परमेश्वर के दैनिक वचन | "बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर" | अंश 381

अधिकांश लोग परमेश्वर पर अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष ज़ोर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में कुछ निश्चित परिवर्तन आते हैं। परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करने के बाद वे दूसरों के साथ वाद-विवाद करना, लोगों को अपमानित करना और उनके साथ लड़ना-झगड़ना, धूम्रपान और मद्यपान करना, कोई भी सार्वजनिक संपत्ति—चाहे वह एक कील या लकड़ी का तख्ता ही क्यों न हो—चुराना बंद कर देते हैं, और वे इस सीमा तक जाते हैं कि जब भी उन्हें नुकसान उठाने पड़ते हैं या उनके साथ गलत बर्ताव किया जाता है, वे उसे अदालतों में नहीं ले जाते। निस्संदेह, उनके व्यवहार में कुछ परिवर्तन ज़रूर आते हैं। चूँकि, एक बार परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, सच्चा मार्ग स्वीकार करना लोगों को विशेष रूप से अच्छा महसूस करवाता है, और चूँकि अब उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य के अनुग्रह का स्वाद भी चख लिया है, वे विशेष रूप से उत्साहित हैं, और यहाँ तक कि कुछ भी ऐसा नहीं होता है जिसका वे त्याग नहीं कर सकते या जिसे वे सहन नहीं कर सकते। लेकिन फिर भी तीन, पांच, दस या तीस साल तक विश्वास करने के बाद, जीवन-स्वभावों में कोई परिवर्तन न होने के कारण, वे पुराने तौर-तरीके फिर से अपना लेते हैं; उनका अहंकार और घमंड बढ़कर और अधिक मुखर हो जाता है, वे सत्ता और मुनाफे के लिए होड़ करना शुरू कर देते हैं, वे कलीसिया के धन के लिए ललचाते हैं, वे स्वयं अपने हितसाधन के लिए कुछ भी करते हैं, वे रुतबे और सुख-सुविधाओं के लिए लालायित रहते हैं, और वे परमेश्वर के घर के परजीवी बन गए हैं। खासकर अगुआओं के रूप में सेवा करने वाले अधिकांश व्यक्तियों को लोगों द्वारा त्याग दिया जाता है। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? महज व्यवाहारिक बदलाव देर तक नहीं टिकते हैं; अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनके पतित पक्ष स्वयं को दिखाएंगे। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है। पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य का साथ पाकर, उनके लिए उत्साही बनना या अस्थायी दयालुता दिखाना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है; मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ होते हैं। एक व्यक्ति का व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उसका जीवन है, उसका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है वही जीवन का, साथ ही व्यक्ति की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को रूपांतरित करना, उन्हें नए लोगों के रूप में पुनर्जीवित करना है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के वास्ते हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और धर्मनिष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य ढंग से उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं, उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यवहारात्मक परिवर्तन क्षणिक भ्रम के अलावा कुछ नहीं हैं; वे जोशो-ख़रोश का प्रस्फुटन हैं। उन्हें जीवन की अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता है।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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