परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है" | अंश 264

इस विशाल ब्रह्मांड में ऐसे कितने प्राणी हैं जो सृष्टि के नियम का बार-बार पालन करते हुए, एक ही निरंतर नियम पर चल रहे हैं और प्रजनन कार्य में लगे हैं। जो लोग मर जाते हैं वे जीवितों की कहानियों को अपने साथ ले जाते हैं और जो जीवित हैं वे मरे हुओं के वही त्रासदीपूर्ण इतिहास को दोहराते रहते हैं। मानवजाति बेबसी में स्वयं से पूछती हैः हम क्यों जीवित हैं? और हमें करना क्यों पडता है? यह संसार किसके आदेश पर चलता है? मानवजाति को किसने रचा है? क्या वास्तव में मानवजाति प्रकृति के द्वारा ही रची गई है? क्या मानवजाति वास्तव में स्वयं के भाग्य के नियंत्रण में है? ... हज़ारों सालों से मानवजाति ने बार-बार ये प्रश्न किए हैं। दुर्भाग्य से, मानवजाति जितना अधिक इन प्रश्नों के जूनून से घिरती गई, विज्ञान के लिए उसके भीतर उतनी ही अधिक प्यास उत्पन्न होती गई है। देह के लिए विज्ञान संक्षिप्त संतुष्टि और क्षणिक आनन्द प्रदान करता है, परन्तु मानवजाति को तनहाई, अकेलेपन और उसकी आत्मा में छुपे आतंक और गहरी लाचारी को दूर करने के लिए काफी नहीं। मानवजाति ऐसे विज्ञान के ज्ञान का उपयोग महज इसलिए करती है कि नग्न आंखों से देख सके और दिमाग उसके हृदय को चेतनाशून्य कर सके। फिर भी ऐसा वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों का पता लगाने से रोक नहीं सकता है। मनुष्य नहीं जानता कि ब्रह्मांड की सत्ता किसके पास है, मानवजाति की उत्पत्ति और भविष्य तो वह बिल्कुल नहीं जानता। मानवजाति सिर्फ मजबूरन इन नियमों के अधीन रहती है। न तो इससे कोई बच सकता है और न ही कोई इसे बदल सकता है, क्योंकि इन सबके मध्य और स्वर्ग में केवल एक ही शाश्वत सत्ता है जो सभी पर अपनी सम्प्रभुता रखती है। और ये वह है जिसे कभी भी मनुष्य ने देखा नहीं है, जिसे मानवजाति ने कभी जाना नहीं है, जिसके अस्तित्व में मनुष्य ने कभी भी विश्वास नहीं किया, फिर भी वही एक है जिसने मानवजाति के पूर्वजों को श्वास दी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वही मानवजाति के अस्तित्व के लिए आपूर्ति और पोषण प्रदान करता है, और आज तक मानवजाति को मार्गदर्शन प्रदान करता आया है। इसके अलावा, उसी और सिर्फ़ उसी पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। इस ब्रह्माण्ड में उसी की सत्ता है और हर प्राणी पर उसी का शासन है। वह चारों मौसमों पर उसी का अधिकार है और वही वायु, शीत, बर्फ और बरसात संचालित करता है। वही मानवजाति को धूप प्रदान करता है और रात्रि लेकर आता है। उसी ने स्वर्ग और पृथ्वी की नींव डाली, मनुष्य को पहाड़, झील और नदियां तथा उसमें जीवित प्राणी उपलब्ध कराए। उसके कार्य सभी जगह हैं, उसकी सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। प्रत्येक नियम और व्यवस्था उसी के कार्य का मूर्त रूप है, और उनमें से प्रत्येक उसकी बुद्धि और अधिकार प्रगट करता है। कौन है जो उसके प्रभुत्व से बच सकता है? कौन है जो उसकी रूपरेखा से मुक्त रह सकता है? प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है। उसके अलावा कोई और ब्रह्मांड को नियंत्रित नहीं कर सकता, उसके अलावा कोई और तो मानवजाति को अथक पोषण तो प्रदान कर ही नहीं कर सकता। इस बात से परे कि चाहे तुम परमेश्वर के कार्यों को पहचानन के योग्य हो या नहीं और परमेश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करते हो या नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर के विधान के अंतर्गत ही रहता है, और इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि परमेश्वर प्रत्येक चीज़ पर अपनी सम्प्रभुता बनाए रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार कभी भी किसी चीज़ पर आधारित नहीं होते हैं चाहे वे मनुष्य के द्वारा पहचाने और समझे जाएं या नहीं। केवल वही मनुष्यों के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है और वही केवल मानवजाति के भाग्य को निर्धारित कर सकता है। इस बात से परे कि तुम इस सत्य को स्वीकारने के योग्य हो अथवा नहीं, अब ज्यादा समय नहीं रह गया है कि मानवजाति स्वयं अपनी आंखों से इन बातों की गवाही देगी और यह सत्य है कि परमेश्वर इसे जल्द ही पूरा करेगा। मानवजाति परमेश्वर की निगाह तले जीवित रहती और समाप्त हो जाती है। मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन में रहती है और जब उसकी आंखें अंतिम समय में बंद हो जाती हैं, तो वह भी उसी के प्रबंधन में होता है। बार-बार, मनुष्य आता-जाता रहता है। बिना अपवाद के, यह सब कुछ परमेश्वर के प्रारूप और सम्प्रभुता का भाग है। परमेश्वर का प्रबंधन निरंतर आगे बढ़ता रहता है और कभी रुका नहीं है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी सम्प्रभुता पर विश्वास कराएगा, अपने कार्यों को दिखाएगा, और अपने राज्य में वापस लाएगा। यही उसकी योजना है, और यही वह कार्य है जो वह हज़ार सालों से करता आ रहा है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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