परमेश्वर के दैनिक वचन | "आरंभ में मसीह के कथन : नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (9)" | अंश 385

सृजित प्राणी का अपने सृष्टिकर्ता के प्रति जो एकमात्र दृष्टिकोण होना चाहिए, वह है आज्ञाकारिता, ऐसी आज्ञाकारिता जो बेशर्त हो। यह ऐसी चीज़ है, जिसे आज कुछ लोग स्वीकार करने में असमर्थ हो सकते हैं। वे कहते हैं, "यह बेशर्त कैसे हो सकती है? परमेश्वर के वचनों को हमेशा तर्कसंगत होना चाहिए और परमेश्वर के पास हमेशा चीज़ों को करने का कारण तो होना ही चाहिए। परमेश्वर को हमेशा लोगों को जीने का मार्ग देना चाहिए, उसे हमेशा उचित और निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए, वह मानवीय भावनाओं को अनदेखा नहीं कर सकता।" यदि तुम ऐसी बातें कह सकते हो, और तुम वास्तव में इस तरह सोचते हो, तो फिर तुम परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाने से बहुत दूर हो। हालाँकि मनुष्य को परमेश्वर के वचन द्वारा पोषण और सिंचन प्रदान किया जाता है, फिर भी मनुष्य वास्तव में एक ही चीज़ की तैयारी कर रहा है। क्या हो सकती है वह चीज़? वह अंततः परमेश्वर के प्रति बेशर्त, पूर्ण समर्पण करने में सक्षम होना है, जिस बिंदु पर तुम, एक सृजित प्राणी, आवश्यक मानक तक पहुँच गए होगे। कभी-कभी परमेश्वर जानबूझकर ऐसे कार्य करता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाते, जो तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ जाता है, या जो सिद्धांतों तक के ख़िलाफ़ जाता प्रतीत होता है, या इंसानी भावनाओं, इंसानियत या संवेदनाओं के ख़िलाफ़ जाता है, और जिसे तुम स्वीकार नहीं कर पाते या समझ नहीं पाते। इसे तुम किसी भी तरीके से देखो, यह सही नहीं लगता, तुम इसे बिलकुल स्वीकार नहीं कर पाते, और तुम्हें लगता है कि उसने जो किया है, वह बिलकुल अनुचित है। तो इन कामों को करने में परमेश्वर का क्या उद्देश्य है? यह तुम्हें परखने के लिए है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह कैसे और क्यों करता है, तुम्हें इसकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है; तुम्हें बस इतना ही करना है कि अपना यह विश्वास बनाए रखो कि वह सत्य है, और यह पहचानो कि वह तुम्हारा सृजनकर्ता है, तुम्हारा परमेश्वर है। यह सारे सत्यों से ऊँचा है, सारे सांसारिक ज्ञान से ऊँचा है, मनुष्य की तथाकथित नैतिकता, नीति, ज्ञान, शिक्षा, दर्शन या पारंपरिक संस्कृति से ऊँचा है, यहाँ तक कि यह लोगों के बीच स्नेह, मैत्री या तथाकथित प्रेम से भी ऊँचा है—यह अन्य किसी भी चीज़ से ऊँचा है। यदि तुम इसे न समझ पाओ, तो देर-सबेर, तुम्हारे साथ कुछ होने पर, अंतत: पश्चात्ताप करने और परमेश्वर की मनोहरता महसूस करने से पहले और परमेश्वर द्वारा तुम पर किए जाने वाले कार्य का अर्थ समझने से पहले, तुम परमेश्वर से विद्रोह करके भटक सकते हो, या इससे भी बदतर, तुम इसके कारण लड़खड़ाकर गिर सकते हो। ... भले ही लोगों ने परमेश्वर पर कितने ही समय तक विश्वास किया हो, वे कितनी भी दूर तक साथ चले हों, उन्होंने कितना भी काम किया हो और कितने भी कर्तव्य निभाए हों, यह सारा समय उन्हें एक ही चीज़ के लिए तैयार करता रहा है : तुम अंततः परमेश्वर के प्रति बेशर्त और पूर्ण समर्पण करने में सक्षम हो जाओ। तो "बेशर्त" का क्या मतलब है? इसका मतलब है, अपने व्यक्तिगत कारणों को नज़रअंदाज़ करना, अपने व्यक्तिपरक तर्कों को नज़रअंदाज़ करना, और किसी भी चीज़ पर कहा-सुनी नहीं करना : तुम एक सृजित प्राणी हो, और तुम योग्य नहीं हो। जब तुम परमेश्वर से कहा-सुनी करते हो, तो तुम गलत स्थिति में होते हो; जब तुम परमेश्वर के सामने अपने को सही ठहराने का प्रयास करते हो, तो एक बार फिर तुम गलत स्थिति में होते हो; जब तुम परमेश्वर के साथ बहस करते हो, जब तुम यह पता लगाने के लिए कि वास्तव में क्या हो रहा है, कारण जानना चाहते हो, यदि तुम पहले समझे बिना आज्ञापालन नहीं कर सकते, और सब-कुछ स्पष्ट हो जाने के बाद ही समर्पण करोगे, तो तुम एक बार फिर गलत स्थिति में हो। जब तुम जिस स्थिति में हो, वह गलत है, तो क्या परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता पूर्ण है? तुम परमेश्वर की दृष्टि में एक सृजित प्राणी हो या नहीं? क्या तुम परमेश्वर के साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हो जैसा कि किया जाना चाहिए? पूरी सृष्टि के प्रभु की तरह? नहीं, तुम वैसा व्यवहार नहीं कर रहे, जिसके कारण परमेश्वर तुम्हें नहीं पहचानता। परमेश्वर के प्रति बेशर्त और पूर्ण समर्पण हासिल करने के लिए कौन-सी चीज़ें तुम्हें सक्षम बना सकती हैं? उसका अनुभव कैसे किया जा सकता है? एक ओर, थोड़े विवेक और सामान्य मानवता की समझ की आवश्यकता है; दूसरी ओर, अपने कर्तव्य पूरे करते हुए तुम्हें सत्य के प्रत्येक पहलू को समझना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सको। कभी-कभी मनुष्य की क्षमता कम पड़ जाती है और उसके पास सभी सत्यों को समझने की ताकत या ऊर्जा नहीं होती। लेकिन एक चीज़ है : परिवेश, लोगों, घटनाओं और उन चीज़ों के बावजूद, जो तुम पर आती हैं और जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, तुम्हें हमेशा एक आज्ञाकारी रवैया रखना चाहिए। कारण न पूछना—तुम्हारा रवैया ऐसा होना चाहिए। अगर यह रवैया भी तुम्हारी समझ से परे है, और तुम्हारे मन में हमेशा ऐसी बातें होती हैं कि "मुझे सोचना होगा कि परमेश्वर जो कर रहा है, वह वास्तव में धार्मिक है या नहीं? वे कहते हैं कि परमेश्वर प्रेम है, तो चलो देखते हैं कि वह जो मेरे साथ कर रहा है, उसमें प्रेम है या नहीं, और क्या यह वास्तव में प्रेम ही है?" यदि तुम हमेशा इस बात की जाँच करते हो कि परमेश्वर जो कर रहा है, उसमें वह सभी मानक पूरे करता है या नहीं, यह देखते हो कि परमेश्वर वही कर रहा है या नहीं जो तुम्हें पसंद है, यहाँ तक कि वह उसका अनुपालन करता है या नहीं जिसे तुम सत्य मानते हो, तो तुम्हारी स्थिति गलत है, और इससे तुम्हें परेशानी होगी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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