परमेश्वर के दैनिक वचन : जीवन में प्रवेश | अंश 402

जीवन की खोज करते हुये कोई सफल होने के लिये जल्दबाजी नहीं कर सकता, जीवन में उन्नति या विकास एक या दो दिन में नहीं आता। परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यवहारिक है, और इसे एक आवश्यक प्रक्रिया से गुजरना होगा। यीशु के देहधारण करने के बाद क्रूस पर अपने कार्य को समाप्त करने में यीशु को 33.5 वर्ष लगे, मनुष्य के जीवन की तो बात ही न करो। एक सामान्य व्यक्ति के लिये परमेश्वर को प्रकट करना आसान काम नहीं है। और यह विशेष रूप से बड़े लाल अजगर के देशवासियों के लिये और भी कठिन है। उनकी क्षमता कम है, और उन्हें लंबे समय तक परमेश्वर के वचन और कार्य की आवश्यकता है। इसलिये परिणाम पाने के लिये जल्दबाजी न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिये तुम्हें पहले से ही सक्रिय होना होगा और परमेश्वर के वचनों पर अधिक से अधिक परिश्रम करना होगा। उसके वचनों को पढ़ने के बाद, तुम्हें इस योग्य हो जाना चाहिये कि तुम वास्तव में उन पर अमल करो, और परमेश्वर के वचनों में तब तुम्हें ज्ञान, अंर्तदृष्टि, परख और बुद्धि प्राप्त होगी। और इनके द्वारा तुम समझ भी नहीं पाओगे परंतु तुम बदलते जाओगे। यदि परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, उसके वचनों को पढ़ने को तुम सिद्धांत बना लो, उसे जानने लगो, अनुभव करने लगो, अमल में लाने लगो, तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम उन्नति करने लगोगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद भी उस पर अमल नहीं कर पाते! तुम किस जल्दबाजी में हो? जब तुम एक निश्चित कद तक पहुंच जाते हो, तुम परमेश्वर के वचन पर अमल करने योग्य बन जाओगे। क्या चार या पांच वर्ष का बालक कहेगा कि वह अपने माता-पिता का सहयोग या आदर करने में असमर्थ है? तुम्हें अब जान लेना चाहिये कि तुम्हारा कद कितना है, तुम जिन पर अमल कर सकते हो, अमल करो, और परमेश्वर के प्रबंधन को बिगाड़ने वाले न बनो। सरल रूप में कहें तो केवल परमेश्वर के वचनों को खाओ-पीओ और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना सिद्धांत बना लो। इस बारे में चिन्ता न करो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कर सकता है या नहीं। अभी इस विषय में सोच-विचार न करो। केवल परमेश्वर के वचनों का खान-पान करो, जब वह तुम्हारे सामने आता है, और यह बात निश्चित है कि परमेश्वर तुम्हें अवश्य पूरा करेगा। हालांकि, परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का एक नियम है। आंखें मूंद करके यह न करो। बल्कि उन शब्दों को खोजो, जिन्हें तुम्हें जानना चाहिये। अर्थात वे जिनका संबंध दर्शन से है। दूसरा एक पहलू जिसे खोजना चाहिये, वह है उन वचनों पर वास्तव में अमल करना, अर्थात वे बातें जिन में तुम्हें प्रवेश करना है, और करना चाहिये। एक पहलू ज्ञान का है और दूसरा उसमें प्रवेश करने का है। जब तुम इन दोनों को पा लेते हो, अर्थात जब तुम समझ लेते हो कि तुम्हें क्या जानना चाहिये और किस बात पर अमल करना चाहिए, तब तुम सीख लेते हो कि परमेश्वर के वचन से कैसे खाया और पिया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

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