परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 11" | अंश 240

आज, चूँकि मैं तुम लोगों को इस स्थिति तक ले आया हूँ, इसलिए मैंने कई उपयुक्त व्यवस्थाएँ की हैं, और मेरे स्वयं के लक्ष्य हैं। यदि मुझे आज उनके बारे में तुम लोगों को बताना होता, तो क्या तुम लोग उन्हें सच में जानने में समर्थ होते? मैं मनुष्य के मन के विचारों और मनुष्य के हृदय की इच्छाओं से भली-भाँति परिचित हूँ: किसने कभी स्वयं के लिए बच निकलने के तरीके की तलाश नहीं की है? किसने कभी स्वयं के भविष्य की सम्भावना के बारे में नहीं सोचा है? फिर भी भले ही मनुष्य एक समृद्ध और प्रतिभाशाली मेधा से सम्पन्न है, कौन पूर्वानुमान करने में समर्थ था कि, युगों के बाद, वर्तमान ऐसा हो जाएगा जैसा कि यह हुआ है? क्या यह वास्तव में तुम्हारे स्वयं के व्यक्तिपरक प्रयासों का परिणाम है? क्या यही तुम्हारे अथक परिश्रम का भुगतान है? क्या यह तुम्हारे मन की सुंदर परिकल्पित मूक झाँकी है? यदि मैंने सम्पूर्ण मानवजाति का मार्गदर्शन नहीं किया होता, तो कौन स्वयं को मेरी व्यवस्थाओं से अलग करने और कोई अन्य तरीका ढूँढने में समर्थ हो पाता? क्या मनुष्यों के यही विचार और इच्छाएँ हैं जो उसे आज तक लेकर आई हैं? कई लोगों के जीवन उनकी इच्छाओं के पूरा हुए बिना बीत जाते हैं। क्या यह वास्तव में उनकी सोच में किसी दोष की वजह से है? कई लोगों के जीवन अप्रत्याशित खुशी और संतुष्टि से भरे हैं। क्या यह वास्तव में इसलिए है क्योंकि वे बहुत कम अपेक्षा करते हैं? सर्वशक्तिमान की नज़रों में सम्पूर्ण मानवजाति में से किसकी देखभाल नहीं की जाती है? कौन सर्वशक्तिमान द्वारा पूर्वनियति के बीच नहीं रहता है? किसके जन्म और मृत्यु उसके स्वयं के चयन से आते हैं? क्या मनुष्य अपने स्वयं के भाग्य को नियंत्रित करता है? कई लोग मृत्यु की माँग करते हैं, फिर भी यह उनसे काफी दूर रहती है; कई लोग ऐसे होना चाहते हैं जो जीवन में मज़बूत हैं और मृत्यु से डरते हैं, फिर भी उनकी जानकारी के बिना, उन्हें मृत्यु की खाई में डुबाते हुए, उनकी मृत्यु का दिन निकट आ जाता है; कई लोग आसमान की ओर देखते हैं और गहरी आह भरते हैं; कई लोग अत्यधिक रोते हैं, क्रन्दन करते हुए सिसकते हैं; कई लोग परीक्षणों के बीच गिर जाते हैं; कई लोग प्रलोभन के बंदी बन जाते हैं। यद्यपि मैं मनुष्य को मुझे स्पष्ट रूप से देखने की अनुमति देने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रकट नहीं होता हूँ, तब भी कई लोग मेरे चेहरों को देख कर भयभीत होते हैं, गहराई तक डरते हैं कि मैं उन्हें मार गिराऊँगा, कि मैं उन्हें नष्ट कर दूँगा। क्या मनुष्य वास्तव में मुझे जानता है, या क्या वह नहीं जानता है? कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता है। क्या यह ऐसा नहीं है? तुम लोग मुझ से और मेरी ताड़ना से भय खाते हो, फिर भी तुम लोग खड़े होकर मेरा खुलकर विरोध करते हो और मेरी आलोचना करते हो। क्या यही मामला नहीं है? मनुष्य ने मुझे कभी भी नहीं जाना है क्योंकि उसने कभी भी मेरा चेहरा नहीं देखा है या मेरी आवाज़ को नहीं सुना है। इसलिए, भले ही मैं मनुष्य के हृदय के भीतर हूँ, क्या ऐसा कोई है जिसके हृदय में मैं धुँधला और अस्पष्ट नहीं हूँ? क्या ऐसा कोई है जिसके हृदय में मैं पूरी तरह से स्पष्ट हूँ? मैं उनके लिए जो मेरे लोग हैं इच्छा नहीं करता हूँ कि वे भी मुझे अनिश्चितता और अस्पष्टता से देखें, और इसलिए मैंने इस महान कार्य को शुरू किया है।

मैं चुपचाप मनुष्यों के बीच आता हूँ, और चुपचाप चला जाता हूँ। क्या किसी ने कभी मुझे देखा है? क्या सूर्य अपनी दहकती हुई लपटों के कारण मुझे देख सकता है? क्या चन्द्रमा अपनी चमकदार स्पष्टता के कारण मुझे देख सकता है? क्या आकाश में अपनी स्थिति के कारण तारा-मंडल मुझे देख सकते हैं? जब मैं आता हूँ, तो मनुष्य मुझे नहीं जानता है, और सभी चीजें अनभिज्ञ रहती हैं और जब मैं जाता हूँ, तब भी मनुष्य अनजान रहता है। मेरी गवाही कौन दे सकता है? क्या यह पृथ्वी पर लोगों द्वारा स्तुति हो सकती है? क्या यह जंगल में खिलने वाली कुमुदिनियाँ हो सकती हैं? क्या यह आकाश में उड़ने वाले पक्षी हैं? क्या यह पहाडों में गर्जना करने वाले शेर हैं? कोई भी मुझे पूरी तरह से नहीं देख सकता है! कोई भी उस कार्य को नहीं कर सकता है जो मैं करूँगा! यहाँ तक कि यदि उन्होंने इस कार्य को किया भी, तो उसका क्या प्रभाव होगा? प्रत्येक दिन कई लोगों के हर कार्य को मैं देखता हूँ, और प्रत्येक दिन मैं कई लोगों के हृदयों और मनों को देखता हूँ; कोई भी कभी भी मेरे न्याय से बच कर नहीं निकला है, और किसी ने भी कभी भी स्वयं को मेरे न्याय की वास्तविकता से वंचित नहीं किया है। मैं आसमानों से ऊपर हूँ और दूर से देखता हूँ: असंख्य लोग मेरे द्वारा मार गिराए जा चुके हैं, फिर भी, असंख्य लोग मेरी दया और करूणा के बीच रहते भी हैं। क्या तुम लोग भी इसी प्रकार की परिस्थितियों के बीच नहीं रहते हो?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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