परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें" | अंश 453

प्रत्येक व्यक्ति जिसने संकल्प लिया है वह परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परन्तु यह अवश्य है कि जो परमेश्वर की इच्छा की बहुत परवाह करते हैं और जो परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य एवं पात्र हैं। तुम लोगों के अनुभवों में, यह देखा जा सकता है कि बहुत से लोगों का मानना है कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ है परमेश्वर के लिए उत्साहपूर्वक सुसमाचार का प्रचार करना, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाना, परमेश्वर के लिए व्यय करना एवं बलिदान करना, इत्यादि; यहाँ तक कि अधिक धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल को हाथों में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाना और पश्चाताप तथा पाप स्वीकार करवाने के द्वारा लोगों को बचाना है; बहुत से धार्मिक अधिकारी हैं जो सोचते हैं कि सेमेनरी में अध्ययन करने के बाद प्रार्थनालय में उपदेश देना, बाइबल के अध्यायों को पढ़ कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है; बहुत से साथी भाई और बहन मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न बढ़ाना, और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है; दरिद्र प्रदेशों में ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ चंगाई करना और दुष्टात्माओं को निकालना है, या भाईयों एवं बहनों के लिए प्रार्थना करना, या उनकी सेवा करना है; तुम लोगों के बीच, बहुत से ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, और प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, और हर जगह कलीसियाओं में जाना है; इस प्रकार ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि कलीसिया का जीवन जीना ही परमेश्वर की सेवा करना है। फिर भी कुछ लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं जितने आकाश में तारे हैं, किन्तु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—महत्वहीन रूप से छोटी है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा की सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि तुम लोग "परमेश्वर की सेवा" वाक्यांश के मुख्य सार को नहीं समझते हो, और परमेश्वर की इच्छा की सेवा कैसे की जाए इस बारे में तुम लोग बहुत कम समझते हो। आज, हम मुख्य रूप से संगति कर रहें हैं कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप किस प्रकार सेवा करें, परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्ट करने के लिए किस प्रकार सेवा करें।

यदि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा की सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह अवश्य समझना चाहिए कि किस प्रकार के लोगों को परमेश्वर प्यार करता है, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य होते हैं। यह सब से छोटी चीज़ है जिससे तुम लोगों को सज्जित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों को, और उस कार्य को जानना चाहिए जिसे परमेश्वर अभी यहीँ करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोग सब से पहले प्रवेश करोगे और सबसे पहले परमेश्वर के महान आदेश को प्राप्त करोगे। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर वास्तव में अनुभव कर लोगे, और जब तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य हो जाओगे। और जब तुम लोग उसकी सेवा करते हो तो तब होता है कि परमेश्वर तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखों को प्रबुद्ध करता है, और तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने एवं उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गम्भीर एवं वास्तविक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं वे कलीसियाओं के बीच आने जाने और तुम लोगों के भाईयों और बहनों को, तुम लोगों की स्वयं की कमियों को पूरा करने के लिए दूसरे की मज़बूतियों पर प्रत्येक पक्ष का चित्रांकन प्रदान करने, और तुम लोगों की आत्माओं में एक अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो जाएँगे। केवल इस प्रभाव को प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा की सेवा करने और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य बनोगे।

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर के प्यारे होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति अत्यंत वफादारी के लिए सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोगों के पीठ पीछे कार्यकलाप करते हो या उनके सामने, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर के आनन्द को प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और इस बात की परवाह किए बिना कि अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तुम हमेशा अपने स्वयं के मार्ग पर चलते हो, और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल यह ही परमेश्वर का एक अंतरंग है। यह कि परमेश्वर के अंतरंग ही सीधे तौर पर उसकी सेवा करने में समर्थ हैं क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपने स्वयं के हृदय के रूप में मानने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी मानने में समर्थ हैं, और वे इस बात पर कोई विचार नहीं करते हैं कि उन्हें संभावना प्राप्त होगी या खो जाएगी: यहाँ तक कि जब उनके पास संभावित नहीं होती है, और वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे, तब भी वे एक प्रेममय हृदय के साथ हमेशा परमेश्वर में विश्वास करेंगे। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी, और उसकी चाहतों को साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह दुःखदायी और कमज़ोर हैं, फिर भी वे परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिए दर्द को सहन कर सकते हैं एवं उसे छोड़ सकते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और भी अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और वह जो परमेश्वर करेगा वह इन लोगों के माध्यम से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर के प्यारे हैं, वे परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ-साथ शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो तो तभी निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ-साथ शासन करोगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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