कहते हैं। एक की बात का दूसरे की बात से कोई संबंध नहीं होता है; दरअसल, तुम लोग बिलकुल भी सहयोग नहीं करते। तुम सभी लोग सिर्फ़ अपने परिज्ञान को बताने या उस "बोझ" को हल्का करने में लगे रहते हो जिसे तुम भीतर ढोते हो और किसी मामूली तरीके से भी जीवन नहीं खोजते हो। ऐसा लगता है कि तुम केवल लापरवाही से काम करते हो, तुम हमेशा यह मानते हो कि कोई और व्यक्ति चाहे जो भी कहता या करता हो, तुम्हें अपने ही चुने मार्ग पर चलना चाहिये। तुम सोचते हो कि चाहे दूसरे लोगों की परिस्थितियां कैसी भी हों, तुम्हें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार सहभागिता करनी चाहिये। तुम दूसरों की क्षमताओं का पता लगाने में सक्षम नहीं हो और ना ही तुम खुद की जाँच करने में सक्षम हो। तुम लोगों की चीज़ों की स्वीकृति वास्तव में गुमराह और गलत है। यह कहा जा सकता है कि अब भी तुम लोग दंभ का काफी प्रदर्शन करते हो, मानो कि तुम्हें वही पुरानी बीमारी फिर से लग गई है। तुम लोग एक दूसरे के साथ इस तरीके से बात नहीं करते हो जिसमें पूरा खुलापन हो, उदाहरण के लिये, किसी कलीसिया में काम करके तुमने किस तरह का परिणाम हासिल किया या तुम्हारी अंतरात्मा की हाल की स्थिति क्या है, वगैरह; तुम लोग ऐसी चीज़ों के बारे में कभी बात ही नहीं करते। तुम लोगों में अपनी धारणाओं को छोड़ने या खुद का त्याग करने जैसे अभ्यासों में बिलकुल भी प्रतिबद्धता नहीं है। अगुवा और कार्यकर्ता सिर्फ़ अपने भाई-बहनों को नकारात्मकता से दूर रखने और कैसे उनसे उत्साहपूर्वक अनुसरण करवाया जाए, इसके बारे में सोचते हैं। हालाँकि तुम सब लोग सोचते हो कि उत्साहपूर्वक अनुसरण करना अपने आप में काफी है और बुनियादी तौर पर तुम्हें इस बात की कोई समझ नहीं है कि स्वयं को जानने और त्यागने का क्या अर्थ है, दूसरों के साथ समन्वय में सेवा करने का क्या अर्थ है यह तो तुम और भी नहीं जानते। तुम बस स्वयं को परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने का इच्छुक बनाने की सोचते हो, पतरस की शैली में जीवन जीने का इच्छुक बनाने की सोचते हो। इन चीज़ों के अलावा, तुम और कुछ भी नहीं सोचते। तुम तो यह भी कहते हो कि दूसरे लोग चाहे जो भी करें, तुम आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करोगे और दूसरे लोग चाहे जैसे भी हों, तुम स्वयं परमेश्वर द्वारा पूर्णता की खोज करोगे, और ऐसा करना ही काफ़ी होगा। हालाँकि, सच तो यह है कि तुम्हारी इच्छाशक्ति को किसी भी तरह वास्तविकता में ठोस अभिव्यक्ति नहीं मिली है। क्या तुम लोग आजकल इसी तरह का व्यवहार नहीं करते हो? तुम लोगों में से हर कोई खुद की समझ से चिपका हुआ है और तुम सभी चाहते हो कि तुम्हें पूर्ण किया जाये। मैं देख रहा हूँ कि तुम लोगों ने काफ़ी लंबे समय से सेवा की है, लेकिन कोई प्रगति नहीं की; खास तौर पर, सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने के इस सबक में, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है! कलीसियाओं में जाते हुए तुम अपने ही तरीके से बात करते हो और दूसरे लोग उनके तरीके से बात करते हैं। सद्भावनापूर्ण सहयोग तो शायद ही कभी होता है और तुम्हारे अधीन सेवा करने वाले अनुयायियों के बारे में तो यह बात और भी सच है। कहने का मतलब है कि तुम लोगों में से शायद ही कोई इस बात को समझता है कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है या परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिये। तुम लोग उलझन में हो और इस तरह के सबकों को छोटी-मोटी बात मानते हो। कई लोग तो ऐसे भी हैं जो न केवल सत्य के इस पहलू का अभ्यास करने में विफल रहते हैं, बल्कि जान-बूझकर गलती भी करते हैं। यहाँ तक कि जिन लोगों ने कई सालों तक सेवा की है वे भी एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते और एक दूसरे के खिलाफ़ षड्यंत्र करते हैं और ईर्ष्यालु और प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं; हर व्यक्ति अपने से ही मतलब रखता है और वे ज़रा-भी सहयोग नहीं करते। क्या ये सारी चीज़ें तुम लोगों की वास्तविक कद-काठी को नहीं दर्शाती हैं? हर रोज़ साथ मिलकर सेवा करने वाले तुम लोग उन इस्राएलियों की तरह हो जो हर दिन मंदिर जाकर सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं की सेवा करते थे। ऐसा कै‘से हो सकता है कि तुम लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हो, बिलकुल नहीं जानते कि समन्वय या सेवा कैसे करनी है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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