परमेश्वर के दैनिक वचन | "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" | अंश 417

किस प्रकार कोई सच्ची प्रार्थना में प्रवेश करता है?

प्रार्थना करते हुए तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण होना चाहिए, और यह सच्चा होना चाहिए। तुम सच्चाई के साथ परमेश्वर से वार्तालाप कर रहे होते हो और उससे प्रार्थना कर रहे होते हो; तुम्हें अच्छे-अच्छे शब्दों का प्रयोग करते हुए परमेश्वर को धोखा नहीं देना चाहिए। प्रार्थना उसके इर्द-गिर्द केंद्रित होनी चाहिए जिसे परमेश्वर आज पूरा करना चाहता है। परमेश्वर से प्रार्थना करो कि वह तुम्हारे लिए और बड़े प्रकाशन और प्रज्ज्वलन को लेकर आए, और तुम परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना के लिए अपनी वास्तविक अवस्था और समस्याओं को लेकर आओ, और परमेश्वर के समक्ष दृढ़ निश्चय करो। प्रार्थना किसी प्रक्रिया का अनुसरण करना नहीं, बल्कि अपने सच्चे हृदय का इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर को खोजना है। प्रार्थना करो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय की सुरक्षा करे, और इसे अक्सर परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण बनाए, तुम्हें योग्य बनाए कि तुम स्वयं को जान सको, और स्वयं का तिरस्कार कर सको, और उस वातावरण में स्वयं को त्याग सको जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है, और इस प्रकार वह तुम्हें परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने की अनुमति दे और एक ऐसा व्यक्ति बनाए जो परमेश्वर से सच्चाई से प्रेम करता है।

प्रार्थना का महत्व क्या है?

प्रार्थना एक ऐसा तरीका है जिसमें मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है, यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा के द्वारा स्पर्श किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो प्रार्थनारहित होते हैं वे आत्मा के बिना मृत लोग होते हैं, और यह इसका प्रमाण है कि उनमें परमेश्वर के द्वारा स्पर्श को पाने की क्षमताओं की कमी होती है। प्रार्थना के बिना लोग एक सामान्य आत्मिक जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते, वे पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य भी नहीं बन पाते; प्रार्थना के बिना वे परमेश्वर के साथ अपने संबंध को तोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त करने में अयोग्य हो जाते हैं। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर पर विश्वास करता है, जितना अधिक तुम प्रार्थना करते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर के द्वारा स्पर्श को प्राप्त करते हो। ऐसे व्यक्तियों के पास दृढ़ निश्चय होता है और वे परमेश्वर की ओर से नवीनतम प्रकाशन को प्राप्त करने के अधिक योग्य होते हैं; परिणामस्वरूप, इस प्रकार के लोग ही पवित्र आत्मा के द्वारा जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी सिद्ध किए जा सकते हैं।

प्रार्थना के द्वारा किस प्रभाव को प्राप्त किया जाता है?

लोग प्रार्थना के कार्य को करने और प्रार्थना के महत्व को समझने में सक्षम हैं, परंतु प्रार्थना के द्वारा प्राप्त किया जाने वाला प्रभाव कोई साधारण विषय नहीं है। प्रार्थना औपचारिकताओं से होकर जाने, या प्रक्रिया का अनुसरण करने, या परमेश्वर के वचनों का उच्चारण करने का विषय नहीं है, कहने का अर्थ यह है कि प्रार्थना का अर्थ शब्दों को रटना और दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर को देना आवश्यक है, जिसमें अपने हृदय में परमेश्वर के साथ वचनों को बांटा जाता है ताकि तुम परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किए जाओ। यदि तुम्हारी प्रार्थनाओं को प्रभावशाली होना है तो उन्हें तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचनों के पढ़े जाने पर आधारित होना आवश्यक है। परमेश्वर के वचनों के मध्य में प्रार्थना करने के द्वारा ही तुम और अधिक प्रकाशन और प्रज्ज्वलन को प्राप्त कर सकोगे। एक सच्ची प्रार्थना एक ऐसे हृदय को रखने के द्वारा ही दर्शाई जाती है जो परमेश्वर के द्वारा रखी माँगों की लालसा रखता है, और इन माँगों को पूरा करने की इच्छा रखने के द्वारा तुम उन सब बातों से घृणा कर पाओगे जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, उसी के आधार पर तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, और परमेश्वर के द्वारा स्पष्ट किए गए सत्यों को जानोगे और उनके विषय में स्पष्ट हो जाओगे। दृढ़ निश्चय, और विश्वास, और ज्ञान, और उस मार्ग को प्राप्त करना, जिसके द्वारा प्रार्थना के पश्चात् अभ्यास किया जाता है, ही सच्चाई के साथ प्रार्थना करना है, केवल ऐसी प्रार्थना ही प्रभावशाली हो सकती है। फिर भी प्रार्थना की रचना परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने और परमेश्वर के वचनों में उसके साथ वार्तालाप करने की बुनियाद पर होनी चाहिए, इससे तुम्हारा हृदय परमेश्वर को खोजने और परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण बनने में सक्षम होगा। ऐसी प्रार्थना परमेश्वर के साथ सच्‍चे वार्तालाप के बिंदु तक पहले ही पहुँच चुकी है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

सच्ची प्रार्थना में प्रवेश कैसे किया जाता है

प्रार्थना के दौरान तुम्हारा दिल, ईश्वर के समक्ष, होना चाहिए शांत, और तुम्हारा दिल होना चाहिए खरा। जब ईश्वर से प्रार्थना करो उससे करो वार्तालाप। न धोखा दो उसको उन वचनों से जो सिर्फ मीठी हों। परमेश्वर के समक्ष तुम्हारा दिल ख़ामोशी से रहेगा। और तुम्हारे लिए निर्धारित वातावरण में, तुम खुद को जानोगे और नफरत करोगे। तुम खुद से नफरत करोगे, खुद को त्यागोगे। ताकि तुम ईश्वर से सामान्य संबंध बना सको, और बन जाओ वो व्यक्ति जो दिल से परमेश्वर से प्रेम करे, परमेश्वर से प्रेम करे, बन जाओ वो व्यक्ति जो दिल से परमेश्वर से प्रेम करे।

प्रार्थना केंद्रित है उसपे जिसे आज ईश्वर करेगा ख़त्म मांगो अधिक से अधिक रौशनी, ईश्वर के समक्ष अपनी स्थिति और आफ़तों को लाओ और अपने संकल्प को उसे बताओ। परमेश्वर के समक्ष तुम्हारा दिल ख़ामोशी से रहेगा। और तुम्हारे लिए निर्धारित वातावरण में, तुम खुद को जानोगे और नफरत करोगे। तुम खुद से नफरत करोगे, खुद को त्यागोगे, ताकि तुम ईश्वर से सामान्य संबंध बना सको, और बन जाओ वो व्यक्ति जो दिल से परमेश्वर से प्रेम करे, परमेश्वर से प्रेम करे, बन जाओ वो व्यक्ति जो दिल से परमेश्वर से प्रेम करे।

प्रार्थना किसी प्रक्रिया को अनुसरण करना नहीं है पर सच्चाई से ईश्वर को खोजना है। प्रार्थना करो वो करे दिल की सुरक्षा। अपने दिल की सुरक्षा मांगो ईश्वर से। परमेश्वर के समक्ष तुम्हारा दिल ख़ामोशी से रहेगा। और तुम्हारे लिए निर्धारित वातावरण में, तुम खुद को जानोगे और नफरत करोगे। तुम खुद से नफरत करोगे, खुद को त्यागोगे, ताकि तुम ईश्वर से सामान्य संबंध बना सको, और बन जाओ वो व्यक्ति जो दिल से परमेश्वर से प्रेम करे, परमेश्वर से प्रेम करे, बन जाओ वो व्यक्ति जो दिल से परमेश्वर से प्रेम करे।

‘मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ’ से

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