परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" | अंश 598

वे जो खोज करते हैं और वे जो खोज नहीं करते, वे अब दो भिन्न प्रकार के लोग हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के दो अलग-अलग गंतव्य हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य पर अमल करते हैं, परमेश्वर केवल उन्हीं का उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते हैं वे दुष्टात्माएँ और शत्रु के समान हैं। वे महादूत के वंशज हैं, और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। यहाँ तक कि एक अस्पष्ट परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? लोग जो भला विवेक रखते हैं परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं, उनका मूलतत्व भी परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और भले ही ऐसे व्यक्ति बहुत सी कठिनाइयों से होकर गुजरें, वे तब भी नष्ट होंगे। वे जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होने की बात नहीं सह सकते, और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, वे सब परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं—और वे सब नष्ट होंगे। प्रत्येक व्यक्ति जो देहधारण करने वाले परमेश्वर को नहीं मानता वह दुष्ट है, और वे सब के सब नष्ट होंगे। वे सब जो विश्वास करते हैं पर सत्य पर अमल नहीं करते, वे जो देह में आए परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं करते हैं, वे सब नष्ट होंगे। यदि कोई अंत में बचा रहता है तो वह व्यक्ति है जो परिष्कार की कड़वाहट से गुजरा है और विश्वास में दृढ़ रहा है। ये वे हैं जो वास्तव में परीक्षाओं से गुजरे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता है वह शत्रु है, अर्थात जो इस धारा के भीतर या बाहर है, पर परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करता है वह यीशु विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं, और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे लोग नहीं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं जो मौखिक रूप में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं हैं? क्या ये लोग वे नहीं हैं जो आशीषों को पाने की फ़िराक में रहते हैं परंतु परमेश्वर के लिए गवाही नहीं बन सकते हैं? तुम इन दुष्टात्माओं के साथ आज घुलमिल सकते हो और विवेक को तनाव दे सकते हो, उनसे प्रेम भी कर सकते हो, क्या ये सब बातें शैतान की ओर मित्रता या सद्भावना का सूचक नहीं हैं? क्या यह दुष्टात्माओं के साथ सहभागिता करना नहीं है? यदि आज भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर सकते, और परमेश्वर की इच्छा जानने की आशा के बिना प्रेम और दया आँखें मूँदकर दर्शाते हैं, और परमेश्वर के हृदय को अपने हृदय में नहीं पाते हैं, तो उनका अंत और भी अधिक दुःखदायी होगा। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता है, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम विवेक को तनाव में डालकर शत्रु से प्रेम कर सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता के संज्ञान की कमी नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ, और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और व्यक्तिगत सद्भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य है? यदि लोग शत्रुओं को स्थान देते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानकर परमेश्वर के कार्य में रूकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और जो अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते हैं, और जो मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह विरोधी हैं, उनको छोड़ दो जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। ये सभी लोग नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का भविष्य में एक अच्छी नियति प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहते हैं, और कुछ लोग अच्छी वाणी का एक अच्छी नियति खरीदने के लिए उपयोग करना चाहते हैं। लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार या वाणी के अनुसार उसका परिणाम निर्धारित करता है, और इसलिए बहुत से लोग धोखे के माध्यम से अस्थायी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करते हैं। जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। परमेश्वर के पास सभी लोगों के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानदण्ड हैं; वह केवल किसी के वचनों या आचरण के अनुसार इन निर्णयों को नहीं लेता है, न ही वह इन्हें किसी एक समयावधि के दौरान उनके व्यवहार के अनुसार लेता है। वह अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गयी किसी सेवा की वजह से किसी के समस्त दुष्ट व्यवहार के प्रति सर्वथा उदार व्यवहार नहीं करेगा, न ही परमेश्वर के लिए एक बार के व्यय की वजह से किसी को मृत्यु से बचा लेगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए दण्ड से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों को कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं। जब मानवजाति सही मार्ग में प्रवेश कर लेगी उसके बाद, लोगों का सामान्य मानव जीवन होगा। वे सब अपने संबंधित कर्तव्यों को करेंगे और पूर्णतः परमेश्वर के प्रति विश्वसनीय होंगे। वे अपनी अवज्ञा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह छोड़ देंगे, और वे परमेश्वर के कारण और परमेश्वर के लिए जीएँगे। उनमें अवज्ञा और प्रतिरोध का अभाव होगा। वे पूर्णतः परमेश्वर की आज्ञा पालन कर पाएँगे। यही परमेश्वर और मनुष्य का जीवन है और राज्य का जीवन है, और यही विश्राम का जीवन है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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