परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें हर चीज़ सत्य के दृष्टिकोण से ध्यानपूर्वक देखनी ही चाहिए" | अंश 375

जब भी कोई समस्या आए तो लोगों को सबसे पहले क्या करना चाहिए? उन्हें प्रार्थना करनी चाहिए; प्रार्थना सर्वोपरि है। प्रार्थना दर्शाती है कि तुम पवित्र हो, तुम्हारे हृदय ने परमेश्वर का भय मानना शुरू कर दिया है, तुम परमेश्वर को खोजना जानते हो, तुमने उसे अपने हृदय में जगह दे दी है, और तुम एक पवित्र ईसाई हो। कई पुराने विश्वासी प्रतिदिन एक ही समय पर प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठ जाते हैं, वो कभी-कभी इतने लंबे समय तक बैठे रहते हैं कि फिर उठ नहीं पाते। हम इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे कि यह कर्मकांड है या नहीं और वो इससे कुछ हासिल कर सकते हैं या नहीं; मान लेते हैं कि ये वृद्ध भाई-बहन बहुत ही पवित्र हैं, तुम युवा लोगों से कहीं बेहतर और ज्यादा मेहनती हैं। किसी भी समस्या के आने पर सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल बेमन से बड़बड़ करना नहीं है; उससे कोई समस्या हल नहीं होगी। हो सकता है आठ-दस बार प्रार्थना करने पर भी, तुम कुछ हासिल न कर पाओ, लेकिन हतोत्साहित मत हो—तुम्हें प्रार्थना करते रहना चाहिए। जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाए, तो पहले प्रार्थना करो, पहले परमेश्वर को बताओ, परमेश्वर को सँभालने दो, परमेश्वर को मदद करने दो, परमेश्वर को अगुआई करने दो और उसे राह दिखाने दो। इससे साबित होता है कि तुमने परमेश्वर को पहले स्थान पर रखा है, वह तुम्हारे हृदय में है। कोई समस्या सामने आने पर अगर पहले तुम प्रतिरोध करते हो, क्रोधित हो जाते हो, आगबबूला हो जाते हो—यदि तुम तुरंत, सबसे पहले नकारात्मक हो जाते हो—तो इससे यह ज़ाहिर होता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर नहीं है। जब भी तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। सबसे पहले तुम्हें घुटने टेककर प्रार्थना करनी चाहिए—यह महत्त्वपूर्ण है। प्रार्थना परमेश्वर की उपस्थिति में उसके प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। अगर परमेश्वर तुम्हारे हृदय में नहीं होगा, तो तुम ऐसा नहीं करोगे। कुछ लोग कहते हैं, "मैं प्रार्थना करता हूँ, लेकिन परमेश्वर फिर भी मुझे प्रबुद्ध नहीं करता!" तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। पहले देखो कि प्रार्थना के लिए तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं या नहीं; यदि तुम वास्तव में सत्य की खोज करते हो और अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तो वह किसी मामले में तुम्हें अच्छी तरह प्रबुद्ध करेगा, ताकि तुम समझ सको—संक्षेप में कहें तो परमेश्वर तुम्हें समझा देगा। परमेश्वर की प्रबुद्धता के बिना तुम अपने आप नहीं समझ सकते : तुममें कुशाग्रता की कमी है, तुम्हारे पास इसके लिए बुद्धि नहीं है, और यह मानव-बुद्धि द्वारा अप्राप्य है। जब तुम समझ जाते हो, तो क्या वह समझ तुम्हारे मन से पैदा होती है? यदि तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध नहीं किए जाते, तो तुम जिस किसी से भी पूछोगे, वह नहीं जानता होगा कि आत्मा के कार्य का क्या अर्थ है या परमेश्वर का क्या अर्थ है; जब स्वयं परमेश्वर तुम्हें इसका अर्थ बताएगा, तभी तुम जान पाओगे। इसलिए, जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना के लिए एक खोजी दृष्टिकोण के साथ जाँच-पड़ताल, और अपने विचार, मत और दृष्टिकोण व्यक्त करने की आवश्यकता होती है—ये चीज़ें उसमें शामिल होनी चाहिए। केवल बेमन से काम करने का कोई परिणाम नहीं होगा, इसलिए तुम्हें प्रबुद्ध न करने के लिए पवित्र आत्मा को दोष न दो। मैंने पाया है कि कुछ लोग परमेश्वर पर अपनी आस्था में, विश्वास तो करते रहते हैं, लेकिन परमेश्वर केवल उनके होंठों पर रहता है। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं रहता, वे आत्मा के कार्य को नकारते हैं, और वे प्रार्थना को भी नकारते हैं; वे केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? वे तब तक विश्वास करते रहते हैं, जब तक कि परमेश्वर उनके विश्वास से पूरी तरह से गायब नहीं हो जाता। विशेष रूप से, ऐसे लोग भी हैं, जो अक्सर सामान्य मामले सँभालते हैं और महसूस करते हैं कि वे बहुत व्यस्त हैं, और अपने समस्त प्रयासों के लिए कुछ प्राप्त नहीं करते। यह लोगों द्वारा परमेश्वर पर अपने विश्वास में सही मार्ग पर न चलने का मामला है। क्या सही मार्ग पर चलना मुश्किल काम नहीं है? बहुत से सिद्धांत समझने के बाद भी वे इस मार्ग पर चलने में विफल रहते हैं और उनके पतन के मार्ग की ओर ही उन्मुख होने की संभावना होती है। इसलिए जब तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो प्रार्थना करने और खोजने में अधिक समय लगाओ—कम से कम इतना तो तुम्हें करना ही चाहिए। परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के इरादों को जानना ही कुंजी है। यदि परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग इस प्रकार अनुभव और अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगे, और उनका विश्वास अर्थहीन होगा।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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