परमेश्वर के दैनिक वचन | "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" | अंश 416

अपने प्रतिदिन के जीवन में तुम प्रार्थना पर बिलकुल ध्यान नहीं देते। लोगों ने प्रार्थना को सदैव नजरअंदाज किया है। प्रार्थनाएँ लापरवाही से की जाती थीं, जिसमें इंसान परमेश्वर के सामने बस खानापूर्ति करता था। किसी ने भी कभी परमेश्वर के समक्ष पूरी रीति से अपने हृदय को समर्पित नहीं किया है और न ही परमेश्वर से सच्चाई से प्रार्थना की है। लोग परमेश्वर से तभी प्रार्थना करते हैं जब उनके साथ कुछ घटित हो जाता है। इन सारे समयों के दौरान, क्या तुमने कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रार्थना की है? क्या तुमने कभी पीड़ा के आँसुओं को परमेश्वर के सामने बहाया है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के सामने स्वयं को पहचाना है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के साथ हृदय से हृदय मिलाते हुए प्रार्थना की है? प्रार्थना अभ्यास करने से आती है: यदि तुम सामान्य रीति से घर पर प्रार्थना नहीं करते हो, तब तुम्हारा कलीसिया में प्रार्थना करने का कोई अर्थ नहीं होगा, और यदि तुम छोटी-छोटी सभाओं में सामान्य रीति से प्रार्थना नहीं करते हो, तो बड़ी-बड़ी सभाओं में प्रार्थना करने में भी असमर्थ होगे। यदि तुम सामान्य रीति से परमेश्वर के निकट नहीं आते या परमेश्वर के वचनों पर मनन नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास तब कहने के लिए कुछ भी नहीं होगा जब प्रार्थना का समय होगा—और यदि तुम प्रार्थना करते भी हो, तो बस तुम दिखावा करोगे, तुम सच्चाई से प्रार्थना नहीं कर रहे होगे।

सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपने हृदय में शब्दों को कहना, और परमेश्वर की इच्छा को समझकर और उसके वचनों पर आधारित होकर परमेश्वर के साथ वार्तालाप करना; इसका अर्थ है विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करना, यह महसूस करना कि वह तुम्हारे सामने है, और कि तुम्हारे पास उससे कहने के लिए कुछ है; और इसका अर्थ है अपने हृदय में विशेष रूप से प्रज्ज्वलित या प्रसन्न होना, और यह महसूस करना कि परमेश्वर विशेष रूप से मनोहर है। तुम विशेष रूप से प्रेरणा से भरे हुए महसूस करोगे, और तुम्हारे शब्दों को सुनने के बाद तुम्हारे भाई और तुम्हारी बहनें आभारी महसूस करेंगे, वे महसूस करेंगे कि जो शब्द तुम बोलते हो वे उनके हृदय के भीतर के शब्द हैं, वे ऐसे शब्द हैं जो वे कहना चाहते हैं, और जो तुम कहते हो वह वही है जो वे कहना चाहते हैं। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का अर्थ यही है। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के बाद, अपने हृदय में तुम शांतिपूर्ण, और आभारी महसूस करोगे; परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य बढ़ जाएगी, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक योग्य और महत्वपूर्ण कुछ नहीं है—और यह सब प्रमाणित करेगा कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली रही हैं। क्या तुमने कभी इस तरह से प्रार्थना की है?

और प्रार्थना की विषय-वस्तु के बारे में क्या? तुम्हें अपनी सच्ची दशा के अनुसार चरण दर चरण प्रार्थना करनी चाहिए, और यह पवित्र आत्मा के द्वारा होनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और मनुष्य के लिए उसकी माँगों को पूरा करते हुए परमेश्वर के साथ वार्तालाप करनी चाहिए। जब तुम अपनी प्रार्थनाओं का अभ्यास करना आरंभ करते हो तो सबसे पहले अपना हृदय परमेश्वर को दो। परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास न करो; केवल परमेश्वर से अपने हृदय की बातों को कहने की कोशिश करो। जब तुम परमेश्वर के सामने आते हो तो इस प्रकार कहो: "हे परमेश्वर! केवल आज ही मैंने यह महसूस किया है कि मैं तेरी आज्ञा का उल्लंघन किया करता था। मैं पूरी तरह से भ्रष्ट और घृणित हूँ। पहले मैं अपने समय को बर्बाद कर रहा था; आज से मैं तेरे लिए जीऊँगा। मैं अर्थपूर्ण जीवन जीऊँगा, और तेरी इच्छा को पूरी करूँगा। मैं जानता हूँ कि तेरा आत्मा सदैव मेरे भीतर कार्य करता है, और सदैव मुझे प्रज्ज्वलित और प्रकाशित करता है, ताकि मैं तेरे समक्ष प्रभावशाली और मजबूत गवाही दे सकूँ, जिससे मैं हमारे भीतर शैतान को तेरी महिमा, तेरी गवाही और तेरी विजय दिखाऊँ।" जब तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारा हृदय पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाएगा, इस प्रकार से प्रार्थना कर लेने के बाद तुम्हारा हृदय परमेश्वर के निकट होगा, और इस प्रकार से अक्सर प्रार्थना करने के द्वारा पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर अवश्य कार्य करेगा। यदि तुम इस तरह से सदैव परमेश्वर को पुकारोगे और परमेश्वर के समक्ष अपने दृढ़ निश्चय को रखोगे तो ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारा दृढ़ निश्चय परमेश्वर के सामने स्वीकार हो सकता है, जब तुम्हारा हृदय और संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर के द्वारा स्वीकार कर लिया जाएगा, तब तुम अंततः परमेश्वर के द्वारा सिद्ध कर दिए जाओगे। प्रार्थना तुम लोगों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तुम पवित्र आत्मा के कार्य को ग्रहण करते हो, इस प्रकार तुम्हारा हृदय परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किया जाता है, और तुम्हारे भीतर परमेश्वर से किए जाने वाले प्रेम का सामर्थ्य सामने आ जाता है। यदि तुम अपने हृदय से प्रार्थना नहीं करते, यदि तुम परमेश्वर से वार्तालाप करने के लिए अपने हृदय को नहीं खोलते, तब परमेश्वर के पास तुम्हारे हृदय में कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। यदि तुमने प्रार्थना करते हुए अपने हृदय के सभी शब्दों को बोल दिया है और पवित्र आत्मा ने कार्य नहीं किया है, यदि तुम अपने भीतर प्रेरित महसूस नहीं करते, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा हृदय गंभीर नहीं है, कि तुम्हारे शब्द सच्चे नहीं हैं, और अभी भी अशुद्ध हैं। यदि प्रार्थना करते हुए तुम आभारी होते हो, तब तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के द्वारा स्वीकार की जा चुकी हैं और परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर चुका है। परमेश्वर के समक्ष सेवा करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम प्रार्थनाओं के बिना नहीं रह सकते। यदि तुम परमेश्वर के साथ संगति को सचमुच अर्थपूर्ण और महत्वपूर्ण रूप में देखते हो, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? परमेश्वर के साथ वार्तालाप करने के बिना कोई नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में रहते हो, तुम शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना, तुम अंधकार के प्रभाव तले रहते हो। मैं आशा करता हूँ कि सभी भाई-बहन प्रत्येक दिन सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के योग्य हैं। यह किसी धर्मसिद्धांत का पालन करना नहीं है, परंतु एक ऐसा प्रभाव है जिसे पूरा किया जाना चाहिए। क्या तुम थोड़ी सी नींद और आनंद को त्यागने के लिए तैयार हो, भोर को ही सुबह की प्रार्थना करने और फिर परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के द्वारा? यदि तुम शुद्ध मन से प्रार्थना करते हो और इस तरह से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो तो तुम परमेश्वर के द्वारा और अधिक स्वीकार किए जाओगे। यदि तुम इसे हर सुबह ऐसा करते हो, यदि हर दिन तुम अपने हृदय को परमेश्वर को देने का अभ्यास करते हो और परमेश्वर के साथ वार्तालाप करते हो, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान निश्चित रूप से बढ़ जाएगा, और परमेश्वर की इच्छा को बेहतर रीति से समझ पाओगे। तुम्हें कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं अपने कर्तव्‍य को पूरा करना चाहता हूँ। इसलिए कि तू हम में महिमा को प्राप्त करे, और हम में, लोगों के इस समूह में गवाही का आनंद ले, मैं बस यह कर सकता हूँ कि अपने संपूर्ण अस्तित्व को तेरे प्रति भक्तिमय रूप में समर्पित कर दूँ। मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू हम में कार्य कर, ताकि मैं सच्चाई के साथ तुझसे प्रेम कर सकूँ और तुझे संतुष्ट कर सकूँ, और तुझे वह लक्ष्य बना सकूँ जिसको मैं पाना चाहता हूँ।" जब तुम में यह बोझ होगा, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें सिद्ध बनाएगा; तुम्हें केवल अपने लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए भी, और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए भी। ऐसी प्रार्थना सबसे सच्ची प्रार्थना होती है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हो?

पहले तुम लोग नहीं जानते थे कि प्रार्थना कैसे करें, और तुमने प्रार्थना को नजरअंदाज कर दिया था, तुम लोगों को स्वयं को प्रार्थना में प्रशिक्षित करने के लिए अपना सर्वोत्तम करना आवश्यक है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने में अपने आंतरिक बल को बाहर नहीं निकाल सकते, तो तुम प्रार्थना कैसे कर सकते हो? तुम्हें कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मेरा हृदय तुझसे सच्चाई के साथ प्रेम करने में असमर्थ है, मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ परंतु मुझ में बल की कमी है। मुझे क्या करना चाहिए? मैं चाहता हूँ कि तू मेरी आत्मा की आँखें खोल दे, मैं चाहता हूँ कि तेरा आत्मा मेरे हृदय को स्पर्श करे, ताकि मैं तेरे समक्ष सारी निष्क्रिय अवस्थाओं से रहित हो जाऊँ, और किसी भी व्यक्ति, विषय, या वस्तु के अधीन न रहूँ; मैं अपने हृदय को तेरे समक्ष पूरी तरह से खोल कर रख देता हूँ, इस प्रकार से कि मेरा पूरा अस्तित्व तेरे समक्ष समर्पित हो जाए, और तू मुझे वैसे ही परख सके जैसे तू चाहता है। अब मैं भावी संभावनाओं को कोई विचार नहीं देता, और न ही मृत्यु के बंधन में हूँ। मेरे उस हृदय का प्रयोग करते हुए जो तुझसे प्रेम करता है, मैं जीवन के मार्ग को खोजना चाहता हूँ। सारी बातें और घटनाएँ तेरे हाथों में हैं, मेरी नियति तेरे हाथों में है, और इससे बढ़कर, मेरा जीवन तेरे हाथों के नियंत्रण में है। अब मैं तुम्हारे प्रेम का अनुसरण करता हूँ, और इस बात की परवाह न करते हुए कि क्या तू मुझे अपने से प्रेम करने देगा, इस बात की परवाह न करते हुए कि शैतान कैसे हस्तक्षेप करेगा, मैं तुझसे प्रेम करने के प्रति दृढ़ हूँ।" जब तुम ऐसी बातों का सामना करते हो, तो तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो। यदि तुम प्रतिदिन ऐसा करते हो, तो परमेश्वर से प्रेम करने का बल धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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