परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है" | अंश 429

परमेश्वर के वचनों को मानते हुए स्थिरता के साथ उनकी व्याख्या करने के योग्य होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है; बातें इतनी भी सरल नहीं हैं जितनी तुम सोचते हो। तुम्हारे पास वास्तविकता है या नहीं, यह इस बात पर आधारित नहीं है कि तुम क्या कहते हो; अपितु यह इस पर आधारित है कि तुम किसे जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाते हैं, तभी कहा जा सकता है कि तुममें वास्तविकता है और तभी कहा जा सकता है कि तुमने वास्तविक समझ और असल आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है। तुम्हारे अंदर लम्बे समय तक परीक्षा को सहने की क्षमता होनी चाहिए, और तुम्हें उस समानता को जीने के योग्य होना अनिवार्य है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुम से करता है; यह मात्र दिखावा नहीं होना चाहिए; बल्कि यह तुम में स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होना चाहिए। तभी तुम में वस्तुतः वास्तविकता होगी और तुम जीवन प्राप्त करोगे। मैं सेवाकर्मियों के परीक्षण का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं: सेवाकर्मियों के विषय में कोई भी बड़े-बड़े सिद्धांत बता सकता है। इस विषय के बारे में सभी को अच्छा ज्ञान है; वे लोग इस विषय पर बोलते हैं और हर भाषण पिछले से बेहतर होता है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी बड़े परीक्षण से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसके पास देने के लिए अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य के जीवन जीने में अभी भी बहुत कमी है, यह पूरी तरह से उसकी समझ के विपरीत है। इसलिए इसका, मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद बनना अभी शेष है, और यह अभी मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसका आध्यात्मिक कद रेत पर निर्मित एक किले के समान है जो हिल रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है। मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से बहुत ही अल्प वास्तविकता प्रवाहित हो रही है और उसके जीवन में समस्त वास्तविकता ज़बरदस्ती लाई गई है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। हालाँकि लोग ये दावा करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम कभी परिवर्तित नहीं होता, लेकिन वे ऐसा परीक्षणों का सामना होने से पहले कहते हैं। एक दिन अचानक परीक्षणों से सामना हो जाने पर जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता से मेल नहीं खाएँगी और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को दरकिनार कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ होती हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य एक कठोर परीक्षण, एक बहुत बड़े परीक्षण से गुज़रता है। क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर जब मनुष्य का परीक्षण ले रहा होता है, तो वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा; और इसी प्रकार मनुष्य को उजागर किया जाता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम आज के परमेश्वर को जानते हो और साथ ही तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं। क्या तुम परमेश्वर के कार्यों को लेकर सन्देहों से सचमुच मुक्त हो? जब तुम पर कोई बड़ा परीक्षण आयेगा तो क्या तुम दृढ़ रह सकोगे? कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है "मैं गारंटी देता हूँ कि कोई समस्या नहीं आएगी?" कौन दृढ़तापूर्वक कहने की हिम्मत कर सकता है, "हो सकता है दूसरों को सन्देह हो, परन्तु मैं कभी भी सन्देह नहीं करूँगा?" यह ठीक वैसे ही है जैसे जब पतरस का परीक्षण हुआ : वह हमेशा सत्य के प्रकट किए जाने से पहले बड़ी-बड़ी बातें करता था। यह पतरस की ही एक अनोखी कमी नहीं थी; यह सबसे बड़ी कठिनाई है, जिसका सामना प्रत्येक मनुष्य वर्तमान में कर रहा है। यदि परमेश्वर के आज के कार्य के तुम्हारे ज्ञान को देखने के लिए मैं कुछ स्थानों पर जाऊँ, या कुछ भाइयों और बहनों से भेंट करूँ, तो तुम सब निश्चित रूप से अपने ज्ञान के विषय में बहुत कुछ कह पाओगे, और ऐसा प्रतीत होगा कि तुम्हारे अंदर कोई सन्देह नहीं है। यदि मैं तुमसे पूछूँ : "क्या तुम वास्तव में तय कर सकते हो कि आज का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? बिना किसी सन्देह के?" तुम निश्चित रूप से उत्तर दोगे : "बिना किसी सन्देह के, यह कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा ही किया जा रहा है।" एक बार जब तुम इस प्रकार से उत्तर दे दोगे, तो तुम में थोड़ा-सा भी सन्देह नहीं होगा बल्कि तुम बहुत आनन्द का अनुभव कर रहे होगे, यह सोचकर कि तुम ने थोड़ी-सी वास्तविकता प्राप्त कर ली है। जो लोग बातों को इस रीति से समझते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनमें बहुत कम वास्तविकता होती है; जो व्यक्ति जितना अधिक सोचता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह परीक्षणों में उतना ही कम स्थिर रह पाता है। धिक्कार है उन पर जो अहंकारी और दंभी होते हैं, और धिक्कार है उन्हें जिन्हें स्वयं का कोई ज्ञान नहीं है; ऐसे लोग बातें करने में कुशल होते हैं, परन्तु अपनी बातों पर अमल करने में ऐसे लोग बहुत ही खराब होते हैं। छोटी-सी भी समस्या नज़र आते ही ये लोग सन्देह करना आरम्भ कर देते हैं और त्याग देने का विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। उनमें कोई वास्तविकता नहीं होती; उनके पास मात्र सिद्धान्त हैं, जो धर्म से ऊपर हैं और ये उन समस्त वास्तविकताओं से रहित हैं जिनकी परमेश्वर अभी अपेक्षा करता है। मुझे उनसे अधिक घृणा होती है जो मात्र सिद्धान्तों की बात करते हैं और जिनमें कोई वास्तविकता नहीं होती। जब वे कोई कार्य करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, परन्तु जैसे ही उनका सामना वास्तविकता से होता है, वे बिखर जाते हैं। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि इन लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हवा और लहरें कितनी भयंकर हैं, यदि तुम अपने मन में थोड़-सा भी सन्देह किए बिना खड़े रह सकते हो और तुम स्थिर रह सकते हो और उस समय भी इन्कार करने की स्थिति में नहीं रहते हो जब तुम ही अकेले बचते हो, तब यह माना जाएगा कि तुम्हारे पास सच्ची समझ है और वस्तुतः तुम्हारे पास वास्तविकता है। अगर जिधर हवा बहती है यदि तुम भी उधर ही बह जाते हो, तुम भीड़ के पीछे जाते हो और वही कहते हो जो अन्य लोग कह रहे हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितनी उत्तम रीति से बातें करते हो, यह इस बात का प्रमाण नहीं होगा कि तुम में वास्तविकता है। इसलिए मैं तुम्हें परामर्श देता हूँ कि निरर्थक शब्द बोलने में जल्दबाज़ी न करो। क्या तुम जानते हो परमेश्वर क्या करने वाला है? दूसरे पतरस जैसा व्यवहार मत करो, नहीं तो स्वयं को लज्जित करोगे और तुम अपनी प्रतिष्ठा को बनाए नहीं रख पाओगे—यह किसी का कुछ भला नहीं करता है। अधिकतर व्यक्तियों का कोई असल आध्यात्मिक कद नहीं होता। हालाँकि परमेश्वर ने बहुत-से कार्य किये हैं, परन्तु उसने लोगों पर वास्तविकता प्रकट नहीं की है; यदि सही-सही कहें तो, परमेश्वर ने कभी किसी को व्यक्तिगत रूप से ताड़ना नहीं दी है। कुछ लोगों को ऐसे परीक्षणों के ज़रिए उजागर किया गया है, उनके पापी हाथ यह सोचकर दूर-दूर तक पहुँच रहे थे कि परमेश्वर का फायदा उठाना आसान है, वे जो चाहे कर सकते हैं। चूँकि वे इस प्रकार के परीक्षण का भी सामना करने के योग्य नहीं हैं, अधिक चुनौतीपूर्ण परीक्षणों का तो सवाल ही नहीं उठता है, वास्तविकता के होने का भी सवाल नहीं उठता। क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बनाने का प्रयास नहीं है? वास्तविकता रखना ऐसा कुछ नहीं है जिसमें जालसाजी की जा सके, और न ही यह ऐसा कुछ है, जिसे तुम जान कर प्राप्त कर सकते हो। यह तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद पर निर्भर है, और यह इस बात पर भी निर्भर है कि तुम समस्त परीक्षणों का सामना करने के योग्य हो या नहीं। क्या तुम समझते हो?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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