परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" | अंश 394

परमेश्वर में विश्वास करने का मनुष्य का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसका विश्वास सिर्फ़ वचनों में है, और परमेश्वर उसके व्यावहारिक जीवन में कहीं भी विद्यमान नहीं है। वास्तव में, सभी मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा नहीं है। परमेश्वर के लिए कई प्रार्थनाएँ मनुष्य के मुख से तो आती हैं, किन्तु परमेश्वर के लिए उसके हृदय में बहुत थोड़ी सी ही जगह है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य की परीक्षा लेता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और अपने आप को परीक्षाओं में जान ले। अन्यथा, सभी मनुष्य प्रधान दूत के बच्चे बन जाएँगे, और उत्तरोत्तर भ्रष्ट बन जाएँगे। परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास के दौरान, कई व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ दिए जाते हैं जैसे-जैसे वह लगातार परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किया जाता है। अन्यथा, कोई भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है, और मनुष्य में उस कार्य को करने का परमेश्वर के पास कोई रास्ता नहीं है जो उसे करना चाहिए। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। सिर्फ़ इसके बाद ही परमेश्वर मनुष्य में अपना जीवन कार्य कर सकता है, और सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कह सकता है। जैसे कि परमेश्वर इसे देखता है, यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम सिर्फ़ अपने स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो परन्तु सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते हो, तो तब भी यह प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके उसे जान लेना; यह अंतिम लक्ष्य है और जिसे मनुष्य को खोजना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास समर्पित अवश्य करने चाहिए ताकि वे तुम्हारे अभ्यास में महसूस किए जा सकें। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। तब यदि तुम सिर्फ़ इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा। इस रास्ते पर, कई मनुष्य ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, लेकिन उनकी मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं, और अपना जीवनकाल नष्ट करने और बुढ़ापे तक व्यर्थ जीने के लिए वे स्वयं से घृणा करते हैं। उनके पास सिर्फ़ समझ थी लेकिन परमेश्वर की महिमा करने के लिए अवसर नहीं था। उन्होंने अपना पूरा जीवन लड़ाई करते और इधर-उधर घूमते-फिरते बिता दिया, मगर उनकी मृत्यु के समय, उनके हृदय में पश्चाताप होता है। सिर्फ़ अपने मरने के समय कई अपने होश में आते हैं और जीवन के अर्थ का अहसास करते हैं। क्या उस समय बहुत देर नहीं हो जाती है? क्यों फिर तुम वर्तमान समय का लाभ नहीं उठाते हो और उस सत्य की खोज नहीं करते हो जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों करते हो? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अपने मरने के समय में पछतावा महसूस करना चाहते हो? यदि ऐसा है तो, फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जिन में मनुष्य, यदि वह सिर्फ़ हल्का सा प्रयास समर्पित करता है, तो सत्य को अभ्यास में ला सकता है और उसके द्वारा परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर सकता है। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर यात्रा करता रहता है, और अंत में उसे कुछ भी लाभ नहीं मिलता है। यही कारण है कि मनुष्य के पास निरंतर समस्या और पीड़ा है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कार्यवाही करनी चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ; इसका क्या अर्थ है? अपनी देह के वास्ते जी कर और प्रसिद्धि और भाग्य के लिए मेहनत करके तुम क्या प्राप्त कर सकते हो?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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