परमेश्वर के दैनिक वचन | "अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे" | अंश 609

एक अरसे से परमेश्वर में आस्था रखने वाले लोगों को अब एक खूबसूरत गंतव्य की आशा है, परमेश्वर में आस्था रखने वाले लोगों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक ही उनके सामने आ जाएगा, उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन जो लोग इन खूबसूरत ख्यालों में जी रहे हैं, मैं उन्हें बता दूँ कि शायद उन्हें पता भी नहीं कि वे स्वर्ग से आने वाले सौभाग्य या स्वर्ग में किसी स्थान के पात्र हैं भी या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है जैसे हर वो इंसान जिसे शैतान ने दूषित कर दिया है, सुनहरे सपने देखता है और एक आरामतलबी की ज़िंदगी जीना चाहता है, न कि मात्र वो जो अत्यंत प्रतिभाशाली है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और आशीष पाने की उत्सुकताओं पर लगाम लगाना चाहता हूँ। मान लो, तुम्हारे अतिक्रमण और आज्ञालंघन के तथ्य अनगिनत हैं, और जो बढ़ते ही जा रहे हैं, तो तुम्हारे भविष्य की खूबसूरत रूपरेखा से इनका सामँजस्य कैसे बैठेगा? यदि तुम बिना रुके, मनचाहे गलत मार्ग पर चलते रहना चाहते हो, और फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करूँगा कि तुम बिना जागे, अपनी उसी जड़ता में चलते रहो, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर की उपस्थिति में वह तुम्हें अलग से कोई रियायत प्रदान नहीं करेगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य का, तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र रास्ता है। ठोस रूप में इस पद्धति के चरण क्या हैं?

पहला, अपने सभी उल्लंघनों का परीक्षण करो, और अपने व्यवहार तथा उन विचारों की जाँच करो जो सच्चाई के अनुरूप नहीं हैं।

तुम लोग इसे आसानी से कर सकते हो, और मुझे लगता है कि विचारशील लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यही नहीं पता कि उल्लंघन और सत्य होते क्या हैं, तो ऐसे लोग अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग विचारशील नहीं होते। मैं ऐसे लोगों से बात कर रहा हूँ जो परमेश्वर से अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने गंभीरता से परमेश्वर के आदेशों की अवमानना नहीं की है, और सहजता से अपने उल्लंघनों का पता लगा सकते हैं। मुझे तुम लोगों से इस चीज़ की अपेक्षा है जो तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। मेरा ख्याल है, चाहे कुछ भी हो जाए, अकेले में इस अपेक्षा पर तुम लोग हँसोगे तो नहीं, या कम से कम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हल्के में नहीं लोगे। इसे गंभीरता से लो और ख़ारिज मत करो।

दूसरा, अपने प्रत्येक उल्लंघनों और अवज्ञाओं के लिये तद्नुरूप सत्य खोजो और इन सच्चाइयों का प्रयोग उन्हें हल करने के लिए करो, और फिर उल्लंघन करने वाले कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों और कृत्यों के स्थान पर सत्य को अमल में लाओ।

तीसरा, एक ईमानदार इंसान बनो, न कि एक ऐसा इंसान जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (मैं फिर तुम लोगों से ईमानदार इंसान बनने की बात कह रहा हूँ।)

यदि तुम इन तीन चीज़ों को कर पाओ तो तुम ऐसे ख़ुशकिस्मत इंसान हो, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। इन तीन नीरस अनुरोधों को या तो तुम लोग गंभीरता से लोगे या फिर लापरवाही से। ख़ैर, तुम लोग जैसे चाहो लो, मेरा लक्ष्य तुम्हारे सपने पूरा करना, तुम्हारे आदर्शों को अमल में लाना है, न कि तुम्हारा उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

हो सकता है मेरी मांगें सरल हों, लेकिन मैं जो कह रहा हूँ वह कोई दो दूनी चार जितना आसान नहीं है। अगर तुम लोग कुछ भी बोलोगे, बेसिर-पैर की बातें करोगे, ऊँची-ऊँची फेंकोगे, तो फिर तुम्हारी योजनाएँ और ख़्वाहिशें धरी की धरी रह जाएंगी। मुझे तुम में से ऐसे लोगों से कोई सहानुभूति नहीं होगी जो बरसों कष्ट झेलते हैं और मेहनत करते हैं, लेकिन उनके पास दिखाने को कुछ नहीं होता। इसके विपरीत, जो लोग मेरी माँगें पूरी नहीं करते, मैं ऐसे लोगों को पुरस्कृत नहीं, दंडित करता हूँ, सहानुभूति तो बिल्कुल नहीं रखता। शायद तुम्हारा ख़्याल है कि चूँकि बरसों अनुयायी बने रहकर तुम लोगों ने बहुत मेहनत कर ली है, भले ही वह कैसी भी रही हो, सेवक होने के नाते, परमेश्वर के भवन में कम से कम तुम लोगों को एक कटोरी चावल तो मिल ही जायेगा। मेरा तो मानना है कि तुम में से अधिकांश की सोच यही है क्योंकि अब तक तुम लोगों की सोच यही रही है कि किसी को अपना फायदा मत उठाने दो, लेकिन दूसरों से ज़रूर लाभ उठा लो। इसलिए मैं एक बात बहुत ही गंभीरता से कहता हूँ: मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है कि तुम्हारी मेहनत कितनी सराहनीय है, तुम्हारी योग्यताएं कितनी प्रभावशाली हैं, तुम कितनी बारीकी से मेरा अनुसरण कर रहे हो, तुम कितने प्रसिद्ध हो, या तुम कितने उन्नत प्रवृत्ति के हो; जब तक तुमने मेरी अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है, तब तक तुम मेरी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाओगे। जितनी जल्दी हो सके, तुम अपने विचारों और गणनाओं को ख़ारिज कर दो, और मेरी अपेक्षाओं को गंभीरता से लेना शुरु कर दो। वरना मैं अपना काम समाप्त करने के लिये सारे लोगों को भस्म कर दूँगा, और ज़्यादा से ज़्यादा मैं अपने वर्षों के कार्य और पीड़ाओं को शून्य में बदल दूँगा, क्योंकि मैं अगले युग में, अपने शत्रुओं और शैतान की तर्ज़ पर बुराई में लिप्त लोगों को अपने राज्य में नहीं ला सकता।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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