परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है" | अंश 587

दुनिया के विशाल विस्तार में अनगिनत परिवर्तन हो चुके हैं, बार-बार गाद भरने से महासागर मैदानों में बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो ब्रह्मांड में सभी चीज़ों पर शासन करता है, कोई भी इस मानव-जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। कोई ऐसा पराक्रमी नहीं है, जो इस मानव-जाति के लिए श्रम या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है, जो इस मानव-जाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्य-जाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मनुष्य-जाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्य-जाति, कदम-दर-कदम, क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है, जहाँ से वापसी संभव नहीं है। ऐसी मनुष्य-जाति, जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और दुष्ट की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है : क्या किसी ने कभी उस दिशा पर विचार किया है, जिस ओर ऐसी मनुष्य-जाति जा रही है? ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता, कोई परमेश्वर को खुश करने का तरीका नहीं खोजता या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को अपनी जिद पर अड़े रहना चाहिए—कि परमेश्वर इस मानव-जाति के साथ कैसा व्यवहार करेगा, जिसने उसे मुड़कर एक नज़र देखे बिना ही खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा तैयार की है, एक ऐसी आपदा, जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का ही नहीं, बल्कि आत्मा का भी दंड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई उत्तर नहीं मिलता, तो वह किस प्रकार का क्रोध प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा, जिसे पहले किसी सृजित प्राणी ने कभी अनुभव किया या सुना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी दोहराई नहीं जाएगी। क्योंकि परमेश्वर की योजना मनुष्य-जाति का केवल एक बार सृजन करने और उसे केवल एक बार बचाने की है। यह पहली बार है, और यही अंतिम बार भी है। इसलिए, जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इस बार इंसान को बचाता है, उसे कोई नहीं समझ सकता।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

मानव के भविष्य पर परमेश्वर विलाप करता है

इस विशाल जगत में, जो कि बार-बार बदला है, कोई नहीं है कि जो इंसां को राह दिखलाए, सिवाय उस परमेश्वर के, जो इस जहां का मालिक है। कोई नहीं है बलशाली जो इंसान के लिये मेहनत करे, कोई नहीं है जो इंसान की ज़रूरतों को पूरा करे। कोई नहीं है जो इंसान को, उजले भविष्य में ले जाए, और दुनिया की नाइंसाफ़ी से मुक्ति दिला पाए, दिला पाए। मानव के भविष्य पर परमेश्वर विलाप करता है। उसके पतन पर वो कितना शोक करता है! परमेश्वर अफ़सोस करता है कि इंसान सीखता नहीं, पतन की उस राह पर बढ़ता है जहां से वापसी नहीं। इंसान ने बग़ावत की है, परमेश्वर का दिल तोड़ा है, शैतान की पतित राह पर, ख़ुशी से चल पड़ा है। और कोई नहीं जो ये सोचे, आख़िर इंसान किधर जाएगा।

कौन फिर रुके और महसूस करे परमेश्वर के रोष को? कौन ख़ुश करना चाहता और निकट आना चाहता है परमेश्वर के? कौन परमेश्वर के ग़म को देखे, या समझे उसके दर्द को? सुनकर भी परमेश्वर की पुकार, वो चले जा रहे उस पथ पर, जो ले जाती है दूर उन्हें, परमेश्वर की करुणा से, सच्चाई से, उसकी सजग निगाहों से; बेच देते हैं ख़ुद को शैतान के हाथों स्वेच्छा से। मानव के भविष्य पर परमेश्वर विलाप करता है। उसके पतन पर वो कितना शोक करता है! परमेश्वर अफ़सोस करता है कि इंसान सीखता नहीं, पतन की उस राह पर बढ़ता है जहां से वापसी नहीं। इंसान ने बग़ावत की है, परमेश्वर का दिल तोड़ा है, शैतान की पतित राह पर, ख़ुशी से चल पड़ा है। और कोई नहीं जो ये सोचे, आख़िर इंसान किधर जाएगा।

कैसा बर्ताव करेगा परमेश्वर उनसे, जो उसे ललकारते और नकारते हैं? जान लो, परमेश्वर की चेतावनी और प्रबोधन के बाद, विपदा बड़ी आती है, जो सही नहीं जाती है, देह के साथ-साथ इंसान की, रूह भी सज़ा पाती है। जब परमेश्वर की योजना बेअसर की जाती है, उसकी आवाज़ की उपेक्षा की जाती है, उपेक्षा की जाती है, कौन जाने उनके लिये परमेश्वर का कैसा रोष होगा; ऐसा रोष जो मानव ने, ना कभी अनुभव किया, ना सुना होगा, ना सुना होगा। ये विपदा अनोखी है; परमेश्वर की योजना में, एक ही रचना है, एक ही मुक्ति है। ये पहली और अंतिम बार है। हृदय किसी का अनुभव नहीं कर सकता है, परमेश्वर के व्यथित प्रेम और उत्कट अभिलाषा को, कि हो मानव का उद्धार, कि हो मानव का उद्धार। मानव के भविष्य पर परमेश्वर विलाप करता है। उसके पतन पर वो कितना शोक करता है! परमेश्वर अफ़सोस करता है कि इंसान सीखता नहीं, पतन की उस राह पर बढ़ता है जहां से वापसी नहीं। इंसान ने बग़ावत की है, परमेश्वर का दिल तोड़ा है, शैतान की पतित राह पर, ख़ुशी से चल पड़ा है। और कोई नहीं जो ये सोचे, आख़िर इंसान किधर जाएगा। आख़िर इंसान किधर जाएगा।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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