परमेश्वर के दैनिक वचन | "आरंभ में मसीह के कथन : अध्याय 22" | अंश 385

कलीसिया के निर्माण का समय शैतान के उन्माद की उच्चतम स्थिति पर पहुँचने का समय भी होता है। कुछ लोगों के माध्यम से शैतान अकसर परेशानियाँ और बाधाएँ उत्पन्न करता है और जो लोग आत्मा को नहीं जानते या जो नए विश्वासी होते हैं, वे ही शैतान की भूमिका को आसानी से निभा सकते हैं। अकसर चूँकि लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं समझते, इसलिए वे मनमाने ढंग से, पूरी तरह से अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार, काम करने के अपने तरीकों से और अपनी धारणाओं के मुताबिक कार्य करते हैं। अपनी ज़बान सँभालो—यह तुम्हारी अपनी सुरक्षा के लिए है। सुनो और अच्छी तरह से पालन करो। कलीसिया समाज से अलग है। तुम्हारे मन में जो भी आए, या जो भी तुम चाहो, वह तुम नहीं कह सकते। यह यहाँ नहीं चलेगा, क्योंकि यह परमेश्वर का घर है। परमेश्वर लोगों के काम करने के तरीक़े को स्वीकार नहीं करता। तुम्हें आत्मा का अनुसरण करते हुए काम करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीना चाहिए, फिर दूसरे लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। पहले तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा करके सभी कठिनाइयों को अपने भीतर हल करना होगा। अपने पतित स्वभाव को खत्म करो और अपनी स्थिति को वास्तव में समझने में सक्षम बनो और यह जानो कि तुम्हें कैसे काम करना चाहिए; जो कुछ भी तुम्हें समझ में न आए, उस पर सहभागिता करते रहो। व्यक्ति का खुद को न जानना अस्वीकार्य है। पहले अपनी बीमारी ठीक करो, और मेरे वचनों को खाने और पीने और उन पर चिंतन के द्वारा, अपना जीवन मेरे वचनों के अनुसार जीओ और अपने कर्म उनके अनुसार करो; चाहे तुम घर पर हो या किसी अन्य जगह पर, तुम्हें परमेश्वर को अपने भीतर शक्ति बरतने की अनुमति देनी चाहिए। शरीर और स्वाभाविकता को त्याग दो। अपने भीतर हमेशा परमेश्वर के वचनों का प्रभुत्व बना रहने दो। यह चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं कि तुम्हारा जीवन बदल नहीं रहा; समय के साथ, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे स्वभाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। पहले तुम चर्चा में रहने के लिए उतावले रहते थे, किसी की आज्ञा नहीं मानते थे या महत्वाकांक्षी, आत्मतुष्ट या दंभी थे—पर तुम धीरे-धीरे इन चीज़ों से छुटकारा पा लोगे। यदि तुम उन्हें अभी छोड़ना चाहते हो, तो यह संभव नहीं है! क्योंकि तुम्हारा पुराना अहं दूसरों को इसे छूने की अनुमति नहीं देगा, इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं। अत: तुम्हें व्यक्तिपरक प्रयास करने होंगे, सकारात्मक और सक्रिय रूप से पवित्र आत्मा के कार्य का अनुपालन करना होगा, परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए अपनी इच्छा-शक्ति का उपयोग करना होगा, और मेरे वचनों को अभ्यास में लाने के लिए तैयार रहना होगा। यदि तुम पाप करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें अनुशासित करेंगे। जब तुम वापस लौटते हो और समझने पर आते हो, तो तुम्हारे भीतर तुरंत सब-कुछ अच्छा हो जाएगा। यदि तुम पक्षपातपूर्ण ढंग से बोलते हो, तो तुम्हें तुरंत भीतर से अनुशासित किया जाएगा। तुम देखते हो कि परमेश्वर इस तरह की चीज़ों में कोई आनंद नहीं लेता, इसलिए यदि तुम तुरंत रुक जाते हो, तो तुम्हें आंतरिक शांति का अनुभव होगा। कुछ नए विश्वासी ऐसे हैं, जो नहीं समझ पाते कि जीवन की भावनाएँ क्या हैं या उन भावनाओं के भीतर कैसे जीना है। कभी-कभी तुम आश्चर्य करते हो कि यद्यपि तुमने कुछ भी नहीं कहा, फिर भी तुम भीतर से इतना बेचैन क्यों महसूस करते हो? ऐसे समय तुम्हारे विचार और तुम्हारा मन ग़लत होते हैं। कभी-कभी तुम्हारे पास अपने स्वयं के विकल्प होते हैं, तुम्हारी अपनी धारणाएँ और मत होते हैं; कभी-कभी तुम दूसरों को अपने से कम समझते हो; कभी-कभी तुम अपनी खुद की स्वार्थपूर्ण गणनाएँ कर लेते हो और प्रार्थना या आत्मावलोकन नहीं करते। इसी कारण तुम अपने भीतर अस्थिर महसूस करते हो। शायद तुम जानते हो कि समस्या क्या है, इसलिए सीधे अपने दिल में परमेश्वर का नाम पुकारो, परमेश्वर के समीप आ जाओ, और तुम फिर से स्वस्थ हो जाओगे। जब तुम्हारा दिल बहुत घबराया हुआ और बेचैन होता है, तो तुम्हें यह बिलकुल नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हें बोलने की अनुमति दे रहा है। नए विश्वासियों को विशेष रूप से इस संबंध में परमेश्वर की आज्ञा मानने पर अच्छी तरह से ध्यान देना चाहिए। परमेश्वर जिन भावनाओं को मनुष्य के अंदर रखता है, वे शांति, खुशी, स्पष्टता और निश्चितता हैं। अकसर ऐसे लोग होते हैं, जो समझ नहीं पाते, जो गड़बड़ी करेंगे और मनमाने ढंग से कार्य करेंगे—ये सभी रुकावटें हैं, इस पर ध्यान दो। यदि तुम इस स्थिति के प्रति प्रवण हो, तो इसे रोकने के लिए तुम्हें कुछ "निवारक दवा" लेनी चाहिए, अन्यथा तुम अवरोध पैदा करोगे और परमेश्वर तुम पर प्रहार करेगा। आत्मतुष्ट मत बनो; अपनी कमियों को दूर करने के लिए दूसरों की ताकत लो, और देखो कि दूसरे परमेश्वर के वचनों से कैसे जीते हैं; और देखो कि उनके जीवन, कार्य और बातचीत अनुकरणीय हैं या नहीं। यदि तुम दूसरों को अपने से कम मानते हो, तो तुम आत्मतुष्ट और दंभी हो और किसी के लिए भी लाभदायक नहीं हो। अब महत्वपूर्ण है जीवन पर ध्यान केंद्रित करना, मेरे वचनों को अधिक खाना-पीना, मेरे वचनों का अनुभव करना, मेरे वचनों को जानना, मेरे वचनों को वास्तव में अपना जीवन बनाना—ये मुख्य बातें हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर के वचनों से नहीं जी सकता, क्या उसका जीवन परिपक्व हो सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता। तुम्हें हर समय मेरे वचनों से जीना चाहिए और मेरे वचनों को जीवन की आचार-संहिता बनाना चाहिए, इससे तुम महसूस करोगे कि उस आचार-संहिता से काम करने से परमेश्वर आनंदित होता है, और अन्य तरीके से काम करने से परमेश्वर नफ़रत करता है; और धीरे-धीरे तुम सही मार्ग पर चलने लगोगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि क्या है, जो परमेश्वर से आता है और क्या है, जो शैतान से आता है। जो परमेश्वर से आता है, वह तुम्हें पहले से अधिक स्पष्टता-युक्त दूरदृष्टि देता है और ईश्वर के पहले से अधिक निकट लाता है; तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ सच्चा प्यार साझा करते हो, तुम परमेश्वर के दायित्व-भार के प्रति विचारशीलता दिखाने में सक्षम होते हो, और तुम्हारा दिल परमेश्वर-प्रेमी हो जाता है, जो कभी घटता नहीं है। चलने के लिए तुम्हारे सामने एक मार्ग होता है। जो शैतान से आता है, वह तुम्हारी दूरदृष्टि खोने का कारण बनता है, और जो कुछ तुम्हारे पास पहले होता है, वह सब चला जाता है; तुम परमेश्वर से विमुख हो जाते हो, भाइयों और बहनों के लिए तुम्हारे पास कोई प्यार नहीं होता, और तुम्हारा दिल घृणा से भर जाता है। तुम बेताब हो जाते हो, तुम अब कलीसियाई जीवन नहीं जीना नहीं चाहते, और तुम्हारा दिल अब परमेश्वर-प्रेमी नहीं रहता। यह शैतान का काम है, और दुष्ट आत्माओं द्वारा किए गए काम का परिणाम भी है।

अब यह एक निर्णायक क्षण है। तुम्हें अंतिम पाली तक अपने पद पर तैनात रहना होगा, अच्छे और बुरे में भेद करने के लिए अपनी आत्मा की आँखों को साफ़ करना होगा, और कलीसिया के निर्माण में अपना समस्त प्रयास लगाना होगा। शैतान के अनुचरों, धार्मिक गड़बड़ियों और बुरी आत्माओं के काम को दूर हटाओ। कलीसिया को शुद्ध करो, मेरी इच्छा अबाध रूप से पूरी होने दो, और सच में, आपदाओं के पूर्व के इस बहुत छोटे-से समय में मैं तुम सबको यथाशीघ्र पूर्ण कर दूँगा, और तुम्हें महिमा में ले आऊँगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अपने स्वभाव को बदलने के लिए ईश्वर के वचनों के सहारे जियो

ईश्वर पर निर्भर रहकर अपनी सारी मुश्किलों को पहले दूर करो, अपने पतित स्वभावों का अंत करो, और अपने हालात को वास्तव में समझो।

तुम्हें क्या करना चाहिए जानो, जो न समझो उस पर संवाद करो। तुम्हारा खुद को न जानना अस्वीकार्य है। पहले अपना रोग दूर करो, ईश्वर के वचन पढ़ो, ईश-वचनों पर चिंतन करो, उनके अनुसार जियो, आचरण करो। घर में हो या बाहर, ईश्वर को अपने अंतर में शासन करने दो, ईश-वचनों का सदा प्रभुत्व रहने दो, देह-सुख और स्वाभाविकता का त्याग करो, अपना स्वभाव बदलने के लिए ईश-वचनों के सहारे जियो।

अब कुंजी है जीवन पर ध्यान देना, ईश-वचनों को ज़्यादा खाना-पीना, ईश-वचनों का अनुभव करना, उन्हें जानना, उसके वचनों को सचमुच अपना जीवन बनाना। घर में हो या बाहर, ईश्वर को अपने अंतर में शासन करने दो, ईश-वचनों का सदा प्रभुत्व रहने दो, देह-सुख और स्वाभाविकता का त्याग करो, अपना स्वभाव बदलने के लिए ईश-वचनों के सहारे जियो।

कैसे जीवन किसी का परिपक्व हो अगर ईश वचनों के सहारे न जिया वो? हर समय ईश-वचनों के सहारे जियो, ईश-वचन हों आचार-संहिता तुम्हारी, ताकि जानो ईश्वर को खुश करने का सही तरीका, घृणा करता ईश्वर जब काम करते दूसरे तरीके से तुम। घर में हो या बाहर, ईश्वर को अपने अंतर में शासन करने दो, ईश-वचनों का सदा प्रभुत्व रहने दो, देह-सुख और स्वाभाविकता का त्याग करो, अपना स्वभाव बदलने के लिए ईश-वचनों के सहारे जियो। चिंता न करो कि बदल नहीं रहा जीवन तुम्हारा। चिंता न करो कि बदल नहीं रहा जीवन तुम्हारा। आ जाओगे तुम सही राह पर, आ जाओगे तुम सही राह पर, अपने स्वभाव में बदलाव महसूस करोगे तुम।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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