परमेश्वर के दैनिक वचन | "आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना" | अंश 427

सत्य का अभ्यास ऐसा मार्ग है जिससे मनुष्य जीवन में उन्नति कर सकता है। यदि तुम लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास केवल सिद्धान्त रह जायेगा और तुम लोगों के पास कोई वास्तविक जीवन नहीं होगा। सत्य मनुष्य के आध्यात्मिक कद का प्रतीक है। तुम सत्य का अभ्यास करते हो या नहीं, इसका संबंध इस बात से है कि तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद है या नहीं। यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो धार्मिक होने का अभिनय मत करो, या यदि तुम देह की भावनाओं और उसकी देखभाल में लिप्त होते हो, तो तुम आज्ञाओं के पालन करने से बहुत दूर हो। यह गहनतम सबक है। प्रत्येक युग में, लोगों के प्रवेश करने के लिए और समझने के लिए बहुत से सत्य होते हैं, किन्तु प्रत्येक युग में अलग-अलग आज्ञाएँ भी होती हैं जो उस सत्य के साथ होती हैं। लोग जिस सत्य का अभ्यास करते हैं और आज्ञाओं का पालन करते हैं वह एक युग विशेष से संबंधित होता है। प्रत्येक युग के अपने सत्य होते हैं जिनका अभ्यास किया जाना चाहिए और ऐसी आज्ञाएँ होती हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए। हालाँकि, परमेश्वर द्वारा घोषित विभिन्न आज्ञाओं के आधार पर, अर्थात्, विभिन्न युगों के आधार पर, मनुष्य के द्वारा सत्य के अभ्यास का लक्ष्य और प्रभाव आनुपातिक रूप में भिन्न होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि आज्ञाएँ सत्य की सहायता के लिए हैं और सत्य आज्ञाओं को बनाए रखने के लिए विद्यमान रहता है। यदि केवल सत्य हो, तो कहने को परमेश्वर के कार्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा। लेकिन, आज्ञाओं का हवाला देकर, मनुष्य पवित्र आत्मा के कार्य में रुझान की सीमाओं को पहचान सकता है और मनुष्य उस युग को जान सकता है जिसमें परमेश्वर कार्य करता है। धर्म में, बहुत से लोग हैं जो उसी सत्य का अभ्यास कर सकते हैं जिसका अभ्यास व्यवस्था के युग के मनुष्य के द्वारा किया गया था। लेकिन, उसके पास नये युग की आज्ञाएँ नहीं हैं, न ही वह नये युग की आज्ञाओं का पालन कर सकता है। वह अभी भी पुरानी रीति का पालन करता है और आदिम मानव बना हुआ है। उसके पास कार्य करने की नयी पद्धतियां नहीं हैं और वह नए युग की आज्ञाओं को नहीं देख सकता। इस तरह, उसमें परमेश्वर का कार्य नहीं होता। यह ऐसा है मानो उनके पास बस अंडे का खाली खोल है; यदि उसके अंदर कोई चूज़ा नहीं है तो उसमें कोई आत्मा नहीं है। अधिक सटीकता से कहा जाये तो, उसमें कोई जीवन नहीं है। ऐसे लोगों ने अभी नए युग में प्रवेश नहीं किया है और वे कई कदम पीछे रह गए हैं। इसलिए, पुराने युगों के सत्यों का होना लेकिन नए युग की आज्ञाओं का न होना बेकार है। तुम लोगों में से अनेक लोग आज के सत्य का अभ्यास करते हैं किन्तु उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करते। तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, और जिस सत्य का तुम अभ्यास करते हो वह बेकार और निरर्थक होगा और परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा। सत्य का अभ्यास, पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की पद्धतियों के मानदंडों के अंतर्गत किया जाना चाहिए; इसे आज के व्यवहारिक परमेश्वर की वाणी की प्रतिक्रिया में किया जाना चाहिए। इसके बिना हर चीज़ बेकार है, जैसे बाँस की टोकरी से पानी निकालने की कोशिश करना। यह नए युग की आज्ञाओं की घोषणा का व्यवहारिक अर्थ भी है। अगर लोगों को आज्ञाओं के अनुसार चलना है, तो बिना किसी असमंजस के उन्हें कम से कम उस व्यवहारिक परमेश्वर के बारे में तो जानना ही चाहिए जो देह में प्रकट होता है। दूसरे शब्दों में, लोगों को आज्ञाओं का पालन करने के सिद्धांत समझने चाहिए। आज्ञाओं के अनुसार चलने का अर्थ, अव्यवस्थित या मनमाने ढंग से उनका पालन करना नहीं है, बल्कि एक आधार, एक उद्देश्य और सिद्धांतों के साथ उनका पालन करना है। जो पहली चीज़ तुम्हें हासिल करनी चाहिए वह यह है कि तुम्हारी दृष्टि स्पष्ट हो। यदि तुम्हारे पास वर्तमान समय में पवित्र आत्मा के कार्य की पूरी समझ है और यदि तुम आज के कार्य की रीति में प्रवेश करते हो, तो तुम स्वाभाविक रूप से आज्ञाओं का पालन करने के सार की स्पष्ट समझ पा लोगे। यदि वह दिन आता है जब तुम नये युग की आज्ञाओं के सार को जान जाते हो और तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो, तो उस समय तुम पूर्ण किए जा चुके होगे। सत्य का अभ्यास करने और आज्ञाओं के पालन करने का यही व्यवहारिक महत्व है। तुम आज्ञाओं का पालन कर सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम किस प्रकार नए युग की आज्ञाओं के सार को समझते हो। पवित्र आत्मा का कार्य मनुष्य के सामने निरन्तर प्रकट होगा और परमेश्वर मनुष्य से अधिकाधिक अपेक्षा करेगा। इसलिए, वे सत्य जिनका मनुष्य वास्तव में अभ्यास करता है उनकी संख्या और बढ़ जाएगी तथा वे बड़े हो जाएँगे एवं आज्ञाओं का पालन करने के प्रभाव और अधिक गहरे हो जाएँगे। इसलिए, तुम लोगों को उसी समय सत्य का अभ्यास करना चाहिए और आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। किसी को भी इस मामले को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए; इस नए युग में नए सत्य और नई आज्ञाओं को एक ही समय में आरम्भ होने देना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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