परमेश्वर के दैनिक वचन | "क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?" | अंश 377

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और उसमें निहित हर चीज़ का प्रतिनिधित्व करता है। यदि तुम कहते हो कि थोड़े-से अनुभवों के होने का मतलब सत्य का होना है, तो क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? तुम्हारे पास कुछ अनुभव हो सकता है, सत्य के किसी निश्चित पहलू या उसके किसी एक पक्ष से संबंधित प्रकाश हो सकता है, लेकिन तुम दूसरों को हमेशा के लिए इसकी आपूर्ति नहीं कर सकते, इसलिए यह जो प्रकाश तुमने प्राप्त किया है, सत्य नहीं है; यह केवल एक मुकाम है जिस तक लोग पहुँच सकते हैं। यह महज़ उचित अनुभव और उचित समझ है, कुछ वास्तविक अनुभव और सत्य का ज्ञान है, जो इंसान में होना चाहिए। यह रोशनी, प्रबोधन और अनुभवजन्य समझ सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकते; अगर सभी लोग इस सत्य का अनुभव कर भी लेते और अपनी समस्त अनुभवजन्य समझ को एक साथ जोड़ लेते, तो भी वे उस एक सत्य के बराबर नहीं हो सकते थे। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, "मैं मानव जगत के लिए इस बात को एक कहावत के साथ पूरा करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं जो मुझे प्रेम करता है।" यह सच्चा बयान है; यह जीवन का सच्चा सार है। सभी बातों में यह सबसे गहन है; यह परमेश्वर स्वयं की अभिव्यक्ति है। तुम इसे अनुभव करते रह सकते हो और यदि तुम इसे तीन सालों तक अनुभव करते हो तो तुम्हें इसकी एक सतही समझ प्राप्त होगी; अगर तुम इसे सात या आठ साल तक अनुभव करते हो तो तुम्हें उससे भी अधिक समझ मिलेगी, लेकिन जो भी समझ तुम हासिल करोगे वो कभी भी सत्य के उस एक बयान का स्थान नहीं ले पाएगी। अन्य व्यक्ति, इसका एक-दो साल तक अनुभव करने के बाद, शायद थोड़ी-सी समझ हासिल कर ले, और दस सालों तक अनुभव करने के बाद थोड़ी और गहरी समझ हासिल कर ले, और फिर पूरे जीवनकाल के लिए अनुभव कर ज़्यादा उच्चतर समझ हासिल कर ले—लेकिन यदि तुम दोनों अपने द्वारा हासिल समझ को मिला दो, तो भी—चाहे तुम दोनों के पास कितनी भी समझ, कितने ही अनुभव, कितनी भी अंतर्दृष्टि, कितना भी प्रकाश, या कितने ही उदाहरण हों—ये सब मिलकर सत्य के उस एक कथन का स्थान नहीं ले सकते। इससे मेरा क्या आशय है? सिर्फ यह कि मनुष्य का जीवन हमेशा मनुष्य का जीवन होगा, भले ही तुम्हारी समझ सत्य, परमेश्वर के इरादों, उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हो, लेकिन यह कभी भी सत्य का एक विकल्प नहीं बन पाएगी। यह कहने का अर्थ कि लोगों ने सत्य हासिल कर लिया है, यह है कि उनके पास कुछ वास्तविकता है, और उन्होंने सत्य की कुछ समझ हासिल कर ली है, परमेश्वर के वचनों में कुछ वास्तविक प्रवेश पा लिया है, उन्हें परमेश्वर के वचनों का कुछ वास्तविक अनुभव हो गया है, और परमेश्वर पर अपने विश्वास में वे सही मार्ग पर हैं। किसी व्यक्ति के जीवन भर के अनुभव के लिए परमेश्वर से केवल एक ही बयान पर्याप्त है; लोग कई जीवनकाल या कई हज़ार वर्षों तक का अनुभव करने के बाद भी पूरी तरह और अच्छी तरह से मात्र एक सत्य का अनुभव भी नहीं कर पाएंगे। यदि लोगों ने कुछ ही सतही वचनों को समझा है और फिर भी वे दावा करते हैं कि उन्होंने सत्य हासिल कर लिया है, तो क्या यह पूरी तरह बकवास नहीं होगी?

जब लोग सत्य को समझते हैं, और इसके साथ यों जीते हैं मानो यह उनका जीवन हो, तो इसका तात्पर्य किस तरह के जीवन से है? इसका तात्पर्य, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन कर पाने की उनकी योग्यता से है; इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो उनका जीवनयापन परमेश्वर के वचन-सत्य की नींव पर स्थापित होता है, और वे सत्य के क्षेत्र में जी रहे हैं। लोगों का जीवन सत्य को समझना और अनुभव करना होता, और इस आधार के साथ, उस दायरे से बाहर न जाना; सत्य-जीवन प्राप्त करने की बात करते समय, इसी जीवन की चर्चा की जा रही है। तुम सत्य के साथ इस तरह जी सको मानो यह तुम्हारा जीवन है, इसके लिए ऐसा नहीं है कि जीवन का सत्य तुम्हारे अंदर हो, न ही ये बात है कि अगर सत्य तुम्हारे अंदर जीवन की तरह हो, तो तुम सत्य बन जाते हो, और तुम्हारा आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है, यह तो और भी नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य-जीवन हो। आखिरकार, तुम्हारा जीवन इंसान का जीवन ही है। बात केवल इतनी है कि मनुष्य परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रहकर जी सकता है, सत्य का ज्ञान रख सकता है, और इसे गहराई तक समझ सकता है; इस समझ को तुमसे छीना नहीं जा सकता। तुम इन बातों को पूरी तरह से अनुभव करते हो और समझते हो, तुम्हें लगता है कि ये चीजें अच्छी हैं, बहुत कीमती हैं, और तुम उन्हें अपने जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करने लगते हो; साथ ही, तुम इन चीजों पर निर्भर रहते हुए जीते हो, और कोई इसे बदल नहीं सकता : तो, तुम्हारा जीवन यह है। यानी, तुम्हारे जीवन में केवल—समझ, अनुभव और सत्य की अंतर्दृष्टि—यही बातें होती हैं, तुम चाहे कुछ भी करो, तुम अपने जीने का तरीका इन्हीं चीज़ों पर ही आधारित करोगे, और तुम इस दायरे या इन सीमाओं से परे नहीं जाओगे; तुम्हारा जीवन इसी प्रकार का होगा। परमेश्वर के कार्य का अंतिम उद्देश्य यही है कि लोगों को इस तरह का जीवन मिले। लोग सत्य को चाहे जितनी अच्छी तरह से समझ लें, उनका सार तो फिर भी इंसान का सार ही होता है, इसकी तुलना परमेश्वर के सार से बिल्कुल नहीं की जा सकती। क्योंकि सत्य का उनका अनुभव चलता रहता है, इस कारण उनके लिए सत्य को पूरी तरह से जी पाना असंभव है; वे केवल उसी बेहद सीमित सत्य को ही जी सकते हैं जो मनुष्यों के लिए प्राप्य है। तो फिर वे परमेश्वर कैसे बन सकते हैं? ... अगर तुम्हें परमेश्वर के वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव है, और तुम सत्य की अपनी समझ के अनुसार जी रहे हो, तब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य तुम्हारा जीवन है या तुम जो व्यक्त करते हो, वह सत्य है; अगर तुम्हारा यह विचार है, तो तुम गलत हो। यदि तुम्हारे पास सत्य के किसी पहलू के अनुसार कुछ अनुभव है, तो क्या यह अपने आप में सत्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है? बिल्कुल नहीं। क्या तुम सत्य की पूरी व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम सत्य से परमेश्वर के स्वभाव और सार का पता लगा सकते हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते। प्रत्येक व्यक्ति के पास सत्य के सिर्फ एक पहलू, एक दायरे का अनुभव होता है; इसे अपने सीमित दायरे में अनुभव करने से, तुम सत्य के विभिन्न पहलुओं को नहीं छू सकते। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तुम्हारा ज़रा-सा अनुभव किसके बराबर है? समुद्र तट पर रेत के एक कण के बराबर; महासागर में पानी की एक बूँद के बराबर। इसलिए, भले ही तुम्हारे अनुभव से प्राप्त समझ और अनुभूतियां कितनी भी अनमोल हों, फिर भी उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य के स्रोत और अर्थ में एक बहुत व्यापक क्षेत्र शामिल होता है! कुछ भी इसका खंडन नहीं कर सकता। कुछ लोग कहते हैं, "क्या मेरे अनुभव का ज्ञान कभी खंडित नहीं होगा?" बेशक, नहीं होगा। जो सच्ची समझ परमेश्वर के वचनों के तुम्हारे अनुभव से आती है, वह सत्य के अनुरूप है, उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? सत्य किसी भी वातावरण में तुम्हारा जीवन हो सकता है। यह तुम्हें एक पथ दे सकता है, इसके सहारे तुम जीवित रह सकते हो। हालांकि, लोगों के पास जो चीज़ें हैं, लोगों ने जो प्रकाश प्राप्त किया है, वो केवल एक निश्चित दायरे में खुद के लिए या कुछ अन्य लोगों के लिए ही उपयुक्त है, वो एक अलग दायरे में उपयुक्त नहीं है। किसी व्यक्ति का अनुभव कितना भी गहन हो, लेकिन वो होता बहुत ही सीमित है, किसी व्यक्ति का अनुभव सत्य के दायरे तक कभी नहीं पहुंच सकता। किसी व्यक्ति के प्रकाश और उसकी समझ की तुलना सत्य से कभी नहीं की जा सकती।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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