परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" | अंश 449

उन मूर्ख और घमण्डी लोगों ने न केवल अपना सर्वोत्तम प्रयास या अपना कर्तव्य नहीं किया है, बल्कि इसके बजाय उन्होंने अनुग्रह के लिए अपने हाथ पसार दिये हैं, मानो कि वे जो माँगते हैं वे उसके योग्य हों। यदि वे वह प्राप्त करने में असफल होते हैं जो वे माँगते हैं, तो वे और भी अधिक अविश्वासी बन जाते हैं। इस प्रकार के मनुष्य को कैसे उचित माना जा सकता है? तुम लोग कमजोर क्षमता के और तर्कशक्ति से विहीन हो, प्रबंधन के कार्य के दौरान तुम लोगों को जो कर्तव्य पूरा करना चाहिए उसे पूरा करने में पूर्णतः अक्षम हो। तुम लोगों का महत्व पहले ही तेजी से गिर चुका है। तुम लोगों के लिए ऐसा उपकार दर्शाने हेतु मुझे चुकाने की तुम लोगों की विफलता पहले से ही चरम विद्रोहशीलता का कृत्य है, तुम लोगों की निंदा करने और तुम लोगों की कायरता, अक्षमता, अधमता और अनुपयुक्तता को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त है। कैसे तुम लोग तब भी अपने हाथों को पसारे रखने के योग्य हो सकते हो? तुम लोग मेरे कार्य के लिए थोड़ी सी भी सहायता करने में असमर्थ हो, अपने विश्वास के प्रति समर्पित रहने में असमर्थ हो, और मेरे लिए गवाही देने के लिए असमर्थ हो। ये पहले से ही तुम लोगों के कुकर्म और असफलताएँ हैं, फिर भी इसके बजाय तुम लोग मुझ पर आक्रमण करते हो, मेरे बारे में झूठी बातें करते हो, और शिकायत करते हो कि मैं अधर्मी हूँ। क्या यही वह है जो तुम लोगों की वफादारी का गठन करता है? क्या यही वह है जो तुम लोगों के प्रेम का गठन करता है? इसके परे तुम लोग और कौन सा कार्य कर सकते हो? जो भी कार्य किया गया है उस में तुम लोगों ने क्या योगदान दिया है? तुमने कितना खर्च किया है? यह पहले ही एक महान दया का कृत्य है कि मैं तुम लोगों के ऊपर कोई दोष नहीं लगाता हूँ, फिर भी तुम लोग बेशर्मी से मुझसे बहाने बनाते हो और निजी तौर पर मेरी शिकायत करते हो। क्या तुम लोगों में मानवता की हल्की सी भी झलक है? यद्यपि मनुष्य का कर्तव्य मनुष्य के मन और उसकी अवधारणाओं से दूषित हो जाता है, किन्तु तुम्हें अवश्य अपना कर्तव्य करना और अपने विश्वास के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए। मनुष्य के कार्य में अशुद्धताएँ उसकी क्षमता की समस्या हैं, जबकि, यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरा नहीं करता है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता को दर्शाता है। मनुष्य के कर्तव्य और क्या वह धन्य या श्रापित है के बीच कोई सह-सम्बन्ध नहीं है। कर्तव्य वह है जो मनुष्य को पूरा करना चाहिए; यह उसका आवश्यक कर्तव्य है और प्रतिफल, परिस्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह कर्तव्य कर रहा है। ऐसा मनुष्य जिसे धन्य किया जाता है वह न्याय के बाद सिद्ध बनाए जाने पर भलाई का आनन्द लेता है। ऐसा मनुष्य जिसे श्रापित किया जाता है तब दण्ड प्राप्त करता है जब ताड़ना और न्याय के बाद उसका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, अर्थात्, उसे सिद्ध नहीं बनाया गया है। एक सृजन किए गए प्राणी के रूप में, मनुष्य को, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या उसे धन्य या श्रापित किया जाएगा, अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, वह करना चाहिए जो उसे करना चाहिए, और वह करना चाहिए जो वह करने के योग्य है। यही किसी ऐसे मनुष्य के लिए सबसे आधारभूत शर्त है, जो परमेश्वर की तलाश करता है। तुम्हें केवल धन्य होने के लिए अपने कर्तव्य को नहीं करना चाहिए, और श्रापित होने के भय से अपना कृत्य करने से इनकार नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को एक बात बता दूँ: यदि मनुष्य अपना कार्य करने में समर्थ है, तो इसका अर्थ है कि वह उसे करता है जो उसे करना चाहिए। यदि मनुष्य अपना कर्तव्य करने में असमर्थ है, तो यह मनुष्य की विद्रोहशीलता को दर्शाता है। यह सदैव उसके कर्तव्य को करने की प्रक्रिया के माध्यम से है कि मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और यह इसी प्रक्रिया के माध्यम से है कि वह अपनी वफादारी प्रदर्शित करता है। वैसे तो, तुम जितना अधिक अपना कार्य करने में समर्थ होगे, तुम उतने ही अधिक सत्य प्राप्त करोगे, और तुम्हारी अभिव्यक्ति भी उतनी ही अधिक वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपने कर्तव्य को बिना रुचि के करते हैं और सत्य की तलाश नहीं करते हैं वे अन्त में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपने कर्तव्य को नहीं करते हैं, और अपने कर्तव्य को पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। ऐसे लोग वे हैं जो अपरिवर्तित रहते हैं और श्रापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो व्यक्त करते हैं वह भी कुछ नहीं बल्कि दुष्टता ही होती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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