परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 181

वह कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह उसकी देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है; वह कार्य जिसे मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव के विषय में बातचीत करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य को अभिव्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य केवल सत्य का अनुभव करने के पश्चात् ही उससे सम्बन्धित अनुभव को अभिव्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य में कोई नियम नहीं होते हैं और यह समय या भौगोलिक अवरोधों के अधीन नहीं होता है। वह जो है उसे वह किसी भी समय, कहीं पर भी प्रगट कर सकता है। जो वह है उसे वह किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। जैसा उसे अच्छा लगता है वह वैसा कार्य करता है। मनुष्य के काम में परिस्थितियां एवं सन्दर्भ होते हैं; अन्यथा, वह काम करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के विषय में अपने अनुभव को व्यक्त करने में असमर्थ होता है। आपको बस यह बताने के लिए उनके बीच के अन्तर की तुलना करनी है कि यह परमेश्वर का अपना कार्य है या मनुष्य का काम है। यदि स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया कोई कार्य नहीं है और केवल मनुष्य का ही काम है, तो आप जानेंगे कि मनुष्य की शिक्षाएं ऊँची हैं, किसी की भी क्षमता से परे हैं; उनके बोलने के अन्दाज़, चीज़ों को सम्भालने हेतु उनके सिद्धान्त और कार्य करने में उनका अनुभवी एवं स्थिर तरीका दूसरों की पहुंच से बाहर होते हैं। आप सभी इन लोगों की सराहना करते हैं जो ऊँचे मनुष्यत्व के हैं, परन्तु आप परमेश्वर के कार्य एवं वचनों से नहीं देख सकते हैं कि उसका मनुष्यत्व कितना ऊँचा है। इसके बजाए, वह साधारण है, और कार्य करते समय, वह सामान्य और वास्तविक है परन्तु वह नश्वर मनुष्यों के लिए अथाह है, इसलिए लोग उसके विषय में एक प्रकार का आदर भाव महसूस करते हैं। कदाचित् अपने कार्य में किसी व्यक्ति का अनुभव विशेष रूप से ऊँचा होता है, या उसकी कल्पना और तर्कशक्ति विशेष रूप से ऊँची होती है, और उसकी मानवता विशेष रूप से अच्छी होती है; ये केवल लोगों की प्रशंसा को ही अर्जित कर सकते हैं, परन्तु उनके भय-मिश्रित आदर या डर को जागृत नहीं कर सकते हैं। सभी लोग ऐसे लोगों की प्रशंसा करते हैं जिनके पास कार्य करने की क्षमता होती है और जिनके पास विशेष रुप से गहरा अनुभव होता है और जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, परन्तु वे कभी भी भय-मिश्रित आदर, मात्र प्रशंसा एवं ईर्ष्या को कभी निकाल नहीं सकते हैं। परन्तु ऐसे लोग जिन्होंने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है वे परमेश्वर की प्रशंसा नहीं करते हैं, बल्कि वे महसूस करते हैं कि उसका कार्य मानव की पहुंच से परे है और यह मनुष्य के लिए अथाह है, और यह कि यह तरोताज़ा और अद्भुत है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो उसके विषय में उनका पहला ज्ञान यह है कि वह अथाह, बुद्धिमान एवं अद्भुत है, और वे अवचेतन रूप से उसका आदर करते हैं और उस कार्य के रहस्य का एहसास करते हैं जिसे उसने किया है, जो मनुष्य के दिमाग की पहुंच से परे है। लोग बस यही चाहते हैं कि वे परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, और उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करने के योग्य हो जाएं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते हैं, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच एवं कल्पना से परे चला जाता है और मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि मनुष्य भी अपनी स्वयं की कमियों को नहीं जानता है, जबकि परमेश्वर ने एक नए मार्ग को खोला है और वह मनुष्य को एक बिलकुल नए एवं अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मानवजाति ने नई प्रगति की है और उसकी एक नई शुरुआत हुई है। जो कुछ मनुष्य उसके लिए महसूस करता है वह सराहना नहीं है, या फिर, यह सिर्फ सराहना नहीं है। उनका अत्यंत गहरा अनुभव भय-मिश्रित आदर एवं प्रेम है, और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, वह ऐसी बातें बोलता है जिसे बोलने में मनुष्य असमर्थ है। ऐसे लोग जिन्होंने उसके कार्य का अनुभव किया है वे हमेशा अवर्णनीय एहसास का अनुभव करते हैं। ऐसे लोग जिनके पास अत्यंत गहरे अनुभव हैं वे विशेष रूप से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। वे हमेशा उसकी मनोरमता को महसूस करते हैं, और यह महसूस करते हैं कि उसका कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण, एवं कितना अद्भुत है, और इसके परिणामस्वरूप यह उनके मध्य असीमित सामर्थ उत्पन्न करता है। यह डर या कभी कभार का प्रेम एवं आदर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा एवं सहिष्णुता का गहरा एहसास है। हालांकि, ऐसे लोग जिन्होंने उसकी ताड़ना एवं न्याय का अनुभव किया है वे महसूस करते हैं कि वह प्रतापी एवं अनुल्लंघनीय है। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी जिन्होंने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; सभी लोग जो सचमुच में उसका आदर करते हैं वे यह जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है बल्कि हमेशा उनकी धारणाओं के विरुद्ध जाता है। उसे इस बात की आवश्यकता नहीं है कि लोगों के पास सम्पूर्ण प्रशंसा हो या वे उसके प्रति समर्पण के भाव को प्रगट करें, बल्कि वो चाहता है कि उनके अंदर सच्ची श्रद्धा एवं सच्चा समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, कोई भी व्यक्ति सच्चे अनुभव के साथ उसके उसके प्रति आदर महसूस करता है, जो सराहना से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना एवं न्याय के कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे अपने अपने हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धा एवं नमन योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व एवं उसका स्वभाव उन सृजे गए प्राणियों के समान नहीं है, और वह उन सृजे गए प्राणियों से ऊपर है। परमेश्वर सृजा गया प्राणी नहीं है, और केवल वही आदर एवं समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। अतः, सभी लोग जिन्होंने उसके कार्य का अनुभव किया है और सचमुच में उसे जानते हैं वे उसके प्रति आदर महसूस करते हैं। फिर भी, ऐसे लोग जो उसके विषय में अपनी धारणाओं को नहीं छोड़ते हैं, अर्थात्, ऐसे लोग जो उसे परमेश्वर ही नहीं मानते हैं, उनके अंदर उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, और हालाँकि वे उसका अनुसरण करते हैं फिर भी उन्हें जीता नहीं गया है; वे स्वभाव से ही अवज्ञाकारी लोग हैं। वह उस परिणाम को हासिल करने के लिए इस कार्य को करता है कि सभी सृजे गए प्राणी सृष्टिकर्ता का आदर कर सकें, उसकी आराधना कर सकें, और बिना किसी शर्त के उसकी प्रभुता के अधीन हो सकें। यह वह अंतिम परिणाम है जिसे हासिल करना उसके समस्त कार्य का उद्देश्य है। ऐसे लोग जिन्होंने ऐसे कार्य का अनुभव किया है यदि वे परमेश्वर का थोड़ा सा भी आदर नहीं करते हैं, यदि उनके अतीत का आज्ञालंघन बिल्कुल भी नहीं बदली है, तो इन लोगों को निश्चित तौर पर निष्कासित कर दिया जाता है। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति यह है कि वह केवल दूर से ही सराहना करता है या सम्मान प्रगट करता है और थोड़ा सा भी प्रेम नहीं करता है, तो यह वही स्तर है जहाँ कोई व्यक्ति पहुंचता है जिसके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में पूर्ण किए जाने की स्थितियों की कमी होती है। यदि इतना अधिक कार्य किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को अर्जित करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य का अनुसरण नहीं करता है। कोई व्यक्ति जो परमेश्वर से प्रेम नहीं करता है वह सत्य से प्रेम नहीं करता है और इस प्रकार वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता है, और उसकी स्वीकृति को तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता है। ऐसे लोग, इसके बावजूद कि वे किस प्रकार पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, और इसके बावजूद कि वे किस प्रकार न्याय का अनुभव करते हैं, वे अभी भी परमेश्वर का आदर करने में असमर्थ हैं। ये ऐसे लोग हैं जो अपने स्वभाव को बदल नहीं सकते हैं, जिनका स्वभाव अत्यंत दुष्ट है। वे सभी जो परमेश्वर का आदर नहीं करते हैं, उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है, वे दण्ड के योग्य हैं, और उन्हें ठीक उनके समान दण्ड दिया जाता है जो बुराई करते हैं, और वे उन लोगों से भी अधिक कष्ट सहते हैं जिन्होंने अधर्म के कामों को अंजाम दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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