परमेश्वर के दैनिक वचन | "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना" | अंश 588

मनुष्य आज के कार्य एवं भविष्य के कार्य के विषय में थोड़ा बहुत ही जानता है, परन्तु वह उस मंज़िल को नहीं समझता जिसमें मानवजाति प्रवेश करेगी। एक प्राणी होने के नाते, मनुष्य को एक प्राणी के कर्तव्य को निभाना चाहिएः जो कुछ परमेश्वर करता है उसमें उसे उसका अनुसरण करना चाहिए, और जो भी तरीका मैं आप लोगों को बताता हूँ उसमें आप सब को आगे बढ़ना चाहिए। आपके पास स्वयं के लिए इंतज़ाम करने का कोई तरीका नहीं है, और आप स्वयं का नियन्त्रण करने में असमर्थ हैं; सब कुछ परमेश्वर की दया पर छोड़ दिया जाना चाहिए, और हर एक चीज़ उसके हाथों के द्वारा नियन्त्रित होती है। यदि परमेश्वर के कार्य ने मनुष्य को एक अन्त, एक बेहतरीन मंज़िल, एवं आधुनिकतम चीज़ प्रदान की होती, और यदि परमेश्वर ने मनुष्य को लुभाने और उससे उसका अनुसरण करवाने के लिए इसका उपयोग किया होता—यदि उसने मनुष्य के साथ कोई सौदा किया होता—तो यह विजय नहीं होती, न ही यह मनुष्य के जीवन में काम करने के लिए होता। अगर मनुष्य को नियन्त्रित करने और उसके हृदय को अर्जित करने के लिए परमेश्वर को उस अन्त का उपयोग करना होता, तो इसमें वह मनुष्य को सिद्ध नहीं कर रहा होता, न ही वह मनुष्य को पाने में सक्षम होता, परन्तु इसके बजाय मनुष्य को नियन्त्रित करने के लिए उस मंज़िल का उपयोग कर रहा होता। मनुष्य भविष्य के उस अन्त, अन्तिम मंज़िल, और आशा करने के लिए कोई अच्छी चीज़ है या नहीं उससे बढ़कर किसी और चीज़ के विषय में चिंता नहीं करता है। यदि विजय के कार्य के दौरान मनुष्य को एक खूबसूरत आशा दी गई होती, और मनुष्य पर पाई गई विजय से पहले, यदि उसे अनुसरण करने के लिए उपयुक्त मंज़िल दी गई होती, तो न केवल मनुष्य पर पाई गई विजय ने अपने प्रभाव को हासिल नहीं किया होता, बल्कि विजय के कार्य का प्रभाव भी प्रभावित हो गया होता। कहने का तात्पर्य है, विजय का कार्य मनुष्य की नियति एवं उसके भविष्य की संभावनाओं को दूर करने और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव का न्याय एवं उसकी ताड़ना करने के द्वारा अपना प्रभाव हासिल करता है। इसे मनुष्य के साथ एक सौदा करने के द्वारा, अर्थात्, मनुष्य को आशीषें, एवं अनुग्रह देने के द्वारा हासिल नहीं किया जाता है, परन्तु मनुष्य की स्वतन्त्रता से उसे वंचित करने और उसकी भविष्य की संभावनाओं को जड़ से उखाड़ने के माध्यम से उसकी वफादारी को प्रगट करने के द्वारा किया जाता है। यह विजय के कार्य का मूल-तत्व है। यदि मनुष्य को बिलकुल आरम्भ में ही एक खूबसूरत आशा दे दी गई होती, और ताड़ना एवं न्याय का कार्य बाद में किया जाता, तो मनुष्य उस आधार पर कि उसके पास भविष्य की संभावनाएं हैं इस ताड़ना एवं न्याय को स्वीकार कर लेता, और अन्त में, सृष्टिकर्ता की शर्त रहित आज्ञाकारिता एवं आराधना को सभी प्राणियों के द्वारा हासिल नहीं किया गया होता; वहाँ सिर्फ विवेकहीन, अबोध आज्ञाकारिता ही होती, या फिर मनुष्य परमेश्वर से तर्कहीन मांगें करता, और इस प्रकार मनुष्य के हृदय पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करना असम्भव हो जाता। इसके फलस्वरूप, विजय का ऐसा कार्य मनुष्य को अर्जित करने में असमर्थ होता, इसके अतिरिक्त, न ही परमेश्वर की गवाही देता। ऐसे प्राणी अपने कर्तव्य को निभाने में असमर्थ होते, और परमेश्वर के साथ सिर्फ मोल-भाव ही करते; यह विजय नहीं होती, किन्तु दया एवं आशीष होती। मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपनी नियति एवं अपने भविष्य की संभावनाओं के सिवाए और कुछ नहीं सोचता है, यह कि वह उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपनी नियति एवं अपने भविष्य की संभावनाओं की खातिर परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के लिए अपने प्रेम के कारण उसकी आराधना नहीं करता है। और इस प्रकार, मनुष्य पर विजय पाने में, मनुष्य के स्वार्थीपन, लोभ एवं ऐसी चीज़ें को जो परमेश्वर के विषय में उसकी आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं उन सब को हटा दिया जाना चाहिए। ऐसे करने से, मनुष्य पर विजय पाने के प्रभावों को हासिल कर लिया जाएगा। परिणामस्वरुप, मनुष्य पर पाई गई प्रारम्भिक विजय में यह ज़रूरी था कि सबसे पहले मनुष्य की अनियन्त्रित महत्वाकांक्षाओं और भयंकर कमज़ोरियों को शुद्ध किया जाए, और, इसके माध्यम से, परमेश्वर के विषय में मनुष्य के प्रेम को प्रगट किया जाए, और मानवीय जीवन के विषय में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के विषय में उसके दृष्टिकोण को, और मनुष्य के अस्तित्व के विषय में उस अर्थ को बदल दिया जाए। इस रीति से, परमेश्वर के विषय में मनुष्य के प्रेम को शुद्ध किया जाता है, कहने का तात्पर्य है, मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। परन्तु सभी प्राणियों के प्रति उसके रवैये में, परमेश्वर सिर्फ जीतने की खातिर विजय प्राप्त नहीं करता है; इसके बजाय, वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा की खातिर, और मनुष्य की प्राचीनतम, एवं मूल स्वरूप को पुनः ज्यों का त्यों करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने की खातिर ही विजय पाना होता, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य पर विजय पाने के बाद, यदि परमेश्वर मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता, और उसके जीवन एवं मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मानवजाति का प्रबंधन नहीं होता, और न ही मनुष्य पर पाई गई विजय उसके उद्धार के निमित्त होती। उस पर विजय पाने और अन्ततः एक बेहतरीन मंज़िल पर उसके आगमन के बाद सिर्फ मनुष्य को प्राप्त करना ही वह चीज़ है जो उद्धार के समस्त कार्य के केन्द्र में होता है, और केवल यह ही मनुष्य के उद्धार के लक्ष्य को हासिल कर सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक खूबसूरत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएं हैं जिन्हें सभी प्राणियों के द्वारा धारण किया जाना चाहिए, और वह कार्य है जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा किया जाना चाहिए। अगर मनुष्य को यह कार्य करना पड़ता, तो यह बहुत ही सीमित हो जाता; यह मनुष्य को एक निश्चित बिन्दु तक ले जा सकता था, परन्तु यह मनुष्य को अनंत मंज़िल पर ले जाने में सक्षम नहीं होता। मनुष्य की नियति को निर्धारित करने के लिए मनुष्य समर्थ नहीं है, इसके अतिरिक्त, न ही वह मनुष्य के भविष्य की संभावनाओं एवं भविष्य की मंज़िल को सुनिश्चित करने में सक्षम है। फिर भी, परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य भिन्न होता है। चूँकि उसने मनुष्य को सृजा था, इसलिए वह मनुष्य की अगुवाई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा, और उसे पूरी तरह प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुवाई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर पहुंचाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य को सृजा था और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य की नियति एवं उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। यही वह कार्य है जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा किया गया है। हालाँकि विजय के कार्य को भविष्य की संभावनाओं से मनुष्य को शुद्ध करने के द्वारा हासिल किया जाता है, फिर भी अन्ततः मनुष्य को उस उपयुक्त मंज़िल पर पहुंचाया जाना चाहिए जिसे परमेश्वर के द्वारा उसके लिए तैयार किया गया है। यह बिलकुल सही है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य में इसलिए कार्य करता है ताकि मनुष्य के पास एक मंज़िल हो और उसकी नियति सुनिश्चित हो। यहाँ, वह उपयुक्त मंज़िल जिसकी ओर संकेत किया गया है वे मनुष्य की आशाएं एवं उसके भविष्य की संभावनाएं नहीं हैं जिन्हें बीते समयों में शुद्ध किया गया था; ये दोनों भिन्न हैं। उस मंज़िल के बजाए जिसे मनुष्य को प्राप्त करना है, वह जिसकी मनुष्य आशा एवं अनुसरण करता है वे देह की फिज़ूल अभिलाषाओं के विषय में उसके अनुसरण की लालसाएं हैं। इसी बीच, जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, वे ऐसी आशीषें एवं प्रतिज्ञाएं हैं जिन्हें मनुष्य को तब प्राप्त करना है जब उसे एक बार शुद्ध कर दिया जाता है, जिन्हें परमेश्वर ने संसार की सृष्टि के बाद मनुष्य के लिए तैयार किया था, और जिन्हें चुनाव, धारणाओं, कल्पनाओं या मनुष्य की देह के द्वारा कलंकित नहीं किया जाता है। इस मंज़िल को किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए तैयार नहीं किया गया है, बल्कि यह सम्पूर्ण मानवजाति के लिए विश्राम का स्थान है। और इस प्रकार, यह मंज़िल मानवजाति के लिए सबसे उपयुक्त मंज़िल है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

विजय कार्य का सार

I

इन्सान की सबसे बड़ी समस्या है यही, कि वो अपने भविष्य को छोड़ कुछ और सोचता नहीं, अपनी सम्भावनाओं से सबसे अधिक प्रेम करता है, इन्हीं के लिए परमेश्वर का अनुसरण भी करता है, न कि इसलिए कि वह परमेश्वर से प्रेम करता है। इसलिए स्वार्थ, लालच, और चीज़ें सभी जो डालतीं हैं उसकी आराधना में बाधा, उन्हें हटाना होगा। फिर ही मानव पर विजय का प्रभाव प्राप्त होगा। इन्सान की नियति और सम्भावना को दूर करके, उसके विद्रोही स्वभाव का न्याय करके, उसे ताड़ना दे के, विजय कार्य अपना प्रभाव ऐसे हासिल करता है, न की इन्सान से सौदेबाज़ी करने, उसे अनुग्रह और आशीष देने से, बल्कि उसकी वफादारी प्रकट करने के लिए उसकी “आज़ादी” और सम्भावनाओं को ले लेने से। विजय का कार्य यही है। विजय का कार्य यही है।

II

आरम्भ की विजयों में, ज़रूरी है इन्सान की बेहिसाब अकांक्षाओं को, उसकी जानलेवा कमज़ोरी को दूर करना, और इसके द्वारा, परमेश्वर के लिए इन्सान के प्रेम को प्रकट करना, जीवन, परमेश्वर और अस्तित्व के अर्थ के बारे में उसकी सोच बदलना। इस तरह से परमेश्वर के लिए इन्सान का प्रेम होता है शुद्ध, उसके दिल पर होती है सच्ची विजय। इन्सान की नियति और सम्भावना को दूर करके, उसके विद्रोही स्वभाव का न्याय करके, उसे ताड़ना दे के, विजय कार्य अपना प्रभाव ऐसे हासिल करता है, न की इन्सान से सौदेबाज़ी करने, उसे अनुग्रह और आशीष देने से, बल्कि उसकी वफादारी प्रकट करने के लिए उसकी आज़ादी और सम्भावनाओं को ले लेने से। विजय का कार्य यही है। विजय का कार्य यही है।

III

लेकिन अपने प्राणियों के प्रति परमेश्वर के रवैये में, सिर्फ जीतने की खातिर विजय हासिल नहीं करता परमेश्वर। बल्कि इन्सान को पाने, अपनी महिमा की खातिर, मनुष्य की वास्तविक अनुरूपता पहले जैसी करने की खातिर विजय पाता है परमेश्वर। इन्सान की नियति और सम्भावना को दूर करके उसके विद्रोही स्वभाव का न्याय करके, उसे ताड़ना दे के, विजय कार्य अपना प्रभाव ऐसे हासिल करता है, न की इन्सान से सौदेबाज़ी करने, उसे अनुग्रह और आशीष देने से, बल्कि उसकी वफादारी प्रकट करने के लिए उसकी आज़ादी और सम्भावनाओं को ले लेने से। विजय का कार्य यही है। विजय का कार्य यही है।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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